Sunday, 25 August 2019

डॉ राजेंद्र प्रसाद पर निबंध – Essay on Dr Rajendra Prasad In Hindi

Essay on Dr Rajendra Prasad In Hindi : दोस्तो आज हमने डॉ राजेंद्र प्रसाद पर निबंध कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 के विद्यार्थियों के लिए लिखा है। 

    इस लेख के माध्यम से हमने एक Dr Rajendra Prasad जी के जीवन का और उनके विचारों वर्णन किया है इस निबंध की सहायता से हम भारत के सभी लोगों को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी और उनकी रचनाओं के बारे में बताएंगे। 

    Essay on Dr Rajendra Prasad In Hindi 100 Words

    डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 3 दिसम्बर, 1884 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में बिहार राज्य के सारन जिले के जीरादेई नामक गांव में हुआ था। उनके पिता महादेव सहाय एक जमींदार तथा माता कमलेश्वरी देवी एक धार्मिक महिला थी। राजेंद्र प्रसाद की आरंभिक पढ़ाई घर पर ही हुई। 
    Dr Rajendra Prasad Essay In Hindi
    Dr Rajendra Prasad Essay In Hindi
    सन् 1902 में 'राजेन' ने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। यहां शुरू में उन्होंने विज्ञान में पढ़ाई की जहां जगदीश चंद्र बसु तथा प्रफुल्ल चंद्र राय जैसे महान अध्यापकों ने उन्हें पढ़ाया। सन् 1908 में उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से अंग्रजी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की।  जुलाई 1946 में देश का संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद बनाए गए। 26 जनवरी 1950 को भारत गणतंत्र बना और डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्वाधीन भारतीय गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई।  

    Essay on Dr Rajendra Prasad In Hindi 400 Words

    राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सारन (अब सिवान) जिले के जीरादेई नामक छोटे-से गांव में हुआ था। वह भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। उनके पिता का नाम महादेव सहाय था। परिवार में सबसे छोटे सदस्य होने के कारण राजेंद्र सबकी आंखों का तारा थे। सब प्यार से उन्हें 'राजेन' नाम से बुलाते थे। 'राजेन' की माता का नाम कमलेश्वरी देवी तथा बड़े भाई का नाम महेंद्र प्रसाद था। उनकी माता बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। Read also : Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi

    राजेंद्र प्रसाद की शिक्षा : राजेंद्र प्रसाद की आरंभिक पढ़ाई घर पर ही हुई। जब उनकी उम्र पांच वर्ष थी तो उन्हें तथा उनके दो चचेरे भाइयों को एक मौलवी साहब उर्दू और फारसी पढ़ाने के लिए घर आने लगे। सन् 1890 में 'राजेन' को छपरा जिला स्कूल में दाखिला दिलवाया गया। दाखिला लेने के पहले ही वर्ष की वार्षिक परीक्षा में वह न केवल प्रथम आए बल्कि इतने अच्छे अंक प्राप्त किए कि उस स्कूल के प्रधानाध्यापक के.सी. राय चौधरी ने प्रभावित होकर उन्हें अगली कक्षा न भेजकर सीधे ही उससे अगली कक्षा में बैठने के योग्य घोषित कर दिया। 

    सन् 1902 में 'राजेन' ने कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। सन् 1904 में उन्होंने एफ.ए. (इंटरमीडिएट या सीनियर सेकेंडरी के समकक्ष) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। सन् 1906 में अंग्रेजी एवं इतिहास विषयों में ऑनर्स के साथ उन्होंने बी.ए. की परीक्षा पास की। इस परीक्षा में भी अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय देते हुए वह प्रथम आए। सन् 1908 में उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से अंग्रजी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। 

