Thursday, 3 February 2022

वैज्ञानिक पद्धति से सामाजिक जीवन के मूल्यों का पता लग सकता है अथवा नहीं। स्पष्ट करो।

वैज्ञानिक पद्धति से सामाजिक जीवन के मूल्यों का पता लग सकता है अथवा नहीं। स्पष्ट करो। 

यह सच है कि वैज्ञानिक पद्धति से सामाजिक जीवन के लिये उपयुक्त मूल्यों का पता नहीं लगाया जा सकता है। ये नैतिक निर्णय (Moral Judgement) के विषय हैं वैज्ञानिक निर्णय (Scientific Judgement) के विषय नहीं। परन्तु सामाजिक जीवन को चलाने के लिए नैतिक निर्णय भी उतने ही जरूरी हैं। राजनीति-वैज्ञानिक इस विषय को अपने विचार-क्षेत्र से बाहर मानते हुए अपने महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व से मुँह नहीं मोड़ सकते। यदि वे इन समस्याओं से दूर भागेंगे तो इनका निर्णय किसी और के हाथों में - विशेषतः किन्हीं निहित स्वार्थो (Vested Interest) के हाथों में चला जायेगा। इससे समाज को अपार क्षति पहुँच सकती है।

यह बात याद रखने की है कि मूल्यों का विश्लेषण निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। मूल्य-निर्णय (Value Judgement) वैज्ञानिक पद्धति का विषय नहीं है - यह इसका गुण है, त्रुटि नहीं। मूल्यों के सार-तत्व को पहचानने के लिये विवेक-बुद्धि (Wisdom) की आवश्यकता है; वैज्ञानिक प्रक्रिया का सहारा लेकर इस तत्व का पता नहीं लगाया जा सकता।

विवेकशील मनुष्य सहिष्णुता (Tolerance) के आधार पर परस्पर संवाद (Communication) स्थापित करके सहमति (Consensus) पर पहुँच सकते हैं। परन्तु कोई भी व्यक्ति या समूह यह दावा नहीं कर सकता कि उसने सत्य को पा लिया है। यदि ऐसा होगा तो मूल्यों की तलाश खत्म हो जायेगी और तथाकथित सत्य को निर्ममतापूर्वक लागू करना ही हमारा कर्तव्य रह जायेगा। इसका परिणाम होगा - अवरुद्ध समाज (Closed Society) और सर्वाधिकारवादी व्यवस्था (Totalitarian System) जिसमें मनुष्य की स्वतन्त्रता का दमन कर दिया जायेगा।

संक्षेप में, राजनीतिक-सिद्धांत का महत्व इसलिये है कि यह सार्वजनिक जीवन के लक्ष्य निर्धारित करता है, और ऐसी संस्थाओं एवं प्रक्रियाओं का पता लगाता है जो उन लक्ष्यों की सिद्धि में सहायक हों। ज्ञान-विज्ञान की कोई अन्य शाखा यह कार्य नहीं करती। राजनीतिक-सिद्धांत के विचारक्षेत्र में विज्ञान और दर्शन का जैसा मणि-कांचन संयोग देखने को मिलता है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने राजनीतिशास्त्र को 'परम विद्या' या 'सर्वोच्च विज्ञान' (Master Science) की संज्ञा इसलिये दी थी क्योंकि यह अन्य सब विद्याओं की उपलब्धियों को सदजीवन की सिद्धि के लिये नियोजित करता है। 


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