राजनीतिक दलों पर रॉबर्ट मिशेल्स तथा सार्टोरी के विचार बताइये।

Admin
0

राजनीतिक दलों पर रॉबर्ट मिशेल्स तथा सार्टोरी के विचार बताइये। 

    राजनीतिक दलों पर मिशेल्स के विचार

    जर्मन समाज-वैज्ञानिक रॉबर्ट मिशेल्स (1876-1936 ई.) ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'पॉलिटिकल पार्टीज' (1911) के अन्तर्गत यह विचार व्यक्त किया कि - "राजनीतिक दल का चरित्र समय की ऐतिहासिक अवस्था से निर्धारित होता है।" जहाँ लेनिन ने दलों का विश्लेषण पूंजीपति और सर्वहारा वर्गों के संघर्ष के सन्दर्भ में किया है, वहीं मिशेल्स ने मुख्यत:लोकतन्त्र में प्रचलित दलों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है।

    मिशेल्स के अनुसार जिस राजनीतिक दल का नेतृत्व गिने-चुने लोगों के हाथ में रहता है, अर्थात् जिस दल में सारे निर्णय करने की शक्ति एक छोटे से गुटतंत्र के हाथों में आ जाती है, उसे यह खतरा बना रहता है कि जब जनपुंज में लोकतंत्र की लहर पैदा होगी तब वह उस गुटतन्त्र को भी बहा ले जाएगी। यही सोचकर आज के लोकतंत्रीय युग में कोई भी राजनीतिक दल अपने संगठन को विस्तृत से विस्तृत आधार पर खड़ा करने की कोशिश करता है ताकि अधिक से अधिक लोग अपने आपको उसके साथ जड़े हए अनुभव करें। इससे दल का आधार बहुत बड़ा और जटिल हो जाता है। अतः उसके संगठन का सुचारु रूप से चलाने के लिए सुदृढ़ अधिकारतंत्र की जरुरत पैदा होती है।

    मिशेल्स ने अपनी धारणा के प्रतिपादन में अल्पतंत्र के लौह-नियम की महत्वपूर्ण धारणा का उल्लेख किया है जोकि निम्न प्रकार है

    अल्पतंत्र (गुटतंत्र) का लौह नियम - मिशेल्स ने राजनीतिक दलों का विश्लेषण करते हुए 'अल्पतंत्र के लौह नियम' के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इसके अन्तर्गत उनका मानना है कि-"किसी भी राजनीतिक दल के सारे निर्णय करने की शक्ति अन्ततः एक गुटतंत्र के हाथों में आ जाती है, परन्तु आधुनिक राजनीतिक दल अपने गुटतंत्रीय चरित्र को छिपाकर अपने आपको लोकतंत्रीय छद्मावेष के आवरण में प्रस्तुत करते हैं। " मिशेल्स के अनुसार किसी भी शासन - प्रणाली को चलाने के लिए संगठन अनिवार्य है। जब कोई समुदाय किसी आर्थिक या राजनीतिक लक्ष्य की सिद्धि का दावा करता है, तब सामूहिक इच्छा की अभिव्यक्ति के लिए संगठन का निर्माण जरूरी हो जाता है। वस्तुतः यह संगठन ही राजनीतिक दल के रूप में प्रकट होते हैं और प्रत्येक संगठन के भीतर सारी सत्ता अनिवार्यतः गिने-चुने विशेषज्ञों के समूह के हाथों में केन्द्रित हो जाती है। यही समूह सम्पूर्ण संगठन के नाम पर सारे महत्वपूर्ण निर्णय करता है। अत: व्यवहार के धरातल पर प्रत्येक संगठन गुटतंत्र का रूप धारण कर लेता है, जिसके गिने-चुने सदस्य ही सम्पूर्ण सत्ता पर अपना नियंत्रण स्थापित करके स्वार्थ-पूर्ति के लिए उसका उपयोग करते हैं। - इस प्रकार मिशेल्स ने राजनीतिक दलों सम्बन्धी अपने विश्लेषण से यह सिद्ध किया कि - "व्यवहारिकता के धरातल पर जनता का शासन एक अमूर्त या काल्पनिक वस्तु बन कर रह जाता है। यह आशा करना भी व्यर्थ है कि लोकतंत्रीकरण की प्रगति के साथ-साथ जनपुंज शक्तिशाली होते जाएंगे।" मिशेल्स के समस्त विश्लेषण का सार यही है कि - "गुटतंत्रीय प्रवृत्ति ही राजनीतिक दल का आधार है।"

    राजनीतिक दलों पर जिओवान्नि सरतोरी के विचार

    इतालवी राजनीति-वैज्ञानिक ज्योवानी सार्टोरी ने अपनी महत्वपूर्ण कृति पार्टीज एंड पार्टी सिस्टम: ए फ्रेमवर्क फॉर एनालिसिस' (1976) के अन्तर्गत बहुदलीय प्रणालियों के विश्लेषण का एक ढाँचा प्रस्तुत किया है। सार्टोरी ने दो तरह की बहुदलीय प्रणालियों में अन्तर करने का सुझाव दिया है। सार्टोरी ने बहुदलीय प्रणाली के प्रमुख दो रूप बताए हैं 

