Friday, 4 October 2019

गीत फरोश भवानी प्रसाद मिश्र । Geet farosh Bhavani Prasad Mishra। जी हाँ हुजूर मैं गीत बेचता हूँ

गीत फरोश भवानी प्रसाद मिश्र की एक प्रसिद्ध रचना है। गीतफरोश' मिश्र जी का प्रथम काव्य संकलन भी है। जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ नाम से भी इस कविता को जाना जाता है। आज के लेख में सभी पाठक गीत फरोश कविता  तथा इस कविता की व्याख्या अर्थात Geet farosh Summary in Hindi पढेंगे।

    गीत फरोश (geet farosh)
    (भवानीप्रसाद मिश्र)

    जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
    मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
    मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

    जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा,
    बेकाम नहीं हैं, काम बताऊँगा,
    कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
    कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
    यह गीत सख्त सर-दर्द भुलाएगा,
    यह गीत पिया को पास बुलाएगा!
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    जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको,
    पर बाद-बाद में अक्ल जगी मुझको,
    जी, लोगों ने तो बेच दिए ईमान,
    जी, आप न हों सुन कर ज़्यादा हैरान-
    मैं सोच समझ कर आखिर
    अपने गीत बेचता हूँ,
    जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
    मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
    मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

    यह गीत सुबह का है, गा कर देखें,
    यह गीत गज़ब का है, ढा कर देखें,
    यह गीत ज़रा सूने में लिक्खा था,
    यह गीत वहाँ पूने में लिक्खा था,
    यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,
    यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है!

    यह गीत भूख और प्यास भगाता है,
    जी, यह मसान में भूख जगाता है,
    यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर,
    यह गीत तपेदिक की है दवा है हुजूर,
    जी, और गीत भी हैं दिखलाता हूँ,
    जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ।

    जी, छंद और बेछंद पसंद करें,
    जी अमर गीत और वे जो तुरत मरें!
    ना, बुरा मानने की इसमें बात,
    मैं ले आता हूँ, कलम और दवात,
    इनमें से भाये नहीं, नये लिख दूँ,
    जी, नए चाहिए नहीं, गए लिख दूँ!
    मैं नए, पुराने सभी तरह के
    गीत बेचता हूँ,
    जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ
    मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ।

    मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!
    जी, गीत जनम का लिखूँ मरण का लिखूँ,
    जी, गीत जीत का लिखूँ, शरण का लिखूँ,
    यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
    यह गीत पित्त का है, यह बादी का!
    कुछ और डिजाइन भी हैं, यह इलमी,
    यह लीजे चलती चीज़, नई फ़िल्मी,
    यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत,
    यह दुकान से घर जाने का गीत!

    जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात,
    मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात,
    तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,
    जी, रूठ-रूठ कर मन जाते हैं गीत!
    जी, बहुत ढेर लग गया, हटाता हूँ,
    गाहक की मर्ज़ी, अच्छा जाता हूँ,
    या भीतर जाकर पूछ आइए आप,
    है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप,
    क्या करूँ मगर लाचार
    हार कर गीत बेचता हूँ!
    जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ,
    मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

    Geet farosh /गीत फरोश  व्याख्या सहित

    प्रसंग – 'गीतफरोश' कविता भवानीप्रसाद मिश्र के पहले काव्य संग्रह में संकलित है तथा यह प्रयोगशील कविता के आरंभिक दौर की एक महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित रचना है। व्यंग्यात्मक स्वर में लिखी गई यह कविता बदलते हुए समय में कविकर्म में आने वाले बदलाव की ओर संकेत करती है। कविता के आरंभ में ही स्पष्ट हो जाता है कि बदलते समाज में कविता खरीदी-बेची जाने वाली चीज हो गई है। अतः कवि विवश होकर फेरी वाले की शैली में गीत बेचने की बात करता है।

    व्याख्या - कवि कहता है कि मैं गीत बेचता हूँ और ग्राहक की मर्जी के अनुसार तरह-तरह के सभी किस्म के गीत बेचता हूं। वह शुद्ध व्यावसायिक स्वर में कहता है कि पहले गीत देख लें, बाद में दाम बता दूंगा। ये गीत निरर्थक नहीं हैं, इन की उपयोगिता या लाभ भी बताए जा सकते हैं कि ये किस काम में आते हैं। कवि ने मौज मस्ती और पस्ती दोनों ही स्थितियों में गीत लिखे हैं। कवि अपने गीतों की उपयोगिता गिनाते हुए कहता है कि यह गीत ऐसा है जो सख्त सिरदर्द को भी दूर कर देता है और यह गीत ऐसा है जो पिया को पास बुला देता है। कवि अत्यंत नाटकीय लेकिन सहज ढंग से कहता है कि पहले-पहल जब मैंने गीत बेचना आरंभ किया तो शर्म आई लेकिन बाद में बुद्धि आ गई। जहां लोग किसी भौतिक वस्तु की भांति अपना ईमान तक बेच डालते हैं वहां गीतकार गीत क्यों नहीं बेच सकता। इसमें हैरान होने की कोई बात ही नहीं है, इसलिए सोच समझकर आखिर मैंने गीत बेचना अर्थात् अपनी कलम की स्वतंत्रता को कुछ पैसों के लिए बेचना आरंभ कर दिया।

