Thursday, 1 October 2020

Hindi Essay on "Meerabai", "मीराबाई पर निबंध", "Meerabai par Nibandh" for Students

Essay on Meera Bai In Hindi: इस लेख में हम पढ़ेंगे मीराबाई पर निबंध जिसमें हम जानेंगे "Meerabai par Nibandh", "Essay on My Favorite Poetess Mirabai in Hindi", "mirabai ka charitra" आदि। Essay Meera Bai In Hindi.

Hindi Essay on "Meerabai", "मीराबाई पर निबंध", "Meerabai par Nibandh" for Students

Hindi Essay on "Meerabai", "मीराबाई पर निबंध", "Meerabai par Nibandh" for Students

मीराबाई जोधपुर राज्य के अंतर्गत मेड़ता प्रान्त के राठौर रतनसिंह की इकलौती पुत्री थीं। इनका जन्म सन् 1498 में हुआ। अपने दादा और पिता की परम्परा से मीराबाई ने वैष्णव भक्ति पाई थी। 'जब बच्चे गुडे-गुड़ियों से खेला करते हैं तब ये एक साधु द्वारा प्राप्त गिरिधरजी की मूर्ति से दिल बहलाती थीं।

इनका विवाह चित्तौड़ के सिसौदिया कुल-तिलक, महाराजा साँगा के कुँवर भोजराज के साथ हुआ। विवाह के उपरांत मीरा चित्तौड़ आ गई। अब ये चित्तौड़ के भावी राणा की रानी थीं। इनका जीवन बड़ा सुखमय था। परन्तु दुष्ट विधि से इनका यह सुहाग न देखा गया। विवाह हुए अभी दस वर्ष भी नहीं वीते थे कि कठोर काल ने कुमार भोजराज को इस दुनिया से उठा लिया। इस घटना से मीराबाई के जीवन में भारी परिवर्तन हो गया । मारवाड़ की राजकुमारी और मेवाड़ की होने वाली महारानी इस भीषण आघात के कारण स्वेच्छा से दर-दर की भिखारिणी और प्रेम-दिवानी हो गई। 

पति की मृत्यु के पश्चात् ये मर्त्यलोक के सब नाते तोड़ अमर्त्य स्वामी गिरधरलालजी की सेवा में लग गईं। इनका आचार-व्यवहार विलकुल विरक्त-साधुओं का सा हो गया। देश-विदेश के साधु महात्मा इनके सत्संग और कीर्तन में सम्मिलित होने को आया करते थे और इनके घर पर सदा भगवद्भक्तों की भीड़ लगी रहती थी। संवत् १५८४ की सीकरी की लड़ाई में मीरावाई के पिता रत्नसिंह राठोड़ काम आये। अगले वर्ष मीराबाई के ससुर राणा साँगा भी चल बसे। तब उनके देवर राणा रत्नसिंह ने तीन वर्ष राज्य किया। रत्नसिंह के बाद उसका सौतेला भाई विक्रमाजीत मेवाड़ का राणा बना। विक्रमाजीत को मीरा बाई के महल में साधुओं का आना-जाना लोक-मर्यादा के विरुद्ध प्रतीत होता था, किन्तु भक्त लोग अपने को लोक मर्यादा से परे समझते हैं। मीराबाई तो गिरधर गोपाल के अतिरिक्त और किसी का अधिकार ही नहीं मानती थीं

मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरा न कोई।

जाके सिर मोर-मुकुट मेरो पति सोई॥ 

इनके घरवालों ने इनकी इस मनोवृत्ति को बदलने के लिए बहुत कुछ उपाय किये। जिन सहेलियों को इनके विचार-परिवर्तन का कार्य सौंपा गया था वे मीरा पर कोई प्रभाव न डाल सकीं बल्कि स्वयं ही उनके रंग में रंग गई। मीरा तो श्याम-रंग में रंगी हुई थीं, उनपर दूसरा रंग कैसे चढ़ सकता था।

जब समझाने-बुझाने के सब उपाय निष्फल गये तब इनको भगवत्-चरणामृत के बहाने विष का प्याला भेजा गया। इन्होंने प्रसन्नतापूर्वक विष का प्याला पी लिया पर उससे भी उनका कुछ नहीं बिगड़ा।

जब घर के लोगों की ओर से इनके मार्ग में और भी विघ्नवाधाएँ उपस्थित की जाने लगी तब ये अपने पीहर मेड़ता चली गई। मेड़ता का शासक उस समय मीराबाई का ताऊ राव वीरमदेव था। राणा साँगा की मृत्यु के बाद राजस्थान में जोधपुर का मालदेव प्रबल हो उठा। उसने राव विरमदेव से मेड़ता छीन लिया। इधर दिल्ली पर शेरशाह का अधिकार हो चुका था। शेरशाह ने मालदेव को दबाने के लिए जोधपुर की ओर कूच किया और मेड़ता में छावनी डाली। राव विरमदेव मालदेव के विरुद्ध शेरशाह से मिल गया।

मेड़ता में जब मालदेव के उपद्रव हो रहे थे तभी मीरा मेड़ता छोड कर वृन्दावन गई, फिर वहाँ से द्वारका धाम को पधारी। वहाँ श्री रणछोड़जी के मन्दिर में रह कर जीवन व्यतीत करने लगी। मीराबाई की मृत्यु संवत् १६०२ और १६०३ के बीच बताई जाती है।

मीराबाई का हृदय भक्ति रस से परिपूर्ण था। इनके हृदय-स्रोत से वही हुई भक्तिरस की सुधाधारा आज तक हिन्दी साहित्य को पवित्र कर रही है। इनकी अमर वाणी इनके हृदय में ईश्वर सम्बन्धी प्रेम की तीव्रता की द्योतक है। भारत की कवयित्रियों में वे शिरोमणि मानी जाती हैं और भारतीय स्त्रियों में इनका नाम गौरव की वस्तु है।


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