उपन्यास की परिभाषा और प्रकार बताइए

उपन्यास की परिभाषा और प्रकार बताइए: उपन्यास वह गद्य रूप है जिसे आधुनिक युग का महाकाव्य कहा जाता है या कहा जा सकता है। उपन्यास मानव चरित्र का चित्रांकन

उपन्यास की परिभाषा और प्रकार बताइए

उपन्यास क्या है? उपन्यास पढ़ते हुए और उपन्यास के बारे में पढ़ते हुए हम कह सकते हैं कि उपन्यास वह गद्य रूप है जिसे आधुनिक युग का महाकाव्य कहा जाता है या कहा जा सकता है। महाकाव्य में उस प्रबंध की ध्वनि है जो जीवन के बहुविध विस्तार को समेटने में सक्षम है। हमारे यहाँ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से ऐसी कृतियाँ मिलने लगती हैं जिन्हें उपन्यास की संज्ञा दी जा सकती है। उसमें गल्प का तत्व भी है और रोमांस का तत्व भी। पर सच्चाई यह है कि उपन्यास का अर्थ और स्वरूप बहुत कुछ बदलता रहा है।

उपन्यास की कोई ऐसी परिभाषा नहीं है, जो सर्वमान्य हो। फिर भी कथासम्राट प्रेमचंद यदि उपन्यास की परिभाषा दे रहे हों तो निश्चय ही वह परिभाषा सर्वमान्य होनी चाहिए। वे लिखते हैं-"मैं उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मात्र समझता हूँ। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।"

इस परिभाषा के अनुसार मानव- चरित्र का विश्लेषण ही उपन्यास का मूल लक्ष्य है। चूँकि मनुष्य एक समान होते हुए भी मानसिक स्तर पर भिन्न हुआ करते हैं, इसलिए उपन्यास की विषय वस्तु भी मानव - चरित्र के हिसाब से अलग-अलग होती है। इसी भिन्नता की पड़ताल उपन्यास करता है।

उपन्यास के दो प्रकार (Upanyas ke Prakar)

उपन्यास मानव चरित्र का चित्रांकन करता है। किसी खास उद्देश्य के चलते उपन्यास को दो वर्गों में विभाजित करना पड़ेगा - यथार्थवादी और आदर्शवादी।

यथार्थवाद: उपन्यासकार जिन चरित्रों का पाठक के समक्ष उनके यथार्थ या नग्न रूप में रख देता है, उन्हें यथार्थवादी चरित्र कहना उचित है। यहाँ लेखक को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि इसका परिणाम क्या होगा या फिर पाठकों पर कैसा प्रभाव पड़ेगा | चरित्र में कमजोरियाँ हों या खूबियाँ हों, बस उनका चित्रण भर लेखक का उद्देश्य होता है। यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, हमारी विषमताओं और हमारी क्रूरताओं का नग्न चित्र होता है। एक प्रकार से यथार्थवाद हमें निराशावादी बना देता है, मानव चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है। अपने चारों तरफ बुराई ही बुराई नजर आती है। तो फिर ऐसे यथार्थवाद की क्या उपयोगिता है हमारे जीवन में? इस बारे में प्रेमचंद की मान्यता है-" इसमें संदेह नहीं कि समाज की कुप्रथा की ओर उसका ध्यान दिलाने के लिए, यथार्थवाद अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि इसके बिना बहुत संभव है, हम उस बुराई को दिखाने में अत्युक्ति से काम लें और चित्र को उससे कहीं काला दिखाएँ, जितना वह वास्तव में है। लेकिन जब वह दुर्बलतओं का चित्रण करने में शिष्टता की सीमाओं को लाँघ जाता है तो आपत्तिजनक हो जाता है।" लेकिन इस यथार्थवादी चित्रण का एक नकारात्मक पहलू भी है। यदि मनुष्य को उपन्यासों में भी वही कुछ पढ़ने को मिले जिसे वह अपने रोजमर्रा की जिंदगी में देखता - सुनता है, तो उपन्यास पढ़ने का क्या फायदा होगा? इसलिए वह यथार्थ से हटकर एक नयी दुनिया में जीना चाहता है। 

