Saturday, 30 April 2022

Hindi Essay on "Hindu Marriage", "हिंदू विवाह पर निबंध" for Students

Hindi Essay on "Hindu Marriage", "हिंदू विवाह पर निबंध" for Students

Essay on Hindu Marriage in Hindi : इस लेख में पढ़िए हिन्दू विवाह पर निबंध जिसमें हिन्दू विवाह के उद्देश्य, प्रकार, मान्यताएं तथा हिन्दू विवाह के उद्देश्य का वर्णन किया गया है। हिंदू विवाह पर छोटा और बड़ा निबंध।

हिंदू विवाह पर निबंध / Essay On Hindu Marriage in hindi

प्रस्तावना : जब हम विवाह पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि विवाह दो विषमलिंगियों को यौन सम्बन्ध स्थापित करने की सामाजिक या कानूनी स्वीकृति प्रदान करता है। विवाह ही परिवार की आधारशिला है और परिवार में ही बच्चों का समाजीकरण एवं पालन-पोषण होता है। समाज की निरन्तरता विवाह एवं परिवार से ही सम्भव है। यह नातेदारी का भी आधार है। विवाह के कारण कई नातेदारी सम्बन्ध पनपते हैं। विवाह आर्थिक हितों की रक्षा एवं भरण-पोषण के लिए भी आवश्यक है। विवाह संस्था व्यक्ति को शारीरिक, सामाजिक एवं मानसिक सुरक्षा प्रदान करती है।

विवाह के कार्य : विवाह के प्रकार्य मानव की विभिन्न प्राणीशास्त्रीय आवश्यकताओं में यौन सन्तुष्टि एक आधारभूत आवश्यकता है। मानव में यौन इच्छाओं की पूर्ति का आधार अंशतः दैहिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक है। यौन इच्छाओं की सन्तुष्टि ने ही विवाह, परिवार तथा नातेदारी को जन्म दिया है। विवाह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की संस्कृति का हस्तांतरण भी करता है। विवाह के प्रमुख प्रकार्य अथवा कार्य इस प्रकार हैं -

1. प्रजा अथवा पुत्र प्राप्ति - विवाह का प्रथम कार्य सन्तानोत्पत्ति माना गया है। हिन्दुओं में पुत्र का विशेष स्थान है, वही पिता के लिए तर्पण और पिण्डदान करता है, उसे मोक्ष दिलाता है। पितृ-ऋण से मुक्ति पाने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति विवाह करके सन्तानों को जन्म दे। सन्तान उत्पन्न होने पर ही वंश एवं समाज की निरन्तरता बनी रहती है।

2. रति आनन्द - विवाह का महत्वपूर्ण कार्य यौन सन्तुष्टि है। उपनिषदों में यौन सुख को सबसे बड़ा सुख कहा गया है। वात्स्यायन ने रति आनन्द की तुलना ब्रह्मानंद से की है। इस प्रकार धर्मशास्त्रों में यौन इच्छाओं की पूर्ति को आवश्यक माना गया है, किन्तु वह मनमाने ढंग से नहीं वरन् समाज द्वारा स्वीकृत तरीकों से होनी चाहिये।

3. धर्म या धार्मिक कार्यों की पूर्ति - विवाह के महत्वपूर्ण कार्यों में धर्म एवं धार्मिक कार्यों की पूर्ति को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। प्रत्येक गृहस्थ से यह आशा की जाती है कि वह प्रतिदिन ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ एवं नृयज्ञ आदि पाँच महायज्ञ करे। यज्ञ में पति और पत्नी दोनों का होना आवश्यक है और ऐसा विवाह द्वारा ही सम्भव है।

4. व्यक्तित्व का विकास - स्त्री और पुरुष के व्यक्तित्व के विकास के लिए विवाह आवश्यक है। विवाह के द्वारा व्यक्ति समाज में अनेक नवीन पद एवं भूमिकाएं ग्रहण करता है। मनु कहते हैं कि मनुष्य अपूर्ण है जिसे विवाह ही पूर्णता प्रदान करता है। इस प्रकार विवाह व्यक्तित्व के विकास एवं संगठन की दृष्टि से आवश्यक है।

