आज के अतीत का सारांश - भीष्म साहनी

आज के अतीत का सारांश : आज के अतीत महान कथाकार तथा साहित्यकार भीष्म साहनी की आत्मकथा है। भीष्म साहनी भारत के बँटवारे और साम्प्रदायिक दं...

आज के अतीत का सारांश : आज के अतीत महान कथाकार तथा साहित्यकार भीष्म साहनी की आत्मकथा है। भीष्म साहनी भारत के बँटवारे और साम्प्रदायिक दंगों पर आधारित अपने उपन्यास तमस से साहित्य जगत में बहुत लोकप्रिय हुए थे। सन् 2003 में 'आज के अतीत' शीर्षक से भीष्म जी की आत्मकथा प्रकाशित हुई थी।

    आज के अतीत का सारांश - भीष्म साहनी

    इस लेख की शुरूआत वे मुम्बई के निकट भिवंडी नगर में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों के करुण चित्रण से करते हैं। पूरे नगर में दहशत, चुप्पी और मनहूसियत फैली पड़ी थी। कहीं-कहीं कोई अपनी छत पर खड़ा था नीचे जगह-जगह पर पुलिस वाले ऐसे फैले हुए थे कि भविष्य में कोई दुर्घटना न हो। लोग यहाँ से वहाँ भागकर अपनी जान न जाने कैसे बचा पाए होंगे और कितने मर गए होंगे यह अनुमान लगाना कठिन है क्योंकि घरों में और बाहर बरतन, कपड़े, तोते का पिंजरा, चूल्हें के ऊपर चढ़ी हुई केतली आदि बहुत-सा सामान बिखरा पड़ा था। खड्डियों का शहर भिवंडी दंगों के कारण जगह-जगह लगी आग में झुलसा पड़ा था। चारों ओर डरावने दृश्य मन को कंपा रहे थे। जीवन जैसे थम-सा गया था। ऐसा लगता था कि बसा हुआ नगर किसी खिली फुलवाड़ी जैसा आभास देता है परन्तु वीरान नगर दुर्भाग्य के ढेर-सा लग रहा था।

    यह सब देखकर लेखक को महसूस हुआ कि धर्म और जाति के नाम पर ताण्डव मचाने वाले अत्याचारियों और उनसे भयभीत लोगों की चीख-पुकार अब भी वे सुन पा रहे हैं। कहीं-कहीं शरणार्थी शिविर भी लगे हुए थे। कई जगह हिंद-मस्लिम लोगों के साझा काम-धंधे के उदाहरण भी मिले। जो धर्म की आग में सब स्वाहा हो चके थे।

    इसके बाद वे दिल्ली लौटे। किंतु समय बीतने पर भी भिवंडी का रोंगटे खड़े कर देने वाला वह अनुभव वे नहीं भुला पाए। उन्होंने उन यादों को एकाएक कर लिखना शरू कर दिया। उनका ध्यान रावलपिंडी में होने वाले मौत के ऐसे ही नंगे नाच की ओर चला गया। कांग्रेस पार्टी के नेताओं, समाज, सुधारकों, बुद्धिजीवियों और न जाने कौन-कौन से समझदार हिंदू-मुस्लिम लोग वहाँ की आग को बुझाने की कोशिश अंग्रेजी सरकार से करते रहे पर परिणाम कुछ न निकला। भीष्म जी का विचार है कि किसी उपन्यास को लिखने के लिए भावनाओं का तूफान चाहिए और भिवंडी नगर के दंगों ने मुझमें रावलपिंडी के दंगों के अनुभवों का तूफान ला दिया था क्योंकि दोनों में समानता थी। उन्हें याद आता है सरदारों की बस्ती का वह दश्य जहाँ अनेक स्त्रियों ने अपनी आबरू बचाने के लिए कँए में छलांग लगाई थी और उन सबकी लाशें फलकर ऊपर आ गई थी बच्चों की लाशें भी उनकी लाशों में उलझी पड़ी थी। कई सरदार पागल-से होकर उन्हें देख-देखकर बिलख पड़ते थे तो कभी गुरुवाणी का पाठ करने लगते थे।

    भीष्म जी ऐसे भयानक दृश्यों को लिखते चले गए। उनका विचार था कि उपन्यास लिखते समय यह जरूरी नहीं होता कि कोई घटना और पात्र वास्तविक है या नहीं, जरूरी यह होता है कि काल्पनिक पात्र और घटना का स्थान आदि भी विश्वसनीय लगे। जिनसे जीवन के यथार्थ को पकड़ने और स्थितियों को अनुभव करने का मौका मिल सके। इसलिए उनका यह भी मानना है कि जीवन में घटने वाली असली घटना का हू-ब-हू बयान करने के स्थान पर कथानक के अनुरूप नई-नई स्थितियों का आविष्कार कल्पना द्वारा ही किया जाना चाहिए नहीं तो यह पुस्तक केवल आँकड़ों और तथ्यों का नीरस संग्रह ही बनकर रह जाएगी। इसलिए उपन्यास लिखते समय आँखों के सामने घूम जाने वाले दृश्य और मन में उठने वाले उबाल को ‘लिखते जाना चाहिए। किसी वास्तविक आँकड़ों की तलाश नहीं करनी चाहिए।