    राजेंद्र प्रसाद की महात्मा गाँधी से भेंट : सन् 1916 मं ऑल इंडिया कांग्रेस समिति का कलकत्ता (अब कोलकाता) में अधिवेशन हुआ तब पहली बार डॉ. राजेंद्र प्रसाद की भेंट महात्मा गांधी के साथ हुई। गांधीजी के संपर्क में आने के बाद राजेंद्र प्रसाद के विचारों में नई क्रांति आई और वह सभी चीजों को नवीन दृष्टिकोण से देखने लगे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी फलती-फूलती वकालत भी छोड़ दी तथा देश सेवा को अपने जीवन का परम ध्येय बना लिया। 

    राजेंद्र प्रसाद की रचनायें : डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक अच्छे लेखक भी थे। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिनमें चम्पारन में सत्याग्रह (1922), मेरी आत्मकथा (1946), इंडिया डिवाइडेड (1946), महात्मा गांधी एवं बिहार-सम रेमिनिसेंसेज (1949) तथा बापू के कदमों में (1954) आदि उल्लेखनीय हैं। 

    निष्कर्ष : आदर्श राष्ट्रपति होने के साथ-साथ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एक उच्च कोटि के महापुरुष भी थे। वह प्राचीन भारतीय संस्कृति के कट्टर समर्थक थे। कर्त्तव्यपरायणता उनके चरित्र का अभिन्न अंग थी। निस्वार्थ सेवा और परोपकार के प्रति उनका जीवन पूर्ण समर्पित था। 

    Essay on Dr Rajendra Prasad In Hindi 600 Words

    डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। वह 'जीरादेई के संत' के नाम से प्रसिद्ध थे। उनका जन्म 3 दिसंबर, 1884 को बिहार के सारण जिले जीरादेई नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री महादेव सहाय एक जमींदार थे। राजेंद्र प्रसाद अपने माता-पिता के पाँचवें और सबसे छोटे पुत्र थे।

    सन् 1893 में छपरा के एक स्कूल में उन्होंने प्रवेश लिया। सन् 1902 में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में सर्वप्रथम आए। वे ऐसे पहले बिहारी छात्र थे, जिन्होंने यह सफलता सर्वप्रथम प्राप्त की थी। सन् 1906 में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। एम.ए. की परीक्षा में उनका स्थान सर्वोच्च था। वकालत की परीक्षा उन्होंने अच्छे अंकों में उत्तीर्ण की।

    फिर क्या था-शीघ्र ही उच्च न्यायालय के वकील के रूप में उन्होंने ख्याति प्राप्त की। वकील के रूप में उनका निर्मल चरित्र और ईमानदारी देख सभी चकित थे। वकालत आरंभ करने से पूर्व वह मुजफ्फरपुर में कुछ समय तक एक महाविद्यालय में अध्यापनकार्य करते रहे।

    राजेंद्र बाबू जब पाँचवीं कक्षा में पढ़ते थे, तभी उनका विवाह कर दिया गया। तब उनकी अवस्था मात्र बारह वर्ष की थी। उन्होंने अपनी आत्मकथा में अपने विवाह के समय की कुछ मनोरंजक घटनाओं का रोचक वर्णन किया है।

    आगे चलकर उन्होंने वकालत के अपने अच्छे-खासे व्यवसाय को छोड़कर देशसेवा करने की ठान ली। सन् 1909 के बंग-भंग आंदोलन ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। उसके बाद सन् 1917 में बिहार में महात्मा गांधी द्वारा छेड़े गए चंपारण सत्याग्रह से भी वे प्रभावित हुए। सन् 1935 में बिहार भूकंप के दौरान उनकी सेवाओं को भला कौन भुला सकता है!

