अल्पसंख्यक पर संक्षिप्त निबंध लिखिए

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अल्पसंख्यक पर संक्षिप्त निबंध लिखिए

भारत में अल्पसंख्यक : अल्पसंख्यक का अर्थ किसी विशेष समदाय या सम्प्रदाय का संख्यात्मक विशिष्टता की दृष्टि से कम होना है। अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग अपेक्षाकृत छोटे लेकिन साथ ही सुविधा वंचित समूह के रूप में किया जाता है। अल्पसंख्यक शब्द का समाजशास्त्रीय भाव यह भी है कि अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्य एक सामूहिकता का निर्माण करते हैं अर्थात् उनमें अपने समूह के प्रति एकात्मकता, एकजुटता और उससे सम्बन्धित होने का प्रबल भाव होता है। यह भाव हानि अथवा असुविधा से जुड़ा होता है क्योंकि पूर्वाग्रह और भेदभाव का शिकार होने का अनुभव आमतौर पर अपने समूह के प्रति निष्ठा और दिलचस्पी की भावनाओं को बढ़ावा देता है। जो समूह सांख्यिकीय दृष्टि से अल्पसंख्यक होते हुए भी किसी सामूहिकता का निर्माण नहीं करते, उन्हें अल्पसंख्यक नहीं कहा जाता है। उदाहरणार्थ, बाएँ हाथ से खेलने या लिखने वाले लोग अथवा 29 फरवरी को जन्मे लोग संख्या में कम तो हो सकते हैं, परन्तु उन्हें अल्पसंख्यक नहीं कहा जाता है।

अल्पसंख्यक पर संक्षिप्त निबंध लिखिए

भारतीय समाज में 'बहुसंख्यक' एवं 'अल्पसंख्यक' शब्दों का प्रयोग सामान्यतया धार्मिक दृष्टि से अधिक एवं अल्प जनसंख्या वाले सम्प्रदायों के लोगों के लिए ही किया जाता है। उदाहरणार्थ, हिन्दुओं को बहुसंख्यक माना जाता है तो सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी (जरथुस्त्र-धर्मावलम्बी), इस्लाम, ईसाई, यहूदी आदि धर्मों के अनुयायियों को अल्पसंख्यक माना जाता है। भारत की कुल जनसंख्या में हिन्दुओं का प्रतिशत 80-5 है, जबकि मुसलमानों का 13-4 प्रतिशत। कई बार अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग संजातीय दृष्टि से भी किया जाता है। भारत में संजातीय मिश्रण इतना अधिक हुआ है कि इसके आधार पर अल्पसंख्यकों की पहचान कर पाना कठिन कार्य है। क्षेत्रीय समूहों में भी कौन-सा समूह बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक है, वह इस बात पर निर्भर करता है कि उस क्षेत्र-विशेष में जनसंख्या का धार्मिक आधार पर वितरण किस प्रकार का है।

बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक शब्द का समाजशास्त्रीय भाव यह भी है कि दोनों ही वर्गों के सदस्य एक सामूहिकता का निर्माण करते हैं अर्थात् उनमें अपने समूह के प्रति एकात्मकता, एकजुटता और उससे सम्बन्धित होने का प्रबल भाव होता है। अल्पसंख्यकों में यह भाव हानि अथवा असुविधा से जुड़ा होता है क्योंकि पूर्वाग्रह और भेदभाव का शिकार होने का अनुभव आमतौर अपने समूह के प्रति निष्ठा और दिलचस्पी की भावनाओं को बढ़ावा देता है। किसी प्रदेश की जनसंख्या में किसी धर्म के अनुयायियों की कुल संख्या के आधार पर कोई सम्प्रदाय अल्पसंख्यक अथवा बहुसंख्यक हो सकता है। उदाहरणार्थ, पूरे भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं परन्तु जम्मू-कश्मीर में वे बहुसख्यक हैं। इसी भाँति, पूरे भारत में सिक्ख अल्पसंख्यक हैं परन्तु पंजाब में वे बहुसंख्यक हैं।

भारत में निम्नलिखित अल्पसंख्यक सम्प्रदाय पाए जाते हैं(1) मुसलमान, (2) ईसाई, (3) सिक्ख, (4) बौद्ध, (5) जैन, (6) पारसी (7) यहूदी।

