Tuesday, 17 July 2018

सूत पुत्र कर्ण नाटक का सारांश

सूत पुत्र कर्ण नाटक का सारांश

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डॉ गंगा सहाय प्रेमी द्वारा लिखित नाटक सूतपुत्र के प्रथम अंक का प्रारंभ महर्षि परशुराम के आश्रम के दृश्य से होता है। धनुर्विद्या के आचार्य एवं श्रेष्ठ धनुर्धर परशुराम, उत्तराखंड में पर्वतों के बीच तपस्या में लीन हैं। परशुराम ने यह व्रत ले रखा है कि वह केवल ब्राह्मणों को ही धनुर्विद्या सिखाएंगे। सूत-पुत्र कर्ण की हार्दिक इच्छा है कि वह एक कुशल लक्ष्यबेधी धनुर्धारी बने। इसी उद्देश्य से वह परशुराम जी के आश्रम में पहुंचता है और स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त करने लगता है। इसी दौरान एक दिन कर्ण की जंघा पर सिर रखकर परशुराम सोए होते हैं, तभी एक कीड़ा कर्ण की जंघा को काटने लगता है, जिससे रक्त बहने लगता है। कर्ण उस दर्द को सहन करता है, क्योंकि वह अपने गुरु परशुराम की नींद नहीं तोड़ना चाहता। रक्त बहने से परशुराम की नींद टूट जाती है और कर्ण की सहनशीलता को देखकर उन्हें उसके क्षत्रिय होने का संदेह होता है। उसके पूछने पर कर्ण उन्हें सत्य बता देता है। 

परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर कर्ण को श्राप देते हैं कि मेरे द्वारा सिखाई गई विद्या को तुम अंतिम समय में भूल जाओगे और इसका प्रयोग नहीं कर पाओगे। कर्ण वहां से वापस चला आता है। 

द्वितीय अंक का सारांश 
सूतपुत्र नाटक का द्वितीय अंक द्रौपदी का स्वयंवर से प्रारंभ होता है। राजकुमार और दर्शक एक सुंदर मंडप के नीचे अपने-अपने आसनों पर विराजमान हैं। खौलते तेल के कड़ाह के ऊपर एक खंभे पर लगातार घूमने वाले चक्र पर एक मछली है। स्वयंवर में विजयी बनने के लिए तेल में देख कर उस मछली की आंख को बेधना है। अनेक राजकुमार लक्ष्य बेधने की कोशिश करते हैं और असफल होकर बैठ जाते हैं। प्रतियोगिता में कर्ण के भाग लेने पर राजा द्रुपद आपत्ति करते हैं और उसे अयोग्य घोषित कर देते हैं। दुर्योधन उसी समय कर्ण को अंग देश का राजा घोषित करता है। इसके बावजूद कर्ण का क्षत्रियत्व एवं उसकी पात्रता सिद्ध नहीं हो पाती और कर्ण निराश होकर बैठ जाता है। उसी समय ब्राह्मण वेश में अर्जुन एवं भीम सभा-मंडप में प्रवेश प्रवेश करते हैं। लक्ष्य बेधने की अनुमति मिलने पर अर्जुन मछली की आंख बेध देते हैं और राजकुमारी द्रौपदी उन्हें वर माला पहना देती हैं। 

अर्जुन द्रौपदी को लेकर चले जाते हैं। सूने सभा-मंडप में दुर्योधन एवं कर्ण रह जाते हैं। दुर्योधन कर्ण से द्रौपदी को बलपूर्वक छीनने के लिए कहता है, जिसे कर्ण नकार देता है। दुर्योधन ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन एवं भीम से संघर्ष करता है और उसे पता चल जाता है कि पांडवों को लाक्षाग्रह में जलाकर मारने की उसकी योजना असफल हो गई है। कर्ण पांडवों को बड़ा भाग्यशाली बताता है। यहीं पर द्वितीय अंक समाप्त हो जाता है। 

