Thursday, 27 February 2020

Hindi Essay on “Tulsi asamay ke Sakha Dheeraj Dharam Vivek”, “तुलसी असमय के सखा धीरज धर्म विवेक हिंदी निबंध”, for Class 6, 7, 8, 9, and 10 and Board Examinations.

Hindi Essay on “Tulsi asamay ke Sakha Dheeraj Dharam Vivek”, “तुलसी असमय के सखा धीरज धर्म विवेक हिंदी निबंध”

Hindi Essay on “Tulsi asamay ke Sakha Dheeraj Dharam Vivek”, “तुलसी असमय के सखा धीरज धर्म विवेक हिंदी निबंध”
मनुष्य के जीवन में कोई नहीं जानता कि कब क्या हो जाए। सुख-दुख, आशा-निराशा,रोग-शोक, हँसी और आँसू आदि मानव-जीवन के साथ उसी तरह से लगे रहते है. जैसे दिन के पीछे रात, रात के पीछे दिन। फिर रात-दिन जैसे हमारे लिए बने हैं, उसी प्रकारसुख-दुख, आशा-निराशा आदि के सभी भाव और विकार भी हम मनुष्यों के लिए ही बने हैं। उन्हें हमीं को झेलना और सहना पड़ता है। सुख-दुख का जो भाग हमारे लिए बना है,उसे हमारे सिवा अन्य कोई भोग नहीं सकता। हँसकर भोगें या रोकर भोगें, भोगे-सहे बिना गुज़ारा नहीं। जब हम ने ही भोगना है, तो क्यों न धीरजपूर्वक, धर्मपूर्वक और प्रसन्नता से भोगें। शायद इन्हीं या इसी प्रकार की स्थितियों की तरफ इशारा करते हुए ही गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है :
“तुलसी असमय के सखा धीरज, धर्म, विवेक!"
अर्थात् बुरा समय आने पर मनुष्य का अपना धीरज, अपना मानवीय धर्म और कर्तव्य,अपना विवेक ही सच्चे मित्र का काम किया करते हैं। अर्थात् जिस प्रकार एक सच्चा मित्र सुख-दुख की हर स्थिति में साथ निभाया करता है, उसी प्रकार धीरज, धर्म और विवेक भी मनुष्य के सुख-दुख-विशेषकर बुरे समय में सच्चे साथी और मित्र हुआ करते हैं।

धीरज या धैर्य का वास्तविक अर्थ होता है हर हालत में अपने मन-मस्तिष्क का सन्तलनबनायेरखना। जो असमय या बुरा वक्त, दुख-पीड़ा आदि आ पड़े हैं, उनके कारण अपने आपको अपनी मनुष्यता से किसी भी तरह जरा-सा भी विचलित न होने देना ही वास्तवमें धीरज है। आ गयी बुरी परिस्थिति को झेलना, उसके कारण होने वाले कष्टों का डटकरसामना करना और घबराना नहीं, हमेशा प्रसन्न रहने की कोशिश करते रहना भी धीरज काही लक्षण होता है। वास्तव में धीरज बनाये रखने से दुख हल्का पड़ जाया करता है। उससेआदमी की सहनशक्ति भी बढ़ जाती है। वह घबराता नहीं और इस प्रकार असमय याबुरा समय सरलता से कट जाया करता है। इसी कारण गोस्वामी जी ने 'धीरज' को पहलास्थान दिया है।

धर्म का अर्थ जाति-पाँति को मानना या पूजा-पाठ करना नहीं होता। ये सब भी सामान्यधर्म के अंग मात्र हुआ करते हैं। धर्म का वास्तविक अर्थ होता है अपना तथा मनष्य मात्रका भला कर पाने में समर्थ उचित कर्मों और कर्तव्यों का पालन करना! कर्त्तव्य या कर्मका बड़ा महत्त्व होता है। गीता आदि महान् ग्रन्थों के कर्म को भी एक प्रकार का योग यातपस्या कहा गया है। इसे सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण माना गया है। 'कर्म ही पूजा है' इसप्रकार के वाक्य कर्म को महत्त्व और श्रेष्ठ बनाने के लिए ही कहे गये हैं। सो असमयपड़ने के बाद यदि व्यक्ति की सबसे अधिक और मित्र के समान रक्षा तथा सहायता कोई कर सकता है, तो वह उसका अपना धर्म अर्थात् कर्त्तव्यपरायणता और कर्म ही हुआ करताहै। कर्म-रूपी धर्म का पालन करके आदमी असमय के कष्ट से एक-न-एक दिन अवश्य छुटकारा पा लेता है। इसी कारण तुलसीदास बुरे समय में भी धैर्यपूर्वक धर्म-कर्म करते रहने की बात पर बल देते हैं। इस प्रकार के धर्म-प्रेरित कर्म को असमय काल का सच्चा मित्र कहते हैं।

विवेक का सामान्य अर्थ बुद्धिमत्ता हुआ करता है। विशेष अर्थ है अच्छे-बुरे उचित-अनुचित,सत्य-असत्य का निर्णय कर पाने की क्षमता ! विवेकवान व्यक्ति उसी को कहा जाता है जो समय-असमय हर हालत में सत्य-असत्य, अच्छाई-बराई और उचित-अनुचित का ध्यान रख और विचार करके ही हर प्रकार का कार्य किया करता है । कई बार ऐसा होता है कि जरा-सी तकलीफ से घबराकर आदमी विवेक खो बैठता है। वह बुराई की राह पर चलने और बुरे कर्म करने लगता है। सोचता है. ऐसा करने से उसका दुख जाता रहेगा। परन्तु यह उसकी भूल हुआ करती है। बुराई की राह पर चलने से दुख घटने या समाप्त होने की बजाय और भी बढ़ जाया करते हैं। आदमी को कहीं का भी नहीं रहने दिया करते। इस विषम और नाशकारी स्थिति से बचने के लिए ही गोस्वामी तुलसीदास ने असमय में विवेक का दामन न छोड़ने की बात कही है। उसे असमय काल का एक सच्चा मित्र कहा है। जैसे सच्चा और अच्छा मित्र नेक सलाह देकर नेकी की राह पर डालकर मुसीबतों से बचा लिया करता है, उसी प्रकार विवेक शक्ति असमय के कारण आने वाले कष्टों, मुसीबतों से आदमी की रक्षा किया करती है। उसे कभी एक पल के लिए भी अपनेहाथ से जाने नहीं देना चाहिए।

इस प्रकार स्पष्ट है कि असमय पड़ने पर भी आदमी सुरक्षित रह सकता है। वह सहज ही उन पर विजय भी पा सकता है। कम-से-कम प्रभावी तो हो ही सकता है। इसके लिए आवश्यकता है हर हाल में धीरज बनाये रखने की, धीरज के साथ कर्त्तव्य-कमों को धर्म मानकर हमेशा करते रहने की, धर्मपूर्वक कर्म करते हए विवेकशीलता से काम लेकर बुरे मार्ग, बरे लोगों और बुरे कार्यों से बचे रहने की ! ऐसा करने वाला व्यक्ति सरलता से असमय की मार से अपना बचाव कर लेता है। जैसे सच्चे मित्र की सहायता सभी विपत्तियों से छटकारा दिलाती है, उसी प्रकार धीरज-धर्म-विवेक भी मनष्य के लिए हितकर हआ करते हैं, गोस्वामी तुलसीदास ने यही आशय स्पष्ट किया है।
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