    वह पहले कांग्रेस के महामंत्री रहे, फिर सन् 1934 में उन्हें सर्वसम्मति से कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। वे कांग्रेस महासमिति के सन् 1912 से और कार्यसमिति के 1922 से राष्ट्रपति पद ग्रहण करने के पूर्व तक बराबर सदस्य रहे।

    सन् 1946 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत में अंतरिम सरकार के मंत्री बने। 15 अगस्त, 1947 को देश जब आजाद हुआ तो उनकी अध्यक्षता में संविधान सभा' का गठन हुआ। इस तरह डॉ. राजेंद्र प्रसाद की देख-रेख में ही हमारे देश का संविधान बना। नए संविधान में दी गई व्यवस्था के अनुसार देश में सन् 1952 में पहला आम चुनाव हुआ।

    सन् 1952 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति का पद ग्रहण किया। वह राष्ट्रपति पद के लिए दो बार चुने गए-एक बार सन् 1952 में और दूसरी बार 1957 में। सन् 1962 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था।

    जब राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति भवन गए तब वहाँ के ऐश्वर्य को देखकर सोच में पड़ गए। उन्होंने वहाँ के नरम गद्दों वाले पलंग को हाथ से दबाते हुए कहा था, "यह पलंग तो ऐसे ही हैं जैसे घी से भरा कनस्तर। कनस्तर में एक कटोरी छोड़ें तो वह बिना प्रयास के सरकती हुई नीचे तक जा पहुँचेगी। कुछ ऐसी ही हालत इस पलंग पर सोनेवाले व्यक्ति की भी होगी।"

    उन्होंने तब आरामदायक पलंग को हटवाकर लकड़ी का एक तख्त लगवाया। उसी पर वह बारह वर्षों तक सोए। उनकी विनम्रता अत्यंत सहज थी, ऊपर से ओढ़ी हुई नहीं थी। सहृदयता उनमें कूट-कूटकर भरी हुई थी। 28 फरवरी, 1963 को पटना में उनका निधन हो गया।

    राष्ट्रपति भवन छोड़कर 'सदाकत आश्रम' (पटना) जाते समय उन्होंने कहा था, "मुझे राष्ट्रपति भवन में रहते हुए न तो प्रसन्नता थी और न ही झोंपड़ी में जाते हुए कोई दुःख है।

    आचार्य विनोबा भावे ने उनकी तुलना राजा जनक से करते हुए कहा था, "वह जब राष्ट्रपति थे तब भी उनकी सादगी बनी रही। राजा जनक भी बिहार में हुए थे और राजेंद्र बाबू भी। जनक जैसी निर्लिप्तता हमने राजेंद्र बाबू में ही देखी है।"

    Essay on Dr Rajendra Prasad In Hindi 650 Words

    प्रस्तावना : डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। वे भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ मान्यताओं के मूर्तिमान स्वरूप थे। उनके समकालीन लोगों ने लिखा है कि राजेन्द्रबाबू सरलता तथा सादगी बहुत पसन्द करते थे। उन्हें भारतीय राजनीतिक का सात्विक रूप कहा गया है। गांधीजी उन्हें अजातशत्रु (जिसका शत्रु पैदा ही न हुआ हो) और देशबंधु कहते थे। सरोजिनी नायडू ने उनकी गुणावली को जानते हुए अपनी काव्यमयी भाषा में उनके बारे में लिखा है कि वे ऐसे महापुरूष थे जिनकी लेखनी से भी कटुतापूर्ण कोई शब्द कभी नहीं लिखा गया।

    शिक्षा तथा प्रारंभिक जीवन : बाबू राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसम्बर, 1884 को एक मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार में बिहार राज्य के सारन जिले के जीरादेई नामक गांव में हुआ था। जब वे मात्र अपनी किशोरावस्था में थे तभी कलकत्ता विश्वविद्यालय की मैट्रिकुलेशन परीक्षा में सर्वोच्च अंक लेकर उत्तीर्ण हुए थे। राजेन्द्रजी के अध्यापक तथा उनके सम्पर्क में आने वाले सभी लोग उनके गुणों तथा प्रतिभा की प्रशंसा करते थे। उन दिनों कलकत्ता विश्वविद्यालय पूरे उत्तर-पूर्व में अपनी शिक्षा व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध था। कानून की सर्वोच्च उपधि लेकर वे अपने व्यवसाय में भी उतने ही सफल रहे जितने सफल वे अपनी पढ़ाई में थे। कलकत्ता एवं पटना हाईकोर्ट दोनों में उनकी वकालत की धूम थी। सन् 1918 में चम्पारन में वे गांधीजी के सम्पर्क में आए तथा उनके विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी फल-फूल रही वकालत को ऐसे समय में छोड़ दिया जब परिवार को आर्थिक सहायता की भारी जरूरत थी। राजेन्द्र बाबू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन बार अध्यक्ष बने तथा उनकी गणना कांग्रेस के शुरू के छः नेताओं में होने लगी।