    (1) संयत बहुलवादी प्रणालियाँ - सार्टोरी के अनुसार इस प्रकार की राजनीतिक बहुदलीय प्रणालियों में उदार नेतृत्व व उदार जनाधार पाया जाता है। यह राजनीतिक गतिशीलता से युक्त होती है। इस प्रकार की प्रणाली पर आधारित राजनीतिक दल जनता का ध्रुवीकरण करने की बजाय जन-समस्याओं पर केन्द्रित रहते हैं।

    (2) ध्रुवीकृत बहुदलीय प्रणालियाँ - सार्टोरी के अनुसार ध्रुवीकृत बहुलवादी प्रणालियाँ राजनीतिक गतिहीनता को जन्म देती हैं और कभी-कभी लोकतन्त्र को ही छिन्न - भिन्न कर देती हैं। सार्टोरी ने अपने विश्लेषण में 'डाउन्स' के विश्लेषणात्मक ढाँचे तर्कसंगत चयन ढाँचा' को बहुदलीय राजनीतिक सन्दर्भ में संशोधित करते हुए ध्रुवीकृत बहुलवाद के लक्षणों की पहचान की है।

    सार्टोरी का समस्त विश्लेषण मुख्य रूप से इसी ध्रुवीकृत बहुलवादी धारणा पर केन्द्रित है। सार्टोरी ने ध्रुवीकृत बहुलवाद को चार लक्षणों के आधार पर अन्य बहुदलीय प्रणालियों से अलग बताया है, जोकि अग्रलिखित हैं -

    1. इसमें आम तौर पर पाँच से अधिक विचारणीय दल' पाये जाते हैं। 'विचारणीय दल' का अर्थ यह नहीं कि वह चुनाव जीतने में समर्थ हो, अपितु इसका अर्थ यह है कि प्रचलित व्यवस्था के अन्तर्गत उसका अपना महत्व हो।
    2. ध्रुवीकृत बहुलवादी प्रणाली के अन्तर्गत 'विचारणीय दलों' के बीच बहुत ज्यादा विचारधारात्मक दूरी पायी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वहाँ राजनीतिक मतभेद इतने गहरे होते हैं कि नीति के मुद्दों पर न तो विशिष्टवर्ग एकमत होते हैं, न जन-साधारण ही परस्पर सहमत होते हैं।
    3. तृतीय लक्षण यह है कि यह प्रणाली बहुध्रुवीय होती है, अर्थात् इसमें दो से अधिक ध्रुव पाये जाते हैं, जिनमें एक केन्द्रीय ध्रुव भी हो सकता है। ध्रुव का अर्थ है - ऐसे गुणों विचारों, मान्यताओं, नीतियों और कार्यक्रमों का समुचय जो अपने जैसे अन्य समुच्चयों के विरुद्ध हो। इस प्रकार वहाँ एक केन्द्रीय विचारधारा से परे अनेक परस्पर विरोधी विचारधाराएँ पाई जाती हैं।
    4. अंतत: चतुर्थ लक्षण यह है कि इसमें उग्र बहुलवाद के कारण अपकेन्द्रीय प्रवृत्ति पाई जाती है, अर्थात् भिन्न - भिन्न विचार रखने वाले समूह केन्द्रीय विचारधारा से दूर हटने की कोशिश में रहते हैं।

    इस प्रकार ध्रुवीकृत बहुलवादी प्रणाली के अन्तर्गत पाँच से अधिक 'विचारणीय दलों' की प्रतिस्पर्धा उन्हें विचारधारात्मक, संजातीय धार्मिक, भाषाई या अन्य किसी ऐसे स्तर पर पृथक-पृथक शिविरों में नहीं बाँट देती हैं, अपितु किसी एक स्तर पर चलने वाली प्रतिस्पर्धा तीन या चार दलों तक सीमित दलों तक सीमित रहती है।

    ध्रुवीकृत बहुलवादी प्रणाली के अन्तर्गत प्रायः सारी राजनीति एथ केन्द्रीय दल के चारो ओर मंडराती रहती है। इसमें विपक्ष की रचनात्मक या उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका की विशेष गुंजाइश नहीं रहती है।

    वस्तुत: दलीय प्रणालियों के विश्लेषण में अब तक बहुदलीय प्रणालियों पर बहुत कम विचार हुआ है। सार्टोरी ने अपना विश्लेषण प्रस्तुत करके इस दिशा में अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

    Post a Comment

    0Comments
    Post a Comment (0)

    #buttons=(Accept !) #days=(20)

    Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
    Accept !