Monday, 18 April 2022

जनांकिकीय संक्रमण किसे कहते हैं?

जनांकिकीय संक्रमण किसे कहते हैं?

जनांकिकीय संक्रमण अथवा जनसांख्यिकीय संक्रमण जनसंख्या के विकास का आधुनिकतम सिद्धांत है। यह सिद्धांत यूरोप के अनेक देशों के आँकड़ों पर आधारित है। यह सरल है, तर्क संगत है तथा सभी सिद्धान्तों में सर्वाधिक वैज्ञानिक प्रतीत होता है। वर्तमान जनसंख्या शास्त्रियों का मत है कि प्रत्येक समाज की जनसंख्या को अनेक अवस्थाओं से गुजरना होता है। प्रत्येक अवस्था की अपनी विशेषतायें होती हैं। विश्व का कोई देश प्रथम अवस्था में है तो कोई द्वितीय, और कोई तृतीय अवस्था में। इन तीनों अवस्थाओं का संक्षिप्त विवरण निम्न है। 

प्रथम अवस्था यह अवस्था पिछड़े देशों में होती है। जहाँ जन्म-दर भी ऊँची है तथा मृत्यु-दर भी ऊँची है। कृषि, आय का प्रमुख स्रोत है-ग्रामीण अर्थव्यवस्था। द्वितीयक उद्योग या तो हैं ही नहीं, यदि हैं तो बहुत छोटे पैमाने पर। तृतीयक उद्योग (Tertiary Sector) जैसे-बीमा, बैंक आदि नहीं होते हैं। प्रति व्यक्ति आय कम है अतः बच्चे आय बढ़ाने के स्रोत होने के कारण दायित्व नहीं वरन् पूँजी हैं। कृषि में प्रत्येक उम्र के बच्चे के लिये काम निकल आता है। अतः छोटा बच्चा भी आय का स्रोत होता है। बच्चों के विकास, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की कोई महत्वाकांक्षा ही नहीं होती, अतः उनमें व्यय नहीं होता है। संयुक्त परिवार-व्यवस्था होती है, अतः लालन-पालन की कोई समस्या नहीं होती है। इन्हीं सब कारणों से प्रथम अवस्था में जन्म-दर ऊँची होती है तथा मृत्यु-दर भी ऊँची होती है। प्रथम चरण में बड़े परिवार के अनेक आर्थिक लाभ भी होते हैं। 

द्वितीय अवस्था द्वितीय चरण में अर्थव्यवस्था आर्थिक विकास की ओर अग्रसर होती है। कृषि के साथ उद्योग भी बढ़ने लगते हैं। परिवहन व शहरीकरण होने से गतिशीलता बढ़ती है। शिक्षा का विस्तार, आय में वृद्धि, भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा में सुधार होने से मृत्यु-दर घटती है। किन्तु धर्मान्धता, रीति-रिवाज व रूढ़िवादिता के बन्धन ढीले नहीं होते हैं। अतः जन्म-दर नहीं घटती है और जनसंख्या विस्फोट की स्थिति आ जाती है। 

तृतीय अवस्था में जीवन-स्तर सुधार, मानसिक विकास, नारी-शिक्षा, नारी रोजगार में वृद्धि तथा औरतों में जागृति आती है। परिणामस्वरूप औरतें कम बच्चे पसन्द करने लगती हैं, सारे जीवन भर बच्चे खिलाने की अपेक्षा वे अन्य क्षेत्रों में सहयोग करना चाहती हैं, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा अच्छी तरह करने की होड़ होने लगती है। शहरीकरण से आर्थिक कशमकश बढ़ती है, साधन कम पड़ने लगते हैं। परिवार नियोजन की विधियाँ विकसित होती हैं। विवाह की आयु बढ़ने लगती है अतः प्रजनन आयु-वर्ग का विस्तार घटने लगता है अतः दिखावा-प्रभाव (Demonstration effect) अत्यन्त प्रभावशील होता है। अतः जन्म-दर घटने लगती है। 

विश्व के सभी देश इन्हीं तीन प्रमुख अवस्थाओं से गुजर रहे हैं अथवा गुजर चुके हैं। अफ्रीका के कुछ देश प्रथमावस्था में हैं, तो एशिया से कुछ द्वितीय अवस्था में हैं, तथा यूरोपीय देश तृतीय अवस्था में हैं। 