आदर्शवाद: मनुष्य के जीवन में आपाधापी है, उत्पीड़न है, संघर्ष है, कुंठा है, संत्रास है। यदि साहित्य में भी वही कुछ देखने को मिले तो साहित्य नहीं पढ़ना ही बेहतर होगा। प्रेमचंद के शब्दों में-" अँधेरी गर्म कोठरी में काम करते-करते जब हम थक जाते हैं तो इच्छा होती है, किसी बाग में निकलकर निर्मल स्वच्छ वायु का आनंद उठाएँ। इसी कमी को आदर्शवाद पूरा करता है। वह हमें ऐसे चरित्रों से परिचित कराता है, जिनके हृदय पवित्र होते हैं, जो स्वार्थ और वासना से रहित होते हैं, जो साधु प्रकृति के होते हैं।" इस कथन से साफ जाहिर है कि प्रेमचंद यथार्थ की अपेक्षा आदर्श को पसंद करते हैं।

4.1.3 आदर्शोन्मुख यथार्थवाद

यथार्थवाद में हम किसी चरित्र को ज्यों का त्यों देखते हैं। दूसरी ओर आदर्शवाद हमें उठाकर किसी मनोरम लोक में पहुँचा देता है। दोनों के खतरे हैं। आदर्शवाद में इस बात का संदेह बना रहता है कि हम जिस चरित्र को गढ़ने जा रहे हैं, वह कहीं इस रूप में चित्रित न हो जाय, जिसे हम अपने बीच का आदमी न मानकर देवता समझ बैठें।" किसी देवता की कामना मुश्किल नहीं है, लेकिन उस देवता में प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है। 

"ऐसे उपन्यास जिनमें यथार्थ और आदर्श दोनों का पुट हो, उसे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की संज्ञा देते हैं। प्रेमचंद के अनुसार- आदर्श को सजीव बनाने ही के लिए यथार्थ का उपयोग होना चाहिए और अच्छे उपन्यास की यही विशेषता है।" उपन्यासकार की सबसे बड़ी विभूति ऐसे चरित्रों की सृष्टि है, जो अपने व्यवहार और सद्विचार से पाठक को मोहित कर ले। जिस उपन्यास के चरित्रों में यह गुण नहीं है, वह दो कौड़ी का है।" लेकिन लेखक यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि आदर्श का अर्थ यह कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि कोई भी चरित्र शत-प्रतिशत आदर्श हो । यदि वह मनुष्य है तो उसमें तो त्रुटियाँ होंगी ही। लेकिन आदर्शोन्मुख यथार्थवाद में उन त्रुटियों का वर्णन ऐसा होना चाहिए कि उसके चरित्र 'पाजिटिव' हों, जो प्रलोभनों के आगे सिर न झुकाएँ, बल्कि उसको परास्त करे, जो वासनाओं के पंजे में न फँसे, बल्कि उसको परास्त करें। ऐसे चरित्रों का पाठकों के ऊपर असर पड़ता है। प्रेमचंद की यही प्रवृत्ति उनके सभी उपन्यासों में पायी जाती है।

प्रेमचंद का दृष्टिकोण उपयोगी यथार्थसाद और आदर्शवाद के समन्वय का है। अस्वाभाविक आदर्शवाद, यथार्थवाद और अतियथार्थवाद का उन्होंने कभी समर्थन नहीं किया। उनकी स्पष्ट स्वीकारोक्ति है- "कल्पना के गढ़े हुए आदमियों में हमारा विश्वास नहीं हैं, उनके कार्यों और विचारों से हम प्रभावित नहीं होते। हमें इसका निश्चय हो जाना चाहिए कि लेखक ने जो सृष्टि की है, वह प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर की गयी है और अपने पात्रों की जबान से वह खुद बोल रहा है। "

