Sunday, 17 April 2022

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत का वर्णन कीजिए

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत का वर्णन कीजिए

    अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त का अर्थ

    अनुकूलतम जनसंख्या से अभिप्राय उस जनसंख्या से है जो किसी देश में एक निश्चित समय पर दिये हुए साधनों का अधिकतम उपयोग तथा उत्पादन के लिए आवश्यक है। जब देश की जनसंख्या का आकार आदर्श रहता है तो प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है। इस प्रकार एक विशेष समय तथा परिस्थितियों में वही जनसंख्या सर्वोत्तम होती है जिसमें प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है। सिद्धान्त की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषों को समझना आवश्यक है। 

    अनुकूलतम जनसंख्या की परिभाषा

    1. डाल्टन (Dalton)- "अनुकूलतम जनसंख्या वह होती है जो प्रति व्यक्ति अधिकतम आय प्रदान करती है।"

    2. बोल्डिंग Boulding)- “वह जनसंख्या जिस पर जीवन स्तर अधिकतम होता है अनुकूलतम जनसंख्या कहलाती है।"

    3. वोल्फ (Wolf)- “वह जनसंख्या जो अधिकतम उत्पादन सम्भव बनाती है अनुकूलतम जनसंख्या अथवा सबसे अच्छी जनसंख्या है।" 

    4. राबिन्स Robbins)- "अनुकूलतम जनसंख्या वह है जिसमें अधिकतम उत्पादन संम्भव होता है।"

    5. कार साण्डर्स (Car Saunders)- "अनुकूलतम जनसंख्या वह है जो अधिकतम आर्थिक कल्याण उत्पन्न करती है।"

    6. जे0आर0 हिक्स (J.R. Hicks)- "अनुकूलतम जनसंख्या, जनसंख्या का वह स्तर है जिस पर प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिकतम होता है।" 

    7. एरिक रोल (Eric Roll)- "अनुकूलतम जनसंख्या किसी देश की वह जनंसख्या है जो अन्य साधनों की दी हुई मात्रा के सहयोग से अधिकतम उत्पादन कर सके।" 

    8. एडविन कैनन (Edwin Canon)- "किसी दिये हुए समय पर किसी देश में उत्पादन का एक अधिकतम बिन्दु होता है जहां पहुंचने पर जनसंख्या तथा प्राकृतिक साधनों का पूर्ण समन्वय हो जाता है, इस स्थिति में श्रम की मात्रा ऐसी होती है कि उसमें वृद्धि तथा कमी दोनों ही उत्पत्ति में कमी लाती है।" 

    अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की मान्यताएं

    1. किसी देश की जनसंख्या वृद्धि के बावजूद भी कार्यशील जनसंख्या का कुल जनसंख्या से पारस्परिक अनुपात अपरिवर्तित अर्थात् समान रहता है। 
    2. देश की कार्यशील जनसंख्या के प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किया गया प्रति घण्टा उत्पादन तथा कार्य के घण्टे स्थिर ही रहते हैं। 
    3. देश की जनसंख्या बढ़ने के बावजूद भी एक समय विशेष में उस देश के प्राकृतिक साधन, पूंजी की मात्रा एवं प्राविधिक अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होता। 

    अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की महत्वपूर्ण विशेषताएं

    अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की महत्वपूर्ण विशेषताएं निम्नलिखित है

    1. उत्पत्ति हास नियम पर आधारित- यह सिद्धान्त परिवर्तनशील अनुपात या उत्पत्ति हास नियम पर आधारित है। 

    2. अनुकूलतम जनसंख्या का बिन्दु गतिशील होता है- अनुकूलतम जनसंख्या का बिन्दु गतिशील होता है। जिन साधनों को दिया हुआ मान लिया गया है उसमें से किसी में भी परिवर्तन होने पर, यह अनुकूलतम बिन्दु या स्तर बदल जाता है। उदाहरणार्थ, देश में वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास, प्राकृतिक साधनों की खोज, उत्पादन की नयी रीतियों के अनुसंधान से प्रति व्यक्ति उत्पादन में वृद्धि होगी और अनुकूलतम बिन्दु ऊपर को खिसक जाएगा। 

