Tuesday, 25 January 2022

आमण्ड द्वारा प्रतिपादित संरचनात्मक प्रकार्यवाद सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।

आलमंड द्वारा प्रतिपादित संरचनात्मक प्रकार्यवाद सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।

  1. जी ए आलमंड के संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम की व्याख्या करें।

जी ए आलमंड का संरचनात्मक प्रकार्यवाद सिद्धांत

जी. ए. आलमंड राजनीतिक व्यवस्था विश्लेषण हेतु 'संरचनात्मक-प्रकार्यवादी' दृष्टिकोण के विशिष्ट व्याख्याकार माने जाते हैं। आलमंड ने राजव्यवस्था के प्रकार्यात्मक सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसे ही आलमंड का ‘संरचनात्मक-प्रकार्यवाद' का सिद्धांत कहा जाता है। आलमंड द्वारा प्रतिपादित संचनात्मक-प्रकार्यवाद को निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत भली प्रकार वर्णित किया जा सकता है -

आलमंड के अनुसार राजनीतिक व्यवस्था

आलमंड ने सर्वप्रथम राजनीतिक व्यवस्था की व्याख्या करते हुए इसकी चार प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया। इन्हें आलमंड द्वारा 'अन्तः-क्रिया के औचित्यपूर्ण प्रतिमान' कहा गया है। यह प्रतिमान निम्नलिखित हैं -

  1. प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था की कुछ संरचनाएँ होती हैं, उनमें से कुछ अधिक विशेषीकृत होने के कारण कम कार्यकुशल होती हैं तो वहीं दूसरी ओर कुछ अन्य संरचनाएँ कम विशेषीकृत होने के कारण कम कार्यकुशल होती हैं।
  2. किसी भी राजनीतिक व्यवस्था एवं इसकी संरचनाओं में कुछ अन्तर भी विद्यमान हो सकते हैं, परन्तु सभी व्यवस्थाओं में किये जाने वाले कार्य समान होते हैं।
  3. राजनीतिक व्यवस्थाएँ सामाजिक व्यवस्था का ही अंग होती हैं अतः प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था की अपनी संस्कृति होती है। यह संस्कृति परम्परागत और आधनिक लक्षणों का सम्मिश्रण होती है।
  4. राजनीतिक संरचनाएँ ऐसी भी होती हैं जिनके द्वारा अनेक कार्यों का सम्पादन किया जाता है, इन्हें 'बहुकार्यक' कहा जाता है।

संरचनात्मक प्रकार्यात्मक व्यवस्था के चरण

आलमंड ने ईस्टन की भांति राजनीतिक व्यवस्था की संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक व्याख्या करते हुए इसके प्रमुख 3 (तीन) चरण स्वीकार किये हैं। इनका विश्लेषण अग्रलिखित प्रकार से किया जा सकता है -

राजनीतिक व्यवस्था के निवेश - आलमंड ने व्यवस्था के निवेश के तौर पर प्रमुख रूप से दो तत्वों को स्वीकार किया है -

  1. माँग - आलमंड ने निवेश के रूप में सर्वप्रथम जिस तत्व की व्याख्या की है वह “माँगें" हैं। उसके अनुसार प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में माँगों का निवेश निरन्तर होता रहता है। उसने निवेश के रूप में आने वाली माँगों को प्रमुख रूप से चार श्रेणियों में विभक्त किया है। ये श्रेणियाँ हैं -
    1. राजनीतिक समाजीकरण व भर्ती - यह वो माँगें हैं जोकि वस्तुओं और सेवाओं के वितरण या आवंटन से सम्बन्धित होती हैं।
    2. हित स्पष्टीकरण - यह माँगें विविध व्यवहारों को नियन्त्रित करने से सम्बन्धित होती हैं।
    3. राजनीतिक सहभागिता अथवा हित समूहीकरण - यह माँगें व्यवस्था में राजनीतिक सहभागिता से सम्बन्धित होती हैं।
    4. राजनीतिक संचार - यह माँगें राजनीतिक व्यवस्था में सूचनाओं की प्राप्ति व विचारों की अभिव्यक्ति से सम्बन्धित होती हैं।
  2. समर्थन - आलमंड द्वारा 'माँगों' के समान ही समर्थन को भी चार श्रेणियों में विभक्त किया गया है, जोकि अग्रलिखित हैं -
    1. द्रव्यात्मक समर्थन - यह एक प्रकार का समर्थन है जोकि भावुकता से प्रेरित होता
    2. आज्ञाकारिता आधारित समर्थन - यह समर्थन एक प्रकार का बाध्यकारी अपेक्षात्मक समर्थन होता है जोकि समाज, व्यवस्था अथवा संगठन में नागरिकों की पद व स्थान तथा उससे जुड़ी आज्ञाकारिता से जुड़ा होता है।
    3. सहभागिता आधारित समर्थन - यह समर्थन राजनीतिक व्यवस्था में सहभागिता से प्रेरित होता है और सहभागिता सुनिश्चित होना इस समर्थन की पूर्व-अपेक्षा होती है।
    4. श्रद्धात्मक समर्थन - यह समर्थन राजनीतिक व्यवस्था में पूर्व प्रचलित आस्था, मूल्यों व श्रद्धा से प्रेरित होता है।

निवेश रूपान्तरण प्रक्रिया - आलमंड के संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक विश्लेषण का मध्यवर्ती चरण' 'निवेश रूपी माँगों व समर्थन के रूपान्तरण' की प्रक्रिया है। आलमंड ने इस रूपान्तरण प्रक्रिया को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया है। यह अग्रलिखित हैं -

  • रूपान्तरण के राजनीतिक प्रकार्य वर्ग - इस प्रकार की रूपान्तरण प्रक्रिया में माँगों को संसाधित करके रूपान्तरण के योग्य बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में केवल सरकारी संरचनाएँ नहीं अपित गैर-सरकारी संरचनाएँ भी सम्मिलित होती हैं। इस प्रक्रिया में राजनीतिक दल, दबाव समूह और हित समूह तथा अन्य संगठन किसी न रूप में भाग लेते हैं।
  • रूपान्तरण के शासकीय प्रवर्ग - इस रूपान्तरण प्रक्रिया में प्रमुख रूप से शासन व प्रशासन की संरचनाएँ सम्मिलित हैं। इसमें माँगों को सत्तात्मक या आधिकारिक निर्णयों की स्थिति तक पहुँचाने की औपचारिकताएँ सम्मिलित होती हैं।

राजनीतिक व्यवस्था के निर्गत - आलमंड के अनुसार माँगों व समर्थन के निवेश तथा रूपान्तरण प्रक्रिया के उपरान्त अन्तिम रूप में 'निर्गत' (Outputs) प्राप्त होते हैं। आलमंड द्वारा निर्गतों को भी चार भागों में बाँटा गया है -

  1. निकासीय निर्गत - इस श्रेणी के निर्गतों का सम्बन्ध राजनीतिक व्यवस्था में कर वसूली, व्यक्तिगत सेवाएँ, सहयोग एवं योगदान जैसी गतिविधियों से होता है।
  2. नियामक निर्गत - इस प्रकार के निर्गत मानवीय व्यवहार के नियमन व नियन्त्रण से सम्बन्धित होते हैं।
  3. वितरणात्मक निर्गत - इन निर्गतों में वस्तुओं, सेवाओं, लाभों, अवसरों, सम्मानों इत्यादि का आवटन सम्मिलित होता है।
  4. प्रतीकात्मक निर्गत - इस श्रेणी के निर्गतों में मूल्यों की पुष्टि तथा राजनीतिक प्रतीकों का प्रदर्शन, नीतियों और उद्देश्यों की घोषणा से सम्बन्धित होता है।

इस प्रकार उपर्युक्त चरणों में आलमंड ने अपने संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम के माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था का विश्लेषण प्रस्तुत किया है। आलमंड ने यह प्रतिपादित किया है कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की क्षमता इस बात में निहित है कि वह किस सीमा तक आगत को निर्गत में रूपान्तरित करने की क्षमता रखती है। इस रूपान्तरण की क्षमता को उसने व्यवस्था की क्षमता कहा है। आलमंड आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था की व्याख्या इसी आधार पर करते हुए कहता है कि वह व्यवस्था ही आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था है जिसकी राजनीतिक संस्कृति विशेषीकृत होती है। इस प्रकार वह संस्कृति विशेषीकरण के आधार पर राजनीतिक व्यवस्थाओं का विभाजन करता है। 


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