5. परिवार के प्रति दायित्वों का निर्वाह - विवाह के द्वारा व्यक्ति अपने पारिवारिक ऋण एवं दायित्वों का निर्वाह करता है। जिन माता-पिता ने उसे जन्म दिया, लालन-पालन कर बड़ा किया, शिक्षा प्रदान की व समाज में रहने योग्य प्राणी बनाया, उनकी वृद्धावस्था, बीमारी एवं संकट के समय सेवा-सुश्रूषा करना व्यक्ति का कर्तव्य है जिनकी पूर्ति विवाह द्वारा ही सम्भव है।

निष्कर्ष : इस प्रकार विवाह धार्मिक कार्यों की पूर्ति, पुत्र प्राप्ति, रति आनन्द, ऋणों से मुक्ति पुरुषार्थों की पूर्ति, स्त्री-पुरुष के व्यक्तित्व का विकास, परिवार, समाज एवं समुदाय की निरन्तरता एवं उनके प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह आदि कार्यों को सम्पन्न करते हुए अपनी महत्ता को बनाये रखे है।

हिंदू विवाह पर निबंध - Hindu Vivah Par Nibandh

हिंदू विवाह पर निबंध : हिंदुओं में विवाह एक पवित्र धार्मिक कार्य होता है। हर हिंदू के लिए विवाह आवश्यक होता है क्योंकि इसके बगैर हिंदू पुरुष ग्रहस्थाश्रम में प्रवेश नहीं कर सकता है। प्राचीन धर्मशास्त्रीय विद्वानों ने जो चार जीवन चरण (आश्रम) नियत किए थे उनमें से वह दूसरा है। विवाह की आवश्यकता एक-दूसरे कारण से भी होती है। जन्म, मृत्य और पुनर्जन्म के बंधन के छुटकारा पाने के लिए ही संतान और खासकर पुत्र की प्राप्ति आवश्यक होती है। यह अवधारणा हिंदुओं में प्रचलित आत्मा की अनश्वरता और पुनर्जन्म के विचार पर आधारित है। 

हिंदू विवाह एक संस्कार

हिंदू धर्मशास्त्रियों ने विवाह को संस्कारों में से एक माना है। दूसरे शब्दों में यह उन पावनकारी अनुष्ठानों में से एक है जो हर हिंदू के लिए जरूरी है। इसके अंतर्गत जो विधि-विधान होते हैं उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति को विभिन्न सीमाओं, त्रुटियों और कमजोरियों से मुक्त कराना है जो मानवकाया के रक्त-माँस-मज्जा में फैले होते हैं। कोई व्यक्ति इन सीमाओं या त्रुटियों से पलायन नहीं कर सकता। जहाँ तब सम्भव हो हम इन खामियों से ऊपर उठने की चेष्टा कर सकते हैं या ऐसा हमें ही करना चाहिए। संस्कारों या इन विधि-विधानों का निष्पादन इन उद्देश्य की पूर्ति करता है। हिंदू विधि वेत्ता मनु ने संस्कार के उद्देश्य को इन शब्दों में प्रकट किया है: ब्रह्मयम् क्रियनते तनुः। तात्पर्य यह कि हर व्यक्ति को अपने शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को इस तरह शुद्ध रखना चाहिए कि अनुराग और अलगाव, सुखभोग और त्याग, आत्माभिव्यक्ति और आत्मोत्सर्ग किसी व्यक्ति के जीवन में संतुलित रूप से घुल-मिल जाएँ और जीवनमरण के बंधन से स्वयं को स्वतंत्र करने में उसे सक्षम बना दें। विवाह एक संस्कार है क्योंकि नवविवाहित जोड़े को वैवाहिक बंधन का प्रयोग करने का परामर्श दिया जाता है ताकि देह और काम-वासना के बंधन तोड़े जा सकें। 

हिन्दू विवाह का धार्मिक पहलू 

अतः यह आश्चर्यजनक नहीं है कि विवाह की हिंदू-अवधारणा के पीछे एक धार्मिक अनुशक्ति (सैंक्शन) की पृष्ठभूमि होती है। विवाह संस्कार के अंतर्गत अनेक अनुष्ठानों और यज्ञ-याजनों का निष्पादन होता है। 'कन्यादान' या वधू के पिता द्वारा वर को अपने पुत्री का दान, आहुति की अग्नि को दैवी साक्षी और संस्कार को पवित्र करने वाली अग्नि के रूप में प्रज्वलित करना (विवान-होम), वर द्वारा वधू के हाथों को थामना (पाणिग्रहण) और आहुति की अग्नि के चारों ओर वर और वधू द्वारा सात फेरे लगाना, वर का वधू से आगे-आगे चलना (सप्तपदी) आदि विवाह से संबंधित महत्त्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान हैं। इन सबकी समाप्ति के बाद दुल्हा दुल्हन को लेकर चला जाता है। संस्कृत शब्द 'विवाह' का अर्थ है लेकर चले जाना। 