    इसके बाद वे लिखते हैं कि उन्होंने उस उपन्यास में एक नत्थू नाम के सूअर मारनेवाले व्यक्ति को कभी नहीं देखा था पर उसका चित्रण बहुत प्रभावशाली बन गया क्योंकि वह धर्म के अंधे लोगों की मार-काट की तरह असली लगता था। इसी प्रकार लीजा और रिचर्ड तथा मुराद अली जैसे पात्र भी काल्पनिक थे। लेखक की यह किताब छप गई। सबने इसकी प्रशंसा की।

    प्रिय विद्यार्थी! आपकी सूचना के लिए बता दूं कि लेखक जिस उपन्यास का यहाँ जिक्र कर रहा है, वह है, उनका प्रसिद्ध उपन्यास-'तमस'। अब वे इसी उपन्यास पर गोविन्द निहलानी द्वारा बनाई गई फिल्म के विषय में बता रहे हैं कि उपन्यास छपने के लगभग दस वर्ष बाद गोविंद निहलानी ने फिल्म बनाई तो उसमें रावलपिंडी के घरों, मुहल्लों, के साथ-साथ गुरुद्वारा भी फिल्म स्टूडियों के अंदर बनाया गया था। यह सब हू-ब-बू वैसा ही जीता जागता लगता था। शरणार्थियों का सीन, जलसा-जुलूस आदि सब कुछ एकदम सजीव लग रहे थे। वहाँ पर एक बूढ़ी महिला तो सच में रिफ्यूजी ही थी जिससे पता चलता है कि 20-21 वर्ष बाद भी देश के बँटवारें की कडुवाहट जिंदा थी। लेखक स्वयं भी सरदार जी का रोल कर रहे थे। लम्बी दाढ़ी और पगड़ी वाले कास्ट्यूम में गर्मी से राहत पाने के लिए एक केविन में चारपाई पर आराम कर रहे थे कि अचानक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री स्मिता पाटिल उनसे मिलने आ पहुँची। वे भीष्म जी से बहुत प्रभावित थी। फिल्म की कथा और उसके उद्देश्य की सफलता पर उन्हें बधाई देने और फिल्म में काम करने की इच्छा जताने आई थीं। भीष्म साहनी इस बात को कभी नहीं भूल पाए कि स्मिता पाटिल जैसी बड़ी अभिनेत्री ने भी इसे पसंद किया था।

    इस प्रकार उनकी आत्मकथा ‘आज के अतीत' का यह अंश यही समाप्त होता है। 

    आज के अतीत के प्रमुख बिंदु

    देश के बँटवारे के बाद हुए साम्प्रदायिक दंगों का सजीव और डरावना चित्र खींचा गया है जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाना स्वाभाविक है। 

    जीते-जागते, हँसते-खेलते हुए नगर और दंगों की आग में झुलसे पड़े वीरान नगर का अंतर स्पष्ट किया गया है। साथ-ही-साथ हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक साझे व्यापार के निशान उस नगर को और भी करुण तथा टीस भरे बना रहे थे। 

    साक्षात्-सजीव अनुभव और भावना का उबाल किसी भी संवेदनशील लेखक को लेखन-कार्य के लिए मजबूर कर दिया करता है। इसका कारण वे यह भी बताते हैं कि एक सफल उपन्यास या कहानी केवल वास्तविक तथ्यों तथा आँकड़ों के आधार पर ही नहीं बनती बल्कि भावना के उवाल को कागज पर उतारते चले जाने से बनती एक सफल उपन्यास में वास्तविक पात्र और घटनाएँ तथा काल्पनिक पात्र और घटनाएँ इस प्रकार घुलमिल जाती हैं कि उन्हें अलग कर पाना कठिन हुआ करता है। यहाँ तक कि, काल्पनिक पात्र और घटनाएँ ही उस रचना को सजीव और कालजयी बना देती हैं। 

    भीष्म साहनी ने भारत के बँटवारे और साम्प्रदायिक दंगों पर आधारित 'तमस' नाम के प्रसिद्ध उपन्यास की रचना-प्रक्रिया का साक्षात् और सहज चित्र खींचा है। छपने से पहले या बाद में जिसने भी यह उपन्यास पढ़ा, वह बहुत प्रभावित हुआ। 

    प्रसिद्ध फ़िल्मकार गोविन्द निहलानी ने इसके आधार पर एक फिल्म भी बनाई थी जिसमें एक सरदार जी का रोल भीष्म जी ने ही किया था। निहलानी की लगन, कल्पना, और भावना के उबाल ने 'तमस' उपन्यास को जीते-जागते चलचित्र में बदल दिया। यह सब भी निर्देशक की भीतरी बेचैनी का परिणाम ही था। 

    उपन्यास या कहानी लिखने की अपेक्षा फिल्म बनाने में ज्यादा कल्पना से काम लेना पड़ता है। तभी तो तमस में वर्णित घर, मुहल्ले और गुरुद्वारा सभी के सजीव और हू-ब-बू सैट फ़िल्म स्टूडियों में बनाए गए थे। इसी प्रकार जुलूस-जलसा, रिफ्यूजी के तथा घायलों के वर्णन को सजीव रूप में फिल्माना बहुत मेहनत का काम था। 

    अच्छा उपन्यास या कहानी और अच्छी फ़िल्म किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींच लेती है और प्रशंसा तथा बधाई का पात्र बनती है। इस सबके पीछे एक ही सच्चाई छिपी होती है, वह है- ‘भावना का उवाल

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