    भारत के पहले राष्ट्रपति सन् 1946 में जब पहली राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया उस समय उन्हें खाद्य आपूर्ति एवं कृषि मंत्री बनाया गया था। इसी दौरान वे संविधान सभा के सदस्य बनाए गए, जिसे उन्होंने बड़ी योग्यता के साथ संभाला। तीन वर्ष बाद जब भारत सन् 1947 में स्वतंत्र हुआ। इसका अपना संविधान 26 जनवरी, 1950 से लागू किया गया उस समय राजेन्द्र बाबू सर्वसम्मति से भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति चुने गए। आप इस महान् पद पर लगातार 12 वर्ष तक रहे। वास्तविकता तो यह है कि राष्ट्रपति का गौरवमय पद राजेन्द्रबाबू जैसे महान् कर्मनिष्ठ व्यक्ति को प्राप्त कर गौरवान्वित हुआ था।

    राजेन्द्रबाबू का लालन-पालन एक परम्परावादी परिवार में हुआ था। चौके में भोजन करना, ब्राह्मण का बनाया भोजन करना, बाहर का बना भोजन न करना आदि, आदि। किन्तु, गांधीजी के कहने पर उन्होंने इन सब मान्यताओं को तोड़ दिया था। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि गांधीजी के प्रभाव से उनके जीवन तथा मान्यताओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन आने लगे थे। जैसे जात-पांत को मानने वाली मेरी आदत छूट चुकी थी। गांधीजी कहा करते थे कि यदि इन छोटी-छोटी पाबन्दियों में हम लोग फंस जाएंगे तो बड़े काम कैसे करेंगे।

    राजेंद्र प्रसाद और नेहरू में मतभेद : कुछ बातों को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के मध्य कुछ मतभेद उभरने शुरू हो गए थे। एक के मन में भारतीय भाषाओं के प्रति अगाध निष्ठा थी किन्तु प्रधानमंत्री जी की सारी शिक्षा-दीक्षा पाश्चात्य ढंग से हुई थी, इसलिए वे हिन्दी की बात तो करते थे, हिन्दी में बात भी करते थे किन्तु, हिन्दी को सरकारी कामकाज में अपनाने की बात मन से स्वीकार नहीं करते थे। उनकी वजह से सन् 1950 में, 15 वर्ष की अवधि के बाद हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने का वादा 50 साल बाद भी पूरा नहीं हो पा रहा है। राजर्षि टंडन तथा राजेन्द्रबाबू इस अवधि के पक्षधर नहीं थे। हिन्दू कोड बिल के विषय में दोनों नेताओं के वैचारिक मतभेद इतने खुल गए थे कि पं. नेहरू की जिद के कारण अन्ततः उसे संसद से खण्डों में पारित करवाना पड़ा। राजेन्द्रबाबू नहीं चाहते थे कि तिब्बत को चीन को सौंपा जाए। सन् 1962 में चीन के द्वारा किए गए आक्रमण को उन्होंने उस पाप का परिणाम बताया था जो चीन को तिब्बत सौंप कर किया गया था।

    राजेंद्र प्रसाद की मृत्यु : राजेन्द्रबाबू, मई 1962 में राष्ट्रपति के पद का कार्यकाल समाप्त होने के पश्चात् सदाकत आश्रम, पटना चले गए थे। 22 फरवरी, 1963 को एक महान् रिक्ति छोड़कर वे पंचतत्व में विलीन हो गए।