हिन्दू विवाह की शर्तें

विवाह अपनी ही जाति में (वर्ण) में होना अनिवार्य है। पर व्यवहार में यह अपनी उपजाति के भीतर होता है। अपने लिए वर या वधू खोजने के क्रम में हर किसी को अनिवार्य रूप से मातृपक्ष की पाँच पीढ़ियों (सपिण्ड) की सीमा से बाहर और पितृपक्ष की सात पीढ़ियों (गौत्र और प्रवर से इतर) से बाहर जाना होगा। 

हिन्दू विवाह के प्रकार

हिंदू विधि-ग्रन्थों में अनेक प्रकार के विवाहों की चर्चा है। जब कोई पिता अच्छे चरित्र और विद्या वाले किसी व्यक्ति को अपनी पुत्री सौंप देता है तो इसे ब्रह्म विवाह कहते हैं। जिस व्यक्ति को पुत्री सौंपी जाती है वह अगर पुजारी या पुरोहित है तो इस तरह के विवाह को दैव कहते हैं। जब कोई संभावित जमाता लड़की के पिता से उपहारस्वरूप लड़की हासिल करने से पूर्व एक साँड या एक गाय सौगात के रूप में देता है तो इसे आर्ष विवाह कहते हैं। पर इस तरह का विवाह खरीदारी या क्रय द्वारा होने वाले विवाह से भिन्न है जिसे असुर विवाह कहते हैं। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के संदर्भ असुर विवाह की निन्दा की गई है पर मनु ने वैश्यों और शूद्रों के संदर्भ में इसे अच्छा माना है। जब कोई पिता किसी व्यक्ति का अच्छी तरह से सम्मान करने के बाद उसे उपहार रूप में अपनी पुत्री दे देता है और विवाहित जोड़े को साथ-साथ धर्म का निर्वाह करने का उपदेश देता है तो इसे प्राजापत्य विवाह कहते हैं। पारस्परिक प्रेम और अनुबंध के आधार पर होने वाले विवाह को गंधर्व विवाह कहते हैं। अपहरण द्वारा विवाह राक्षस विवाह कहलाता है और इसे कानूनी तौर पर वैध माना जाता है। पर अगर कोई लड़की सोई हुई हो, नशे में हो या मानसिक रूप से असंतुलित हो तो उसके साथ सहवास और विवाह को पैशाच विवाह कहते हैं। सभ्य-जीवन के तौर-तरीकों के उल्लंघन के कारण इसकी तीव्र भर्त्सना की गई है। 

निष्कर्ष 

हिंदू विधि वेत्ताओं ने विभिन्न प्रकार के विवाहों को मान्यता देकर अनेक जटिल सामाजिक समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने की चेष्टा की है। अतीत में उत्तर-पश्चिम की ओर से भारत पर अनेक आक्रमण हुए हैं। देश के भीतर भी गैर-आर्यों की एक बहुत बड़ी संख्या दृष्टिगोचर हुई है। जिनके साथ आर्यों का संपर्क रहा है। एक के बाद एक आप्रवासी और स्थानीय गैर आर्यों के समूहों के कारण अनैतिक यौन-संबंध के मामले भी सामने आए और परिणामस्वरूप अविवाहित स्त्रियों के बच्चे हो गए। बड़ी तादाद में अवैध बच्चों की उपस्थिति के कारण जो समस्याएँ उठ खड़ी हुई उनका समाधान अपहरण, पलायन आदि को विवाह के कुछ रूपों के रूप में मान्यता देने से ही संभव हो सका यद्यपि इस तरह के विवाहों को वांछित नहीं माना जाता था। इस पक्ष पर टिप्पणी करते हुए ए.एल. बाशम कहते हैं: "बड़े आश्चर्यजनक ढंग से संबंधों के एक व्यापक दायरे को मान्यता दी गई ताकि अपने प्रेमी द्वारा शील-भंग की शिकार या बाहरी उठाईगीरों द्वारा जबरन ले जाई गई लड़की को पत्नी का वैधानिक अधिकार मिल सके और उसके बच्चे को नाजायज होने का दुख नहीं भोगना पड़े"। 

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