    अपने गीतों की विविधता के विषय में कवि का कहना है कि यह गीत सुबह का है इसमें जाकर आप देख सकते हैं। यह गीत गजब का है, इसके द्वारा आप गजब ढाकर देख सकते हैं। कवि ने हर प्रकार की स्थितियों और मनः स्थितियों में गीत लिखे हैं। एक गीत सूनेपन में लिखा था तो दूसरा पूना शहर में लिखा था। वह व्यंग्यात्मक स्वर में कहता है कि यह गीत ऐसा है जो पहाड़ों पर भी चढ़ सकता है और दूसरा गीत ऐसा है जिसे जितना आगे बढ़ाना चाहो बढ़ सकता है। यह गीत ऐसे प्रभाव वाला है कि इसे सुनकर भूख-प्यास दूर हो जाती है और यह गीत ऐसा है जो भुवाली नामक तपेदिक के अस्पताल की हवा जैसा असरदार है। एक अन्य गीत तपेदिक की दवा के समान है। इस प्रकार कवि सीधे-सादे और अटपटे लगने वाले सभी प्रकार के गीत बेचता है।

    कवि एक अनुभवी व निपुण व्यवसायीक के लहजे में कविता के ग्राहकों को संबोधित करते हुए कहता है कि यदि ये गीत पसंद न आ रहे हों तो और गीत भी है जिन्हें मैं दिखला सकता हूं। यदि आप सुनना चाहें तो मैं इन्हें गा भी सकता हूँ। इनमें छंद और बिना छंद वाले हर प्रकार के गीत पसंद किए जाने लायक हैं। इनमें ऐसे गीत भी हैं जो अमर या कभी न मिटने वाले हैं और ऐसे गीत भी हैं जिनका प्रभाव तुरंत समाप्त हो जाता है। कवि अपने व्यवसाय को चलाने के लिए समझौतावादी दृष्टिकोण अपनाता है और हर तरह की मांग को पूरा करने के लिए तैयार रहता है। अतः स्पष्ट कर देता है कि यदि ये गीत पसंद न आ रहे हों तो इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है, मेरे पास तो कलम और दवात है, यदि ये गीत अच्छे नहीं लगे हैं तो नए गीत लिख देता हूं। और यदि नये नहीं चाहिए तो उन गीतों को लिख दूं जो गए अर्थात् विगत काल के हो चुके हैं। आजकल कवि धंधा दुहरा चल रहा है-कलम से गीत लिखते हैं और फेरीवाले की तरह कंधे पर रखकर बेचते हैं। कुछ घंटे गीत को लिखने में लगते हैं और कुछ उन्हें बेचने के लिए फेरी लगाने में। लेकिन बेचने में लगी इस देरी के दाम आपसे वसूल नहीं करूंगा। मैं तो नए और पुराने सभी तरह के गीत बेचता हूं।

    कवि के अनुसार उसने जन्म और मरण दोनों ही अवसरों के लिए गीत लिखे हैं। कभी विजयगीत लिखे हैं और कभी शरण गीत। कोई गीत रेशम का है, कोई खादी का। कोई पित्त का है, कोई बादी का। कुछ अन्य डिजाइन के गीत भी हैं। इनमें इल्म वाला गीत भी है और फिल्मी गीत भी, जो नई और चलती चीज़ है। इनमें सोच-सोचकर मर जाने का गीत भी है। इन सब 'रेशमी गीत, शरण गीत, फिल्मी-गीत' आदि गीतों के डिज़ाइन की सांकेतिकता कवि जीवन की विडंबना और विवशता को उभारती है।

    कवि का स्वर व्यंग्यात्मक होते हुए भी वस्तुस्थिति की गंभीरता की ओर संकेत करता है। कवि कहता है कि यह सब आपको दिल्लगी की बात लगती होगी लेकिन इसमें हंसी की कोई बात नहीं है। मैं तो दिन-रात लिखता ही रहता हूँ इसलिए तरह-तरह के गीत बन जाते हैं। कभी ये गीत रूठते भी हैं। लेकिन मैं पुनः उन्हें मना लेता हूँ। ये सारे गीत जो दिखाए हैं इनका ढेर लग गया है, ग्राहक की मर्जी है यदि नहीं खरीदते तो इन्हें हटाए लेता हूँ। बस अब अंतिम एक गीत और दिखलाता हूँ। या फिर कैसा गीत चाहिए- इसके बारे में आप भीतर अपने घर में जाकर पूछ आइए। वैसे यह सही है कि गीत बेचना पाप है लेकिन मैं लाचार हूँ-अतः हारकर गीत बेच रहा हूँ। कवि की लाचारी अंत में उसके द्वारा वस्तु स्थिति की विवश स्वीकृति की ओर संकेत करती है। इस प्रकार इस भौतिकतावादी समाज में कवि अपनी और अपने गीतों की स्वतंत्र चेतना को बेचने के लिए विवश है।

    विशेष-सरलता, सीधापन और आत्मीयता भवानीप्रसाद मिश्र की काव्यभाषा की सामान्य विशेषताएं हैं। प्रस्तुत कविता में भी बोलचाल की सीधी सरल भाषा प्रयुक्त हुई है। लेकिन सीधी, सरल होने पर भी यह बहुत सशक्त और भंगिमायुक्त है।

    तुकबंदी तथा “अपने गीत बेचता हूँ: जी हां, हुजूर मैं अपने गीत बेचता हूँ"-इन पंक्तियों को दुहराकर कवि ने अपने व्यंग्य को मात्र तीव्रता ही प्रदान नहीं की है बल्कि साहित्य और समाज में आते जा रहे अनिवार्य बदलावों की सूचना भी दी है।

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