    Long Essay on Dr Rajendra Prasad In Hindi 900 Words

    अपनी सादगी, पवित्रता, सत्यनिष्ठा, योग्यता और विद्वता से भारतीय ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित कर देने वाले, देश के उच्चतम पद से विभूषित राजेन्द्र बाबू का पूरा नाम डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह है। अपनी सादगी और सरलता के कारण किसान जैसा व्यक्तित्व पाकर भी पहले राष्ट्रपति बनने का गौरव पाने वाले इस महान व्यक्ति का जन्म 3 दिसम्बर सन् 1884 ई. के दिन बिहार राज्य के सरना जिले के एक मान्य एवं संभ्रान्त कायस्थ परिवार में हुआ था। पूर्वज तत्कालीन हथुआ राज्य के दीवान रह चुके थे। उर्दू भाषा में आरम्भिक शिक्षा पाने के बाद उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता आ गए। आरम्भ से अन्त तक प्रथम श्रेणी में हर परीक्षा पास करने के बाद वकालत करने लगे। कुछ ही दिनों में इनकी गणना उच्च श्रेणी के श्रेष्ठतम वकीलों में होने लगी। लेकिन रोल एक्ट से आहत होकर इनका स्वाभिमानी मन देश की स्वतंत्रता के लिए तड़प उठा और गान्धी जी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलनों में भाग लेकर देशसेवा में जुट गए।

    आरम्भ में राजेन्द्र बाबू राष्ट्रीय नेता गोपाल कृष्ण गोखले से, बाद में महात्मा गांधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से सर्वाधिक प्रभावित रहे। इन दोनों का प्रभाव इनके जीवन में स्पष्ट दिखाई दिया करता था। इन दोनों ने ही इन्हें महान बनाया। सन् 1905 ई. में पूना में स्थापित 'सर्वेण्ट्स आफ इण्डिया' सोसाइटी की तरफ आकर्षित होते हुए भी राजेन्द्र बाबू अपनी अन्त:प्रेरणा से गांधी जी के चलाए कार्यक्रमों के प्रति सर्वात्मभाव से समर्पित हो गए और फिर आजीवन उन्हीं के बने भी रहे। राजेन्द्र बाबू विद्वान और विनम्र तो थे ही, अपूर्व सूझ-बूझ वाले एवं संगठन शक्ति से सम्पन्न व्यक्ति भी थे। इस कारण इन्हें जीवनकाल में और स्वतंत्रता संघर्ष काल में भी अधिकतर इसी प्रकार के कार्य सौंपे जाते रहे। अपनी लगन एवं दृढ़ कार्यशक्ति से शीघ्र ही इन्होंने गांधीजी के प्रिय पात्रों के साथ-साथ शीर्षस्थ राजनेताओं में भी एक परम विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था। आरम्भ में इनका. कार्यक्षेत्र अधिकतर बिहार राज्य ही रहा। असहयोग आन्दोलन में सफलतापूर्वक भाग ले और शीर्षस्थ पद पाकर ये बिहार के किसानों को उनके उचित अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष करने लगे। बिहार राज्य में नव जागृति लाकर स्वतंत्रता संघर्ष के लिए खड़ा कर देना भी इन्हीं के कुशल एवं नि:स्वार्थ नेतृत्व का फल था। 

