Thursday, 6 December 2018

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का जीवन परिचय- Ishwar Chandra Vidyasagar Biography in Hindi

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का जीवन परिचय

Ishwar Chandra Vidyasagar Biography in Hindi
"बंगाल में लड़कियों को स्कूल ले जाने वाली गाडि़यों, पालकियों तथा शिक्षण संस्थाओं की दीवारों पर मनु-स्मृति का एक श्लोक लिखा रहता था। जिसका अर्थ था- ‘‘बालिकाओं को बालकों के समान शिक्षा पाने का पूरा अधिकार है।"

बंगाल में बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहन देने का महत्त्वपूर्ण कार्य ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने किया। इन्होंने अपने समय में अनेक क्षेत्रों में सुधार किये- शैक्षिक सुधार, सामाजिक सुधार और महिलाओं की स्थिति में सुधार। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का जन्म वीर सिंह नामक गाँव में हुआ था। इनकी माता बहुत अच्छे विचारों की थीं। सभी का सम्मान करना और अपना काम स्वयं करना, यह शिक्षा उन्हें अपनी माता से मिली थी।


नाम
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर
जन्म तिथि
26 सितम्बर, 1820
जन्म भूमि
पश्चिम बंगाल
माता
भगवती देवी
पिता
ठाकुरदास बन्दोपाध्याय
मृत्यु
29 जुलाई, 1891
मृत्यु स्थान
कोलकाता
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के ही विद्यालय में हुई थी। उच्च शिक्षा के लिए वे कलकत्ता (कोलकाता) के संस्कष्त विद्यालय में गए । संस्कृत की शिक्षा के साथ-साथ वे अंग्रेजी की शिक्षा भी प्राप्त करते रहे। 1839 ई0 में लॉ कमेटी की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर उन्हें विद्यासागर की उपाधि मिली।

इसके अलावा न्यायदर्शन की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर 100 रु0 तथा संस्कृत काव्य रचना पर 100 रु0 का नकद पुरस्कार दिया गया। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का हस्तलेख बहुत अच्छा था, इसलिए उन्हें मासिक छात्रवृत्ति भी मिलती थी। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने ईश्वर चन्द्र विद्यासागर को आधुनिक बंगाल काव्य का जनक माना है।

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर स्कूलों के सहायक निरीक्षक के पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने शिक्षा की बहुत सी कमियों में सुधार किया। उन्होंने बंगाल के सभी जिलों में 20 ऐसे आदर्श विद्यालय खोले जिसमें विशुद्ध भारतीय शिक्षा दी जाती थी।

उन दिनों संस्कृत कॉलेज में केवल उच्च जाति के लोगों को ही प्रवेश दिया जाता था। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि हर जाति के, हर व्यक्ति को हर प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जानते थे कि बालिकाओं की शिक्षा से ही समाज में फैली रूढि़वादिता, अन्धविष्वास और कुरीतियाँ दूर की जा सकती हैं। देश को समृद्ध  एवं योग्य नागरिक प्रदान करने के लिए बालिकाओं की शिक्षा जरूरी है। उन्होंने बंगाल में ऐसे 35 स्कूल खोले जिसमें बालिकाओं की शिक्षा का प्रबन्ध था। वे बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए मेहनती और मेधावी छात्राओं को पुरस्कार भी दिया करते थे। उन्होंने कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय से सबसे पहले एम0 ए0 की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली चन्द्रमुखी बोस को पुरस्कार दिया था।

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ब्रह्म समाज नामक संस्था के सदस्य थे। स्त्री शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने विधवा विवाह और विधवाओं की दषा सुधारने का भी काम किया। इसके लिए ईश्वर चन्द्र विद्यासागर को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

अन्त में विधवा विवाह को कानूनी स्वीकृति प्राप्त हो गई। सुधारवादी विचारधाराओं का जनता के बीच प्रचार करने के लिए ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने अंग्रेजी तथा बंगला में पत्र निकाले। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का कहना था कि कोई भी व्यक्ति अच्छे कपड़े पहनने, अच्छे मकान में रहने तथा अच्छा खाना खाने से बड़ा नहीं होता, बल्कि अच्छे काम करने से बड़ा होता है।

एक बार ईश्वर चन्द्र विद्यासागर गाड़ी में कलकत्ता से बर्दवान आ रहे थे। उसी गाड़ी में एक नवयुवक बहुत अच्छे कपड़े पहने बैठा था उसे भी बर्दवान आना था। स्टेशन पर गाड़ी पहुँची, नवयुवक ने अपना सामान ले चलने के लिए कुली को पुकारा। स्टेशन पर उस समय कोई कुली नहीं था। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने उस से कहा कि यहाँ कोई कुली नहीं है आप परेशान न हों आपका सामान मैं लिए चलता हूँ। नवयुवक खुश हो गया। उसने कहा कि मैं तुमको पूरी मजदूरी दूँगा। घर पहुँचकर वह नवयुवक ईश्वर चन्द्र विद्यासागर को पैसे देने लगा तो उन्होंने पैसे नहीं लिए।

अगले दिन बर्दवान में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के स्वागत के लिए बहुत से लोग एकत्र हुए। वह नवयुवक भी वहाँ आया। उसने देखा कि यह तो वही व्यक्ति है, जो कल मेरा सामान लेकर आया था। नवयुवक को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह लज्जित भी हुआ। जब सभा समाप्त हुई तब वह ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के घर गया और पैरों पर गिरकर क्षमा माँगी। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने समझाया कि अपना काम स्वयं करना चाहिए।

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर उन्नीसवीं शताब्दी की महान विभूति थे। उन्होंने अपने समय में फैली अशिक्षा और रूढि़वादिता को दूर करने का संकल्प लिया। अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए भी उन्होंने शैक्षिक, सामाजिक और महिलाओं की स्थिति में जो सुधार किए उसके लिए हमारे देशवासी सदैव उन्हें याद करेंगे।

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