Thursday, 3 February 2022

आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में अतितथ्यवाद।

आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में अतितथ्यवाद का उल्लेख कीजिए।

अति-तथ्यवाद (Hyperfactualism) 

19वीं शताब्दी की ऐतिहासिक सकारात्मकता के प्रभावाधीन, जो भूतकाल के पुनर्निर्माण के साधन के रूप में सकारात्मक तथ्यों के संग्रह पर बल देता था, 20वीं शताब्दी ने ब्राइस (Bryce) जैसे विद्वान् पैदा किए जिसने केवल तथ्यों, तथ्यों तथा तथ्यों (Facts, Facts and Fact) के अध्ययन पर ही बल दिया तथा जो अतितथ्यवाद में उलझ गया। आरम्भ में ब्राइस ने निष्कर्षों की स्थापना, सिद्धान्तों को समझने तथा वैज्ञानिक मूल्यों की प्राप्ति के लिए ही तथ्यों के अध्ययन की वकालत की। लेकिन इस प्रक्रिया में वह तथा अन्य अतितथ्यवादी तथ्यों के संग्रह में इतने उलझ गए कि सिद्धांत को भूल ही गए। वे एक अपक्व विचारवादी अनुभववाद में ही लगे रहे तथा इससे राजनीतिक सिद्धांत को पतन का सामना करना पड़ा।

ईस्टन (Easton) ने बड़े सुन्दर ढंग से कहा है, "तथ्यों के बिना सिद्धांत एक बिना दृढ़ आधार वाले अच्छे-चालित जहाज की तरह हो सकता है। लेकिन जब तथ्य-संग्रह में लगे रह कर तथ्यों को उनके सैद्धान्तिक महत्व से देखने को महत्व न दिया जाए तब तथ्यात्मक अनुसन्धान का अन्तिम मूल्य स्वयं भी समाप्त हो सकता

  1. अनुभववाद - 21वीं शताब्दी को अति तथ्यवाद का युग कहा जाता है। राजनीतिक सिद्धांत की प्रतिष्ठा कम हो गई और अधिकाधिक विद्वान् इन्द्रियानुभविकवाद को अपनाने लगे। इन्द्रियानुभविकवाद अनुसन्धान भी तथ्यवाद का पर्यायवाची बन गया। अधिक-से-अधिक तथ्य एकत्रित किए जाने लगे। अति तथ्यवाद से जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं, वे मात्र सामान्यीकरण होते हैं। जिस ढंग से अनुसन्धान में तथ्यवाद को जोर बढ़ता गया उसी रूप में राजनीतिक सिद्धांत की प्रतिष्ठा कम होने लगी।
  2. महान राजनीतिक दार्शनिकों की परम्परा का अवसान - कार्ल मार्क्स, जे० एस० मिल तथा लास्की के बाद एक भी उल्लेखनीय (outstanding) राजनीतिक दार्शनिक नहीं हुआ है। वस्तुतः राजनीतिक दार्शनिकों की महान परम्परा का अवसान हो चुका है इसलिए जनीतिक सिद्धांत का पतन होना स्वाभाविक है।
  3. राजनीति शास्त्र को 'विज्ञान' बनाने की चेष्टा - राजनीतिक सिद्धांत के ह्रास का . सरा कारण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नव-राजनीतिशास्त्री राजनीति-शास्त्र को राजनीति - विज्ञान बनाने की चेष्टा करने लगे। जब राजनीति को विज्ञान बनाने की चेष्टा में सब लोग टे हों तो राजनीतिक सिद्धांत का निर्माण कैसे हो सकता है क्योंकि उसका आधार दर्शन है न क विज्ञान।
  4. व्यवहारवाद का उदय और प्रभाव - द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद व्यवहारवाद का बोलबाला बढ़ने लगा। व्यवहारवाद का आधार नई अनुभववादी प्रविधियाँ हैं जिनमें सांख्यिकीय पद्धति, साक्षात्कार पद्धति, सर्वे पद्धति आदि प्रमुख हैं। इन नवीन पद्धतियों के कारण चिन्तन और अनुसन्धान को पृथक् करना सहज हो गया है। अब राजनीतिक शोध में कल्पना, नैतिकता. सौन्दर्यबोध जैसे दार्शनिक तत्व चिन्तन की प्रभावशीलता कम होने लगी।
  5. विज्ञान तथा सिद्धांत में भ्रान्ति - राजनीति वैज्ञानिक विज्ञान, सिद्धांत के सही अर्थ को समझने में असफल रहे। वैज्ञानिक अनुसन्धान का चलन इस ढंग से चला कि व्यर्थ के छोटे-छोटे अन्वेषण होने लगे जो सिद्धांत-निर्माण न कर पाए। आधुनिक राजनीति वैज्ञानिकों ने तथ्यों के आनुभाविक अध्ययन तथा व्यवस्थित अनुसन्धान का प्रयोग किया लेकिन वे भी राजनीतिक सिद्धांत को विकसित करने में असफल रहे। अन्य सामाजिक विज्ञानों के प्रभावाधीन वे राजनीति की प्रक्रियाओं के अध्ययन में लगे लेकिन राजनीतिक सिद्धांत का निर्माण करने में असफल रहे। व्यवहारवादियों तथा आदर्शवादियों के बीच तथ्य-मूल्य (Fact-Value) विवाद में बहुत-सा समय नष्ट हो गया तथा सिद्धांत-निर्माण की ओर बहुत कम प्रगति हुई।

राजनीतिक सिद्धांत को 20वीं शताब्दी में पतन का मुंह देखना पड़ा। राजनीतिक सिद्धांत के तथाकथित पतन की बात करते हुए माइकेल कर्टिस (Michael Curtis) ने कहा है, “अगर राजनीतिक सिद्धांत का पतन समकालीन पश्चिमी विश्व की बौद्धिक विशेषताओं में से एक रहा है तो यह प्राथमिक तौर पर बहुत-सी उन इच्छाओं की पूर्ति का परिणाम है जिन्होंने सिद्धांत को बल दिया। शायद पश्चिम द्वारा अपनाए जाने वाले दृश्य की संकीर्णता तथा विश्व-समस्याओं की बढ़ती हुई जटिलता ने सिद्धांतवादियों अथवा सिद्धांतशास्त्रियों को व्यर्थ के विषयों में उलझा दिया जिन्होंने अपनी दृष्टि की तीव्रता को खो दिया था। सामाजिक समस्याओं की चर्चा के लिए पर्याय बौद्धिक उत्तेजक को अभी ढूँढा जाना है।"

डेविड ईस्टन द्वारा की गई व्याख्या के अनुसार राजनीतिक सिद्धांत के पतन के बहुत से कारण हैं। कोब्बन, जर्मिनो तथा कई अन्य राजनीति वैज्ञानिक राजनीतिक सिद्धांत के पतन को स्वीकार करने में ईस्टन के साथ हैं। डेविड ईस्टन, एल्फ्रेड कोब्बन तथा कई अन्यों ने इस विचार की वकालत की कि राजनीतिक सिद्धांत, जिसे वे राजनीतिक दर्शन मानते हैं, तीव्रता से पतन की ओर जा रहा है।

पीटर लास्लेट तथा रॉबर्ट डॉहल जैसे कई अन्यों का विचार था कि राजनीतिक सिद्धांत पहले ही समाप्त हो चुका है। राजनीतिक सिद्धांत के परंपरागत गृह इंगलैण्ड में भी कुछ विद्वानों ने स्वