कर्मभूमि उपन्यास में सुखदा का चरित्र चित्रण

प्रेमचंद ने सुखदा का चरित्र-चित्रण बड़ी ही कुशलता के साथ किया है। आरम्भ में वह एक विलासप्रिय सामान्य नारी के रूप में सामने आती है और पति को राजनैतिक क

कर्मभूमि उपन्यास में सुखदा का चरित्र चित्रण

प्रेमचंद ने सुखदा का चरित्र-चित्रण बड़ी ही कुशलता के साथ किया है। आरम्भ में वह एक विलासप्रिय सामान्य नारी के रूप में सामने आती है और पति को राजनैतिक कार्यों में भाग लेने से रोकती है। परन्तु पति के घर छोड़कर चले जाने पर सुखदा में अभूतपूर्व परिवर्तन होता है। वह न केवल राजनैतिक कार्यों में भाग लेना ही आरम्भ करती है वरन विभिन्न आंदोलनों का नेतृत्व करती है और क्रियाशीलता में सभी कार्यकर्ताओं को पीछे छोड़ जाती है। स्वयं डॉक्टर शान्तिकुमार को सुखदा का अनुकरण करना पड़ता है। अछूतों के मंदिर प्रवेश के लिए तथा मजदूरों के लिए सस्ते मकानों को बनवाने के लिए किये जाने वाले आन्दोलनों में वह अद्भुत कर्मठता दिखाती है और अंत में सफलता प्राप्त करके ही रहती है। परन्तु अपने राजनैतिक विचारों में वह अपने पति के समान सहिष्णु प्रवृत्ति की नहीं है। वह उग्र क्रान्तिकारिणी है और हँसते-हँसते जेल जाती है। लाला समरकान्त उसकी जमानत देना चाहते हैं परन्तु वह जेल से बाहर आने से मना कर देती है। 

उसमें उदारता भी दिखाई गई है और जब अमर सकीना के यहाँ आने-जाने लगा है तो वह स्वयं भी सकीना के पास आने-जाने लगती है। वस्तुतः जीवन में संपर्क में आनेवाले सभी व्यक्तियों के प्रति उसके हृदय में उदारता और सहानुभूति के भाव लक्षित होते हैं। 

सुखदा का प्रारंभिक जीवन पैसे पर जान देनेवाली स्त्री के जीवन की तरह है। धन उसके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह अमरकांत से कहती है- "मनस्वी, वीर पुरुषों ने सदैव लक्ष्मी की उपासना की है। संसार को पुरुषार्थियों ने ही भोगा है और हमेशा भोगेंगे। न्याय गृहस्थों के लिए नहीं, संन्यासियों के लिए है।" वह बार-बार अमर को धन का महत्व समझाने का प्रयत्न करती है। प्रेमचंद ने लिखा है - "भोग-विलास को जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु समझती थी और उसे हृदय से लगाये रहना चाहती थी। अमरकांत को वह घर के काम-काज की ओर खींचने का प्रयास करती थी। कभी समझाती थी, कभी रूठती थी, कभी बिगड़ती थी।" 

सुखदा अपने दायित्व और कर्तव्यों के प्रति सचेत स्त्री थी। उसमें सेवा का बीज है। समरकान्त की अस्वस्थता की सूचना पाकर वह उनकी सेवा-सुश्रुषा करती है। प्रतिदिन अपने घर का कार्य करने के बाद वह उन्हें भोजन बनाकर खिलाती है और उनका हर प्रकार से ध्यान रखती है। वह प्रोफ़ेसर शांति कुमार के सम्मुख स्पष्टीकरण देते हुए कहती है - "वह मुझे विलासिनी समझते थे, पर मैं कभी विलास की लौंडी नहीं रही। हाँ, दादाजी को रुष्ट नहीं करना चाहती थी। यही बुराई मुझमें थी। " 

सुखदा एक चतुर स्त्री है जो अपने तर्कों से समरकान्त को भी पराजित कर देती है। अमर की कई दलीलों को भी वह अपने तर्क से ख़ारिज कर देती है और कई बार अपनी बात मनवाने में समर्थ रहती है। यही नहीं वह एक स्वाभिमानी स्त्री है जो अपने स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए अनेक प्रकार के कष्ट झेलने को भी तैयार है। अमर से सुखदा कहती है - "माता के साथ क्यों रहूँ? मैं किसी की आश्रित नहीं रह सकती। मेरा दुःख-सुख तुम्हारे साथ है। .... जब एक दिन हमें अपनी झोपडी बनानी है तो क्यों न अभी से हाथ लगा दें। तुम कुएँ से पानी लाना, मैं चौका बरतन कर लूंगी। “उसके इस कथन में उसके स्वाभिमान और स्वावलंबन की प्रबल भावना दिखाई देती है।

अमर के घर छोड़कर चले जाने को वह विश्वासघात मानती है तथा उसका मन अमर के प्रति उपेक्षा से भर जाता है। इस परिस्थिति में उसका आत्माभिमान बढ़ जाता है, सुखदा ने झुकाना नहीं सीखा। वह अमर को पत्र नहीं लिखती है। वह पिता से अलग होने के बाद अमर की इच्छा के विरुद्ध भी बालिका विद्यालय में ५० रुपये पर नौकरी कर लेती है। पुरुष का विश्वासघात उसके मन में

क्षोभ उत्पन्न करता है और इसी कारण सकीना के प्रति उसकी सहानुभूति रहती है। वह सकीना को अपने से अधिक दुखी समझती है। वह सोचती है – “उसकी कितनी बदनामी हुई, और अब बेचारी उस निर्दय के नाम को रो रही है। वह सारा उन्मान जाता रहा। ऐसे छिछोरों का एतबार ही क्या।" वह समय-समय पर सकीना से भेंट करती रहती है। सकीना उसके लिए महत्व की पात्र बन जाती है

क्योंकि उसी से वह त्याग, प्रेम और सेवा का पाठ सीखती है। अपनी भूल का आभास उसे होता है और वह उसी पथ को ग्रहण करती है, जो पथ अमर ने ग्रहण किया।

सामाजिक कार्यों में सुखदा की प्रारंभ से ही रूचि रही है। इसका संकेत मुन्नी के प्रसंग में उसके विकल हो जाने से मिलता है। वह उसके मुकद्दमे के लिए रुपये का भी प्रबंध करती है। अमर के जाने के बाद तो वह खुलकर सामाजिक जीवन में भाग लेने लगती है। वह अछूतोद्धर में शान्तिकुमार की सहायिका बनती है और उन्हें मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाती है। गरीब मजदूरों के रहने के लिए

वह मकान की योजना बनाती है और क्रियान्वित करने की दिशा में प्रयत्न करती है। अंत में वह निःस्वार्थ कर्म में विश्वास करती है। हर एक शुभ कार्य में वह ईश्वर का महत्वपूर्ण हाथ मानती है। सुखदा का चरित्र इस तथ्य को प्रकट करता है कि श्रद्धा, प्रेम, सम्मान, धन से नहीं बल्कि सेवा से ही मिल सकता है। अपनी सेवा-भावना के कारण ही घर और बाहर दोनों के दायित्व को वह भलीभांति निभा पाती है। परिवार के लिए वह एक ऐसी स्त्री का आदर्श बनती है जो आज्ञाकारिणी पुत्रवधू भी है, स्नेही भाभी भी है और पति की प्रेरणा भी है। इसके साथ ही और इन सबसे ऊपर वह एक जनसेविका भी है। वह 'स्व' के तल से ऊपर उठकर 'पर' के तल तक पहुँचने वाली एक महान नारी के रूप में सामने आती है।

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