उपन्यासकार के गुण बताइए 

उपन्यासकार के गुण के बारे में प्रेमचंद की स्पष्ट राय है कि उसे पुस्तकों से मसाला न लेकर जीवन से ही लेना चाहिए। उन्हीं के शब्दों में- "उपन्यासकार को अपनी सामग्री आले पर रखी हुई पुस्तकों से नहीं, उन मनुष्यों के जीवन से लेनी चाहिए, जो उसे नित्य ही चारों तरफ मिलते रहते हैं। पुस्तकों में नये चरित्र न मिलें, पर जीवन में नवीनता का अभाव कभी नहीं रहा।" प्रेमचंद उपन्यास में जीवन चरित्र के साथ कल्पना के योग को भी आवश्यक मानते हैं, पर वह कल्पना दाल में नमक की तरह होनी चाहिए। कोरी कल्पना किसी काम की नहीं होती। उसके लिए भी कुछ ठोस आधार चाहिए। यदि किसी भारतीय उपन्यासकार को इंग्लैंड के किसी देहात का वर्णन करना हो और वह वहाँ कभी गया ही न हो तो केवल कल्पना के सहारे उसका वर्णन करने से उसे बचना चाहिए। उसके पास आधार अवश्य होना चाहिए, तभी वह उस पर विशाल भवन निर्माण कर सकता है।

उपन्यासकारों के रचनात्मक उद्देश्यों के बारे में प्रेमचंद स्पष्ट करते हैं कि अपने उपन्यासों की कथा को कई भागों में चाँटना चाहिए। पहले छोटी बात खुले, फिर उससे कुछ बड़ी और अंत में रहस्य खुलना चाहिए। लेकिन प्रत्येक भाग में कुछ-न-कुछ रहस्योद्घाटन अवश्य होना चाहिए। इससे पाटक में उत्सुकता बनी रहेगी और यही उत्सुकता जगाना उपन्यासकार का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। इसके अलावा उसका उद्देश्य यह भी होना चाहिए कि वह उपन्यास में सबकुछ न कह डाले, पाठक की कल्पना के लिए भी कुछ छोड़ देना चाहिए। पाठक तो कहानी का खाका मात्र चाहता है, रंग वह अपनी अभिरुचि के अनुसार भर लेता है। कुशल उपन्यासकार वही है, जो यह अनुमान कर ले कि कौन-सी बात पाठक स्वयं सोच लेगा। उपन्यासकार को चाहिए कि वह किसी चरित्र की रूपरेखा या किसी दृश्य को चित्रित करते समय हुलिया नवीसी न करे। दो-चार वाक्यों में मुख्य बात कहकर आगे बढ़ जाना चाहिए। अनावश्यक बातों से उसे परहेज करना चाहिए। जो दलित हैं, पीड़ित हैं, वंचित हैं, चाहे वह व्यक्ति हो या समूह, उसकी हिमायत और वकालत करना उसका फर्ज है। उसकी अदालत समाज है, इसी अदालत के सामने वह अपना इस्तगासा पेश करता है और उसकी न्यायवृत्ति तथा सौंदर्यवृत्ति को जाग्रत करके अपना यत्न सफल समझता है। लेकिन प्रेमचंद की दृष्टि में मात्र वकालत से काम नहीं चल सकता। साहित्यकार उपेक्षितों, तिरस्कृतों का पक्ष लेता अवश्य है लेकिन सत्य का आँचल नहीं छोड़ता है। वह एक सत्यवादी वकील है।"

उपन्यासकार को एक संवदेनशील मानव होना जरूरी है। यदि वह संवेदनशील नहीं है तो वह श्रेष्ठ उपन्यास की रचना नहीं कर सकता। इसीलिए प्रेमचंद पहले संवेदनशील मनुष्य बनने पर जोर देते हैं, बाद में उपन्यासकार बनने की। उनके मतानुसार उपन्यासकार को सत्यभाषी होना चाहिए। वह हमारा पथ-प्रदर्शक होता है, मनुष्यत्व को जगाता है, सद्भावों का संचार करता है तथा हमारी दृष्टि को व्यापक बनाता है।

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