Sunday, 30 December 2018

आचरण की सभ्यता का सारांश - सरदार पूर्ण सिंह Acharan ki Sabhyata ka Saransh

आचरण की सभ्यता का सारांश - सरदार पूर्ण सिंह Acharan ki Sabhyata ka Saransh

Acharan ki Sabhyata ka Saransh
सरदार पूर्ण सिंह ने ‘आचरण की सभ्यता’ निबंध में विद्या, कला, कविता, साहित्य, धन, और राजस्व सभी से अधिक शुद्ध आचरण को महत्व दिया है। इसके लिए लेखक ने नम्रता, दया, प्रेम और उदारता को हृदय में स्थान देना आवश्यक बताया है। अच्छे आचरण वाले व्यक्ति के प्रेम और धर्म से सारे जगत का कल्याण होता है। सभी व्यक्तियों को सुख, शांति और आनद की प्राप्ति होती है। वे शान्त एवं मौन रहकर जगत की भलाई में लगे रहते हैं। सच्चे आचरण का प्रभाव सदैव मानव हृदयों पर पड़ता है। जो पुजारी मुल्ला या पादरी सच्चे आचरण वाला होता है, उसकी बातें सभी के हृदयों को प्रभावित करती हैं। 

लेखक ने गरीब पहाड़ी किसान और शिकारी राजा के उदाहरण द्वारा सच्चे आचरण का रूप स्पष्ट किया है कि किस तरह वह किसान अपने पवित्र आचरण द्वारा शिकारी के दूषित हृदय को बदल देता है। इस तरह पवित्रता और अपवित्रता दोनों से ही आचरण का निर्माण होता है। भले-बुरे विचार आचारण को बनाने में सहायक होते हैं। बाह्य जगत के व्यापार सदैव अन्तरात्मा को प्रभावित किया करते हैं। और उन प्रभावों से ही आचरण का निर्माण होता है। अच्छे-अच्छे धार्मिकों, महात्माओं एवं ऋषियों की बातें तभी हमारे अन्तःकरण को स्पर्श करती हैं, जब हम उनके से आचरण करने लगते हैं। कोई भी धर्म-सम्प्रदाय आचरण हीन व्यक्तियों के लिए कल्याणकारी नहीं हो सकता और आचरण वाले व्यक्तियों के लिए कल्याणकारी नहीं हो सकता और आचरणवाले व्यक्तियों के लिए सभी धर्म सम्प्रदाय कल्याकारी होते हैं। लेखक ने इसी कारण आचरण के विकास को जीवन का परम उद्देश्य बतलाया है। आचरण के विकास के लिए शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सामग्री के जुटाने पर बल दिया है। निष्कपट एवं सतत परिश्रमी किसान को अच्छे आचरण वाला माना है। 

लेखक का स्पष्ट विचार है कि केवल धर्म किसी जाति को उन्नत नहीं बनाता, अपितु कठोर जीवन, परिश्रम, खोज एवं सतत् प्रयत्न किसी जाति को उन्नत बनाते हैं। साथ ही संसार में सतत् परिश्रम ही आचरण का स्वर्ण हाथ आता है। कभी अकर्मण्य एवं आलसी आचारण की सभ्यता को प्राप्त नहीं कर पाते। आचरण की प्राप्ति केवल स्वप्न देखने से नहीं होती, अपितु लगातार परिश्रम करने से होती है। धर्म-पुस्तकों से कुछ नहीं होता और न आडम्बरों से शुद्ध आचरण की प्राप्ति होती है। इसलिए पहले प्राकृतिक सभ्यता प्राप्त करो, प्राकृतिक सभ्यता से मानसिक सभ्यता आयेगी और मानसिक सभ्यता के आते ही आचरण की सभ्यता प्राप्त होगी। इस आचरण की सभ्यता के प्राप्त होते ही शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक सभी संकट समाप्त हो जायेंगे। द्वेष-विद्रोह, ऊँच-नीच की भावना आदि का भेद समाप्त हो जाएगा, मानवतावाद की स्थापना होगी। सर्वत्र प्रेम और एकता का अखण्ड राज्य स्थापित हो जाएगा।

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