    3. अनुकूलतम जनसंख्या परिमाणात्मक ही नहीं गुणात्मक विचार भी है- कुछ आधुनिक अर्थशास्त्रियों जिनमें प्रो0 बोल्डिंग, प्रो0 टी0आर0बाई, प्रो० पेनरोज प्रमुख हैं, की धारणा है कि अनुकूलतम जनसंख्या एक परिमाणात्मक विचार ही नहीं बल्कि गुणात्मक विचार भी है। यही कारण है कि बोल्डिंग 'प्रति व्यक्ति आय के स्थान पर 'जीवन स्तर' शब्द का प्रयोग करते हैं। प्रो0 बाई जनसंख्या के उस आकार को अनुकूलतम मानते हैं जो (प्रति व्यक्ति अधिकतम आय के अतिरिक्त) सामाजिक एवं आर्थिक जीवन को भी उच्चतम बना सके। स्वभावतः जब उत्पादन या आय बढ़ती है तो लोगों के आर्थिक कल्याण में भी वृद्धि होती है जिससे उनका जीवन स्तर ऊँचा उठने लगता है, परन्तु चरित्र, स्वास्थ्य, आदि गुणात्मक बातों को सम्मिलित करने से किसी समय पर एक देश के लिए सही रूप से अनुकूलतम जनसंख्या को ज्ञात करना अत्यन्त कठिन हो जाता है। 

    अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की आलोचना

    अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त समाज के लिए अत्यधिक उपयोगी है लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि यह पूर्णतया दोषमुक्त है। अनेक विद्वानों ने निम्न आधारों पर इसकी आलोचनाएँ की हैं

    1. इस सिद्धान्त की मान्यताएँ यथार्थ नहीं है-

    • यह मान्यता कि जनसंख्या वृद्धि के बावजूद जनसंख्या में कार्यशील जनसंख्या का अनुपात अपरिवर्तित रहता है, सही नहीं है। 
    • यह मान्यता भी त्रुटिपूर्ण है कि जनसंख्या में वृद्धि होने पर भी देश के प्राकृतिक साधन, पूँजी की मात्रा व उत्पादन प्रविधियाँ अपरिवर्तित रहती है। आज के इस प्रावैगिक समाज में इनके अपरिवर्तित रहने की कल्पना यथार्थ से परे है। 
    • यह कहना भी कि कार्यशील जनसंख्या के कार्य के घंटे तथा उनके द्वारा किया जाने वाला प्रति घंटा कार्य स्थिर रहता है, व्यावहारिक नहीं प्रतीत होता। 

    2. यह सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है- इसमें जिस अनुकूलतम या आदर्श जनसंख्या की बात की गई है उसकी माप करना यथार्थ जगत् में अत्यन्त ही कठिन है। जैसा कि चटर्जी ने लिखा है- "इस आकस्मिक और प्रतिक्षण परिवर्तित संसार में वस्तुतः अनुकूलतम जनसंख्या की खोज मृगतृष्णा की भाँति है।" 

    (3) जनसंख्या का सिद्धान्त मानना ही अनुचित- आलोचकों का मत है कि अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त को जनसंख्या का सिद्धान्त मानना ही अनुचित है क्योंकि, यह सिद्धान्त 'कारण एवं परिणाम' के सम्बन्धों पर समुचित प्रकाश नहीं डालता। यह इस सन्दर्भ में मौन है कि जनसंख्या किस प्रकार और क्यों बढ़ती है अथवा उसके बढ़ने का नियम क्या है? इस सिद्धान्त के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि कारण एवं परिणाम में सम्बन्ध हो। यह सिद्धान्त वस्तुतः जनसंख्या विवेचन में 'अनुकूलतम' के प्रत्यय का प्रयोग मात्र है। यही कारण है कि जहाँ (Benay K. Sarkar) ने 'इसे स्वभाव से अवैज्ञानिक कहा है।" वहीं सोरोकिन जैसे समाजशास्त्री यह कहने को मजबूर हुए हैं कि “यह कुतर्कों का दुष्चक्र है।" 

    4. यह सिद्धान्त आधुनिक परिवर्तनशील जगत के लिए अत्यन्त स्थैतिक है- अनेक विद्वानों ने सिद्धान्त की स्थिर प्रकृति के कारण इसे आधुनिक प्रगतिशील जगत् के लिए अनुपयुक्त और स्थैतिक कहा है- Alva Myrdal के अनुसार- यह सिद्धान्त एक "पुराना स्थैतिक विश्लेषण है।" आज की दुनिया में तकनीकी, सामाजिक संस्थाएँ व आर्थिक संगठन एक-सी स्थिति में नहीं रहते हैं। इतना ही नहीं उत्पादन फलन में परिवर्तन होने के कारण उत्पत्ति के नियमों में परिवर्तन होता रहता है। अतः इन तथ्यों को स्थिर मान लेना अवैज्ञानिक होगा। यही कारण है कि Paul Mombert ने कहा है कि यह सिद्धान्त आधुनिक जगत् के लिए केवल सैद्धान्तिक महत्व का है। अपनी स्थिर प्रकृति के कारण यह सिद्धान्त अपनी उपयोगिता ही खो बैठता है। 