जनसंख्या परिवर्तन की अवस्थाएँ

प्रो0 सी0 पी0 ब्लैकर ने जनांकिकी परिवर्तन की पांच अवस्थाएँ बतायी हैं। 

(1) प्रथम अवस्था – उच्च स्थिर अवस्था (High Stationary Stage ):- इस अवस्था में देश आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ तथा अर्द्धविकसित होता है। लोग अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं तथा उनका मुख्य व्यवसाय कृषि होता है और कृषि भी पिछड़ेपन की स्थिति में रहती है। उद्योग धन्धों का विकास नहीं हुआ होता है। कुछ थोड़े से उपभोक्ता वस्तु उद्योग ही रहते हैं। परिवहन, वाणिज्य, बैंकिंग एवं बीमा क्षेत्र बहुत पिछड़ी स्थिति में रहते हैं। इससे लोगों की आय का स्तर बहुत नीचा रहता है तथा देश में गरीबी व्याप्त रहती है। संयुक्त परिवार प्रणाली, अशिक्षा, बाल-विवाह तथा अन्या सामाजिक कुरीतियों के कारण जन्म दर ऊँची रहती है। लोग अनपढ़, गंवार, बहमी और भाग्यवादी होते हैं उन्हें संतति निरोध के तरीकों से चिढ़ होती है। बच्चे भगवान की देन और किस्मत की बात समझे जाते हैं। बड़ा परिवार होना गर्व की बात समझी जाती है। सन्तानहीन मां-बाप को समाज में आदर की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। इस प्रकार की स्थिति, अफ्रीका व एशिया महाद्वीप के पिछड़े देशों में देखने को मिलती है।

(2)द्वितीय अवस्था (Second Stage) :- दूसरी अवस्था में देश आर्थिक दृष्टि से कुछ विकास करने लगता है। कृषि की दशा में सुधार होने लगता है। कृषि में यन्त्रीकरण की शुरूआत हो जाने से उत्पादन बढ़ने लगता है। उद्योगों का विकास भी होना प्रारम्भ हो जाता है। पहले जो उपभोक्ता वस्तुएं विदेशों से आयात की जाती थीं वे अब देश में बनने लगती हैं। परिवहन के साधनों का विकास होने लगता है। श्रम की गतिशीलता बढ़ने लगती है। शिक्षा का विस्तार होने लगता है। चिकित्सा तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाएं सुलभ होने लगती हैं। रहन-सहन का स्तर बढ़ने लगता है। इन सबका परिणाम यह होता है कि मृत्यु-दर घटने लगती है, परन्तु सामाजिक सोच में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता। सामाजिक रीति-रिवाजों के कारण जन्म-दर में कोई कमी नहीं आती। लोग परिवार के आकार पर विशेष नियन्त्रण करने के लिए प्रयत्न नहीं करते क्योंकि परिवार नियोजन के विषय में धार्मिक अन्धविश्वास तथा सामाजिक निषेध मौजूद रहते हैं। मृत्यु-दर में कमी होने और जन्म-दर में परिवर्तन न होने से जनसंख्या तेजी से बढ़ती है। परिणामस्वरूप जनसंख्या विस्फोट (population explosion) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 

(3)तृतीय अवस्था (Third Stage):- तृतीय अवस्था में औद्योगीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्नत एवं आधुनिक प्रकार की कृषि होने लगती है। उद्योग धन्धों की उन्नति के कारण नगरीकरण तेजी से होने लगता है। प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होने लगती है लोगों का जीवन स्तर बढ़ता है। रोजगार हेतु ग्रामीण क्षेत्रों से नगरों की ओर पलायन होने लगता है। सामाजिक परिवर्तन तेजी से होता है। समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार होता है। वे पुरूषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य में बराबर का हिस्सा निभाने लगती हैं। शिक्षा में पर्याप्त सुधार होता है। लोगों का छोटे परिवार के प्रति झुकाव होने लगता है। रूढ़िवादी, परम्परावादी, अन्धविश्वासी एवं पुराने रीति-रिवाजों का लोग परित्याग करने लगते हैं। विभिन्न तरीकों से जनसंख्या को नियन्त्रित करने का प्रयास किया जाने लगता है। पहले से कम मृत्यु दर और घट जाती है। जन्म-दर में भी गिरावट आती है। इससे जन्म-दर एवं मृत्यु-दर के बीच अन्तर कम हो जाता है। इससे जनसंख्या की वृद्धि दर कम हो जाती है। इस अवस्था में भी जनसंख्या विस्फोट की स्थिति कुछ हद तक विद्यमान रहती है। इस समय भारत इसी अवस्था से गुजर रहा है। 

(4)चतुर्थ अवस्था (Fourth Stage):- इस अवस्था में देश उच्च विकसित अवस्था में होता है। लोगों के रहन-सहन का स्तर काफी ऊँचा रहता है। पुरूष तथा स्त्री देर से शादी करना पसन्द करते हैं। लोग स्वतः खुशी से परिवार नियोजन की विधियां अपनाते हैं। इस अवस्था में जन्म क्रम एवं मृत्यु क्रम दोनों ही नियन्त्रित एवं नीचे रहते हैं जिससे सन्तुलन बना रहता है और जनसंख्या के आकार में कोई अन्तर नहीं आता। जनसंख्या में स्थिरता की स्थिति के बाद भविष्य में जनसंख्या घटने का ही डर रहता है। अतः जनसंख्या में वृद्धि हेतु उपाय खोजे जाने लगते हैं। आज यूरोप के विकसित देशों में यह स्थिति देखने को मिलती है।

(5)पंचम अवस्था (Fifth Stage):- पांचवीं अवस्था आर्थिक विकास की अन्तिम अवस्था है। इस अवस्था में मृत्यु की अपेक्षा उत्पत्ति कम होती है। फलस्वरूप जनसंख्या का आकार घटता जाता है। देश में पूर्ण रोजगार की स्थिति रहती है। यह अवस्था फ्रांस आदि अति विकसित देशों में देखने को मिलती है। 


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