    सन् 1934 में बिहार राज्य में आने वाले भूकम्प के कारण उत्पन्न विनाशलीला के अवसर पर राजेन्द्र बाबू ने जिस लगन और कुशलता से पीड़ित जनता को राहत पहुँचाने का कार्य किया, वह एक अमर घटना तो बन ही गया, उसने सारे बिहार राज्य को इनका अनुयायी भी बना दिया। अपने व्यक्तित्व में पूर्ण, कई बातों में स्वतंत्र विचार रखते हुए भी राजेन्द्र बाबू गांधीजी का विरोध कभी भूलकर भी नहीं किया करते थे। हर आदेश का पालन और योजना का समर्थन नतमस्तक होकर किया करते थे। इसका प्रमाण उस समय भी मिला, जब हिन्दी भाषा का कट्टर अनुयायी एवं समर्थक होते हुए भी इन्होंने गांधीजी के चलाए हिन्दोस्तानी भाषा के आन्दोलन को चुपचाप स्वीकार कर लिया।

    राजेन्द्र बाबू अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य-सम्मेलन के साथ भी आजीवन जुड़े रहे। उसकी हर गतिविधि का समर्थन सहयोग तो करते ही रहे, एक बार अध्यक्ष भी रहे। दूसरी बार हिन्दी-हिन्दोस्तानी के प्रश्न पर अध्यक्ष पद न पा सकने पर भी निराश या हतोत्साहित नहीं हुए और न ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन की गतिविधियों से नाता ही तोड़ा ये गांधीजी द्वारा चलाए गए प्रत्येक राजनीतिक गतिविधि एवं आन्दोलन का खुला अंग रहे, इस कारण इन्हें कई बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। एक निष्ठावान कार्यकर्ता एवं उच्चकोटि का राजनेता होने के कारण राजेन्द्र बाबू को दो बार अखिल भारतीय कांग्रेस दल के अध्यक्ष पद पर भी निर्वाचित किया गया। उस समय की अनेक जटिल समस्याएँ सुलझाने के कारण कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में इनको आज भी श्रद्धा एवं आदर के साथ स्मरण किया जाता है। कांग्रेस इतिहास के जानकारों का कहना और मानना है कि राजेन्द्र बाबू के अध्यक्ष काल में जैसा सौहार्द्रपूर्ण वातावरण कांग्रेस में रहा, उससे पहले या बाद में आज तक कभी भी नहीं रहा। इन्होंने छोटे-बड़े प्रत्येक कार्यकर्ता की बात ध्यान से सुनी, इस कारण किसी की टाँग खींचने या उठा-पटक का कभी अवसर ही नहीं आया। लगातार संघर्षों के परिणामस्वरूप सन् 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब देश का संविधान तैयार करने वाले दल का अध्यक्ष भी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ही बनाया गया। नव स्वतंत्रता प्राप्त भारत का अपना संविधान बन जाने के बाद 26 जनवरी, सन 1950 के दिन जब उसे लागू और घोषित किया गया, तो उसकी माँग के अनुसार स्वतंत्र गणतंत्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित होने का गौरव भी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ही प्रदान किया गया। वास्तव में ये इस पद के उचित एवं सर्वाधिक सक्षम अधिकारी भी निश्चय ही थे। सन 1957 में दुबारा भी इन्हीं को राष्ट्रपति बनाया गया।

    राष्ट्रपति भवन के वैभवपूर्ण वातावरण में रहते हुए भी इन्होंने अपनी सादगी और पवित्रता को कभी भंग नहीं होने दिया। हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करने जैसे कुछ प्रश्नों पर इनका प्रधानमंत्री से मतभेद भी बना रहा, पर इन्होंने अपने पद की गरिमा को कभी भंग नहीं होने दिया। दूसरी बार का राष्ट्रपति पद का समय समाप्त होने के बाद ये बिहार के सदाकत आश्रम में जाकर निवास करने लगे। सन् 1962 में उत्तर-पूर्वी सीमांचल पर चीनी आक्रमण का सामना करने का उद्घोष करने के बाद शारीरिक एवं मानसिक अस्वस्थता में रहते हुए इनका स्वर्गवास हो गया। इन्हें मरणोपरान्त 'भारत रत्न' के पद से विभूषित किया गया। समस्त भारतीय जनता इनके सामने हमेशा नतमस्तक रहेगी।

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