तृतीय अंक का सारांश 
अर्जुन एवं कर्ण दोनों देवपुत्र हैं। दोनों के पिता क्रमशः इंद्र एवं सूर्य को युद्ध के समय अपने-अपने पुत्रों के जीवन की चिंता हुई। इसी पर केंद्रित तीसरे अंक की कथा है। यह अंक नदी के तट पर कर्ण की सूर्य उपासना से प्रारंभ होता है। कर्ण द्वारा सूर्यदेव को पुष्पांजलि अर्पित करते समय सूर्यदेव उसकी सुरक्षा के लिए उसे स्वर्ण के दिव्य कवच एवं कुंडल प्रदान करते हैं। वह इंद्र की भावी चाल से भी उसे सतर्क करते हैं तथा कर्ण को उसके पूर्व वृतांत से परिचित कराते हैं। इसके बावजूद वे कर्ण को उसकी माता का नाम नहीं बताते। कुछ समय पश्चात इंद्र अपने पुत्र अर्जुन की सुरक्षा हेतु ब्राम्हण का वेश धारण कर कर्ण से उसका कवच-कुंडल मांग लेते हैं। इसके बदले इंद्र कर्ण को एक अमोघ शक्ति वाला अस्त्र प्रदान करते हैं, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता। इंद्र के चले जाने के बाद गंगा तट पर कुंती आती है। वह कर्ण को बताती है कि वही उसका ज्येष्ठ पुत्र है। कर्ण कुंती को आश्वासन देता है कि वह अर्जुन के सिवा किसी अन्य पांडव को नहीं मारेगा। दुर्योधन का पक्ष छोड़ने संबंधी कुंती के अनुरोध को कर्ण अस्वीकार कर देता है। कुंती कर्ण को आशीर्वाद देकर चली जाती है और इसी के साथ नाटक के तृतीय अंक का समापन हो जाता है। 

चतुर्थ अंक का सारांश 
डॉ गंगासहाय प्रेमी द्वारा रचित सूतपुत्र नाटक के चौथे एवं अंतिम अंक की कथा का प्रारंभ कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि से होता है। सर्वाधिक रोचक एवं प्रेरणादायक इस अंक में नाटक के नायक कर्ण की दानवीरता, वीरता, पराक्रम, दृढ़प्रतिज्ञ संकल्प जैसे गुणों का उद्घाटन होता है। अंक के प्रारंभ में एक ओर श्रीकृष्ण एवं अर्जुन तो दूसरी ओर कर्ण एवं शल्य हैं। शल्य एवं कर्ण में वाद-विवाद होता है और शल्य कर्ण को प्रोत्साहित करने की अपेक्षा हतोत्साहित करता है। कर्ण एवं अर्जुन के बीच युद्ध शुरू होता है और कर्ण अपने बाणों से अर्जुन के रथ को पीछे धकेल देता है। श्रीकृष्ण कर्ण की वीरता एवं योग्यता की प्रशंसा करते हैं, जो अर्जुन को अच्छी नहीं लगती। 

कर्ण के रथ का पहिया दलदल में फंस जाता है। जब वह पहिया निकालने की कोशिश करता है, तो श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन निहत्थे कर्ण पर बाण वर्षा प्रारंभ कर देते हैं, जिससे कर्ण मर्मांतक रूप से घायल हो जाता है और गिर पड़ता है। संध्या हो जाने पर युद्ध बंद हो जाता है। 

श्री कृष्ण कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए युद्धभूमि में पड़े कर्ण से सोना मांगते हैं। कर्ण अपना सोने का दांत तोड़कर और उसे जल से शुद्ध कर ब्राह्मण वेशधारी श्रीकृष्ण को देता है। श्रीकृष्ण एवं अर्जुन अपने वास्तविक स्वरुप में प्रकट होते हैं। श्रीकृष्ण कर्ण से लिपट जाते हैं और अर्जुन कर्ण के चरण स्पर्श करते हैं। कर्ण की मृत्यु पर अर्जुन दुखी होता है। यहीं पर नाटक समाप्त हो जाता है।


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