भारतीय समाज में अल्पसंख्यकों के लक्षण

(1) मुसलमानों में नगर में रहने वालों का अनुपात ज्यादा है, इसी प्रकार जैन धर्म भी नगरीय पृष्ठभूमि वाला धर्म दिखाई देता है। सिक्ख जनसंख्या ग्रामों और नगरों दोनों में है और यही बात ईसाइयों और बौद्धों पर भी लागू हो रही है।

(2) प्रजनन दर की दृष्टि से सबसे ऊँची प्रजनन दर मुसलमानों में और फिर क्रमश: जैन, ईसाई, हिन्दू, सिक्ख तथा बौद्ध में पाई जाती है। ईसाइयों में सबसे कम वृद्धि दर पाई जाती है। 1991 से 2001 के दशक में मुसलमानों में जनसंख्या वृद्धि दर 36-0 प्रतिशत, जैनियों में 26-0 प्रतिशत, ईसाइयों में 22.6 प्रतिशत, हिन्दुओं में 20-3 प्रतिशत तथा सिक्खों एवं बौद्धों में 18.2 प्रतिशत रही।

(3) धर्मों का जनांकिकीय अध्ययन लिंग अनुपात की दृष्टि से भी किया जाता है। वैसे तो ईसाइयों को छोड़कर अन्य सभी धार्मिक सम्प्रदायों की जनसंख्या में स्त्री अनुपात पुरुषों की अपेक्षा कम है। सिक्खों में यह अनुपात सबसे कम है। 2011 ई० की जनगणनानुसार भारत में लिंगानुपात 1000 पुरुषों पर 940 स्त्रियों का है। 2001 ई० की जनगणनानुसार ईसाइयों में लिंगानुपात 1000 पुरुषों पर 1009 स्त्रियाँ था, जबकि सिक्खों में यह अनुपात 1000 पुरुषों पर 893 स्त्रियाँ ही था। मुसलमानों में यह अनुपात 1000 : 936 था। विभिन्न धर्मों में लिंगानुपात के सम्बन्ध में 2001 ई० की जनगणना से सम्बन्धित आँकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं।

(4) भारत में सभी प्रमुख अल्पसंख्यक अपनी धार्मिक विशेषताओं को बनाए रखने का प्रयास करते रहे हैं। सभी धर्मों की अपनी अलग-अलग उपासना विधि है, अलग परम्पराएँ और प्रथाएँ हैं। यह अन्तर रहन-सहन और खान-पान की व्यवस्था तथा प्रतिदिन के व्यवहार में भी स्पष्टतः परिलक्षित होता है। जो विदेशी मूल के धर्म भारत में आए, वे भी आज भारतीय समाज के अभिन्न अंग बन गए हैं।

(5) भारतीय समाज की धार्मिक विविधता तथा बहुलवाद समय-समय पर संघर्ष की स्थिति भी पैदा करते रहे हैं। आज भारत में धार्मिक आधार पर साम्प्रदायिकता एक प्रमुख समस्या बनी हुई है तथा साम्प्रदायिक दंगे, कट्टरवादी और पृथकतावादी प्रवृत्तियाँ भारतीय समाज की जड़ों को हिला रही हैं।

(6) स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत को एक लौकिक राज्य के रूप में स्वीकार किया गया। भारतीय संविधान में यह स्पष्ट शब्दों में लिखा हुआ है कि सभी धर्मों के लोग एक समान हैं तथा उन्हें समान अधिकार प्राप्त हैं। धर्म, जाति, लिंग, प्रजाति के आधार पर किसी नागरिक से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।

(7) व्यावहारिक रूप में आज भी हमारे देश में सरकार अनेक धार्मिक मामलों तथा झगड़ों से अपने आप को अलग नहीं रख पा रही है। कुछ धार्मिक सम्प्रदायों के नेताओं ने तो यह स्पष्ट घोषणा तक कर दी है कि उनके धर्म तो सर्वग्राही धर्म हैं और इस नाते वे सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक सभी पक्षों को अपने में समेटे हुए हैं। वे यह तर्क देते हैं कि उनमें राजनीतिक तथा अन्य बातों को अलग-अलग करना उनके धर्म की अस्मिता को चोट पहुँचाना है।

(8) के० एल० शर्मा के अनुसार पारसियों, जैनियों, यहदियों एवं ईसाइयों में साक्षरता दर अधिक है। ईसाइयों के अपवाद के साथ ये अल्पसंख्यक सम्प्रदाय व्यापार में अधिक संलग्न हैं। पारसियों, यहूदियों तथा जैनियों को व्यापार में काफी अग्रणी माना जाता है।

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