    5. यह सिद्धान्त मात्र भौतिकवादी दृष्टिकोण पर आधारित है- "इस सिद्धान्त में आदर्श जनसंख्या का माप करने के लिए भौतिक आधारों का ही अवलम्बन लिया गया है। जनसंख्या के गुणात्मक व अन्य पक्षों पर ध्यान नहीं दिया गया है। इस प्रकार यह सिद्धान्त केवल प्रति व्यक्ति आय और उत्पादन पर ध्यान देता है जो कि अपने आप में संकुचित दृष्टिकोण का परिचायक है। वास्तव में जनसंख्या केवल आर्थिक आधारों से ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व सैनिक शक्तियों से भी प्रभावित होती है। अतः जनसंख्या के निर्धारण में इन तथ्यों पर ध्यान दिया जाना चाहिए था। 

    6. यह सिद्धान्त आय के वितरण पक्ष पर ध्यान नहीं देता- इस सिद्धान्त की इस बात पर भी आलोचना की जाती है कि यह राष्ट्रीय आय के वितरण पक्ष की उपेक्षा करता है। केवल उत्पादन पक्ष पर ही ध्यान देता है। 'प्रति व्यक्ति अधिकतम औसत आय' का तब तक कोई महत्व नहीं जब तक कि राष्ट्रीय आय का समान वितरण नहीं होता। यदि कुल राष्ट्रीय आय कुछ गिने-चुने धनी व्यक्तियों के हाथों में ही केन्द्रित हो जाय तो समाज के आर्थिक कल्याण में वृद्धि नहीं हो सकती। इस प्रकार, यह सिद्धान्त राष्ट्रीय आय के समान वितरण जैसे महत्वपूर्ण पक्ष की उपेक्षा करता है। 

    7. अनुकूलतम जनसंख्या ज्ञात करना कठिन- अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की एक महत्वपूर्ण आलोचना यह है कि किसी निश्चित अवधि में अनुकूलतम जनसंख्या का पता लगाना ही कठिन है। किसी देश में अनुकूलतम जनसंख्या स्तर के बारे में कोई प्रमाण नहीं मिलता। उसकी माप करना इसलिए सम्भव नहीं है क्योंकि अनुकूलतम जनसंख्या से तात्पर्य है देश के लिए परिमाणात्मक (Quantitative) तथा गुणात्मक (Qualitative) आदर्श जनसंख्या। गुणात्मक-आदर्श जनसंख्या में जनसंख्या का न केवल शारीरिक गठन, ज्ञान तथा प्रज्ञान बल्कि उसकी श्रेष्ठतम आयु-संरचना (Age-Composition) भी सम्मिलित रहती है। ये चर (Variable) परिवर्तित होते रहते हैं और वातावरण से सम्बद्ध हैं। इस प्रकार जनसंख्या के अनुकूलतम स्तर की अवधारणा अस्पष्ट रहती है। 

    8. यह सिद्धान्त आर्थिक नीति निर्धारण में सहायक नहीं- यह सिद्धान्त आर्थिक नीति (Economic Policy) के मार्ग प्रदर्शन की दृष्टि से बेकार साबित होता है। जब वित्तीय नीति का उद्देश्य देश में रोजगार, उत्पादन तथा आय के स्तर को बढ़ाना है या स्थिर करना है, तो जनसंख्या के अनुकूलतम स्तर की बात ही नहीं होती है। अतः इस सिद्धान्त का कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं है और इसे बेकार समझा जाता है। 

    9. सिद्धान्त का दृष्टिकोण संकुचित है- यह सिद्धान्त जनसंख्या के प्रश्न पर संकुचित दृष्टि से विचार करता है। मात्र प्रति व्यक्ति आय ही प्रगति का सूचक नहीं है। नागरिकों का स्वास्थ्य, शिक्षा, सभ्यता, निर्माण कौशल तथा नैतिक दृष्टि से उन्नत होना भी आवश्यक है। इस प्रकार, आदर्श जनसंख्या के आकार पर विचार करते समय केवल आर्थिक उन्नति पर ही ध्यान देना पर्याप्त नहीं है बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक तथा सैनिक परिस्थितियों

    10. प्रति व्यक्ति आय का ठीक-ठाक माप सम्भव नहीं- प्रति व्यक्ति आय की माप में कठिनाई होती है। इस सम्बन्ध में आंकड़े प्रायः गलत, भ्रमोत्पादक तथा अविश्वसनीय होते हैं जो अनुकूलतम जनसंख्या की धारणा के प्रति सन्देह उत्पन्न करते हैं। शायद इसीलिए Brinley Thomas ने भी कहा है, "यह धुंधला पकड़ में न आने वाला विचार है।"


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