Sunday, 17 July 2022

नदी और पर्वत के बीच संवाद लेखन - Nadi aur Parvat Ke Beech Samvad Lekhan

नदी और पर्वत के बीच संवाद लेखन : In This article, We are providing पर्वत और नदी के बीच संवाद लेखन and Nadi aur Parvat Ke Beech Samvad Lekhan for Students and teachers.

    नदी और पर्वत के बीच संवाद लेखन

    पर्वत : कैसी हो नदी बेटी, आज इतनी उदास क्यों हो ?

    नदी : बस यही सोच रहे हूँ कि मनुष्य आखिर हमसे किस बात का बदला ले रहा है ?

    पर्वत : अब क्या कर दिया मनुष्य ने ?

    नदी : क्यों, क्या आपको कुछ नहीं मालूम ? आप भी तो शामिल हो इसमें। 

    पर्वत : नहीं, मुझे सच में कुछ नहीं पता। मैंने क्या किया ?

    नदी : आपकी ही चोटियों पर बाँध बनाया है मनुष्य ने। पहले मैं अनवरत बहा करती थी पर मनुष्य ने मेरे प्रवाह को थाम दिया है। 

    पर्वत : तुम्हे लगता है कि इसमें मैं भी शामिल हूँ ? सोचो जब मनुष्य ने बाँध बनाने के लिए मुझे काटा होगा, तो मुझे कितना कष्ट हुआ होगा। 

    नदी : सच में, मुझे इस बात का अहसास नहीं था। मुझे माफ़ कर दीजिये। 

    पर्वत : मैं तो ये सोचकर परेशा हूँ की पहले तो मनुष्य मुझे काट-काटकर बाँध और सड़कें बनाता है और फिर जब भू-स्खलन होता है तो कहता है की पर्वत ने लोगों की जान ले ली। 

    नदी : ऐसा हो मेरे साथ भी होता है। जब बाँध मेरे वेग को नहीं सह पाता तो बाढ़ आ जाती है और शहर-के शहर तबाह हो जाते हैं। 

    पर्वत : भला नदी के वेग को भी कोई सह पाया है ? अरे तुम तो मेरा भी सीना काटकर रास्ता बना लेती हो। 

    नदी : लेकिन इस मूर्ख मनुष्य को कौन समझाए। 


    पर्वत और नदी के बीच संवाद लेखन

    पर्वत : किस सोच में हो नदी, ज़रा मुझे भी तो बताओ ?

    नदी : बस यही सोच रही हूँ, कि मैं अनंत काल से बहे जा रही हूँ। आप कहाँ से इतना पानी लाते हो कि ख़त्म ही नहीं होता ?

    पर्वत : (हँसते हुए) अरे पगली इसका जवाब तुमने मुझसे नहीं समुद्र से पूछना चाहिए था। 

    नदी : समुद्र से क्यों ? मेरा सृजन तो आप करते हो। 

    पर्वत : समुद्र से इसलिए, क्योंकि धरती पर वही पानी का विशालतम भण्डार है। 

    नदी : पर समुद्र का पानी तो खारा होता है, जबकि मेरा पानी तो मीठा है। 

    पर्वत : अरे हम तो बस उसके पानी को साफ़ करते हैं। असल में तुमने समुद्र ने ही बनाया है। 

    नदी : (हँसते हुए) ओह ! तो आप प्रकृति के वाटर प्यूरीफायर हो ?

    पर्वत : हाँ, ऐसा ही समझ लो। लेकिन हम और बहुत से काम भी करते हैं। 

    नदी : अच्छा! लेकिन ये बताइये, समुद्र तो कह रहा था की उसका निर्माण तो खुद नदियों के पानी से हुआ है। 

    पर्वत : यही तो प्रकृति की माया है। इसीलिए हमारी उत्पत्ति एक रहस्य है। 


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