Thursday, 21 April 2022

जाति की गत्यात्मकता / परिवर्तन पर टिप्पणी कीजिये।

जाति की गत्यात्मकता / परिवर्तन पर टिप्पणी कीजिये।

भारत में विभिन्न युगों में जाति में विभिन्न परिवर्तन होते रहे हैं। अतः इस लेख में हम विभिन्न युगों के अनुसार जाति में हुए परिवर्तन का वर्णन किया गया है। 

1. वैदिक काल - 600 ईसा पूर्व तक - वैदिक संहिताएँ व ब्राह्मण ग्रन्थ इस काल के प्रमुख ग्रन्थ हैं। ऋग्वेद में मूलरूप से तीन वर्ण बताये गये हैं - ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य । शूद्रों का उल्लेख एकदो स्थानों पर ही है। इस समय जाति भेद नहीं था। म्यूर, जिनमर तथा वेबर इसी मत के हैं। डॉ. घरिये मानते हैं कि वैदिक काल के अन्त में वर्ण स्थापित हो गये थे, किन्तु उनमें ऊर्ध्वगामी तथा अधोगामी परिवर्तन होते थे। ऊंच-नीच की भावना नहीं थी पेशों पर प्रतिबन्ध नहीं थे और न खाने-पीने के निषेध ही थे।

2. उत्तर वैदिक काल - तीसरी सदी तक - उत्तर वैदिककाल में चार वर्णों के साथ-साथ वर्णसंकर जातियों का भी उल्लेख है। इस काल में जाति शब्द का प्रयोग पहली बार मिलता है। आर्य और शूद्र का पुराना भेद द्विज तथा शूद्र शब्दों से व्यक्त किया गया । ब्राह्मणों की सामाजिक स्थिति का उन्नयन और शूद्रों का अधःपतन इस काल की मुख्य विशेषता है। यज्ञ और संस्कार की बढ़ती हुई महत्ता ने परोहितों की स्थिति और महत्व को बढ़ा दिया । गौतम के अनुसार ब्राह्मण की स्थिति सर्वोच्च है।

3. धर्मशास्त्र काल - 11वीं सदी तक - मनु, याज्ञवल्य व विष्णु इस काल के सामाजिक नियमों के व्याख्याता हैं। धर्मशास्त्र काल में, वैदिककाल में हुए परिवर्तनों को विकसित करके जाति को स्थायी रूप देने का प्रयत्न किया गया। डॉ. घुरिये ने इस काल के दो महत्वपूर्ण परिवर्तनों का उल्लेख किया .

  1. ब्राह्मण को दान देने की पात्रता व महत्ता को प्रतिपादित किया जाना। 
  2. पुनर्जन्म और कर्मवाद के सिद्धान्त को लाग किया जाना।

4. मध्य काल - 17वीं सदी तक : यह काल मुसलमानों का शासन काल था। इसमें दो प्रकार की विरोधी विचारधाराओं का प्रचलन हुआ। एक ओर मुसलमान शासक तथा अनेक संत जैसे - कबीर नानक. चैतन्य ने जाति की ऊँच-नीच, पाखण्डों व कट्टरता का विरोध किया, दूसरी ओर ब्राह्मणों ने जाति

के सम्बन्ध में और कठोर नियम बनाये। मनगढन्त कथाओं का प्रचार कर जाति प्रथा को और अधिक कठोर बनाने के लिए अनुकूल साहित्य की रचना की गई। अन्तःविवाह, कुलीनता, कर्मकाण्डो व पवित्रता पर बहुत अधिक बल दिया गया।

5. वर्तमान काल - 18वीं सदी से अब तक

(i) अंग्रेजी शासन-काल - अंग्रेजी शासन-काल में जाति प्रथा में अनेक परिवर्तनो का आरम्भ हुआ। ये परिवर्तन पिछले कालों की तुलना में अधिक आधारभूत दूरगामी व प्रभावशाली है ऐसा कई कारणों से हुआ जिनमें प्रमुख हैं ईसाई धर्म का हिन्दू समाज पर प्रभाव तथा नई आर्थिक व राजनैतिक व्यवस्था का हिन्दुओं पर प्रभाव । पूँजीवाद, औद्योगीकरण, नगरीकरण, धर्मनिरपेक्षता, कानून के समक्ष समानता, यातायात व संचार के साधन, जाति-प्रथा में परिवर्तन लाने में अन्य सहायक कारक थे। इन कारकों से जातिप्रथा की जड़ें हिल गयीं और वह समाप्ति की ओर अग्रसर हुई। . 

(ii) स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद जाति में परिवर्तन

(a) समाज के खण्डात्मक विभाजन में परिवर्तन - जाति प्रथा की एक विशेषता समाज को विभिन्न खण्डों में विभाजित करना है। प्रत्येक खण्ड के पद व कार्य निश्चित हैं। इससे लोग अपनी जाति के प्रति अधिक निष्ठावान होते हैं, उनके हित की सर्वाधिक चिन्ता करते हैं। अब इस स्थिति में परिवर्तन हुआ है। इन जातीय सीमाओं व संकीर्णताओं को व्यक्ति पार कर रहे हैं। अनेक स्वार्थ जातीय स्वार्थ से ऊँचे माने जाने लगे हैं और खण्डात्मक विभाजन की सीमाएँ ढहने लगी हैं।

(b) जातीय संस्तरण में परिवर्तन - जाति के कारण सम्पूर्ण हिन्दू समाज में ऊंच-नीच का संस्तरण मिलता है। इनमें सर्वोच्च पद पर ब्राह्मण व निम्नतम पद पर शूद्र हैं। ब्राह्मणों के प्रभुत्व व विशेषाधिकार में कमी हुई है तथा निम्न जाति के लोगों को नये-नये अवसर प्राप्त हुए हैं और उनकी स्थिति में सुधार हुआ है। धन, व्यक्तिगत योग्यता, धर्मनिरपेक्षता से भी परम्परागत जाति की स्थितियों में परिवर्तन हुआ है।

(c) जाति की सदस्यता में परिवर्तन - जाति की सदस्यता का आधार जन्म है। फिर भी धन सत्ता व शहरी पर्यावरण से लाभ उठाकर अनेक लोग जाति बदल लेते हैं। यह प्रवृत्ति तथाकथित निम्न में पिछड़ी जातियों में मिलती हैं, किन्तु यह प्रवृत्ति तीव्र नहीं हो पाई. क्योकि इन जातियों के समक्ष अनेक सुविधाओं, संरक्षणों व अवसरों के प्रलोभन हैं।

(d) विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्धों में शिथिलता - जाति का आदर्श व आधार अन्तःविवाह है। इसीलिए विवाह सम्बन्धी अनेक निषेधों व परिवर्तनों को जन्म मिला। विवाह सम्बन्धी जातीय नियमों, निषेधों व आदर्शों में परिवर्तन हए अनेक जाति के लोगों को साथ-साथ काम करने के अवसर मिले। नये विधानों के द्वारा विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध शिथिल हुए हैं। अन्तर्जातीय विवाह की लोकप्रियता बढी है। किन्तु आज भी अपनी जाति व उप-जाति में विवाह अच्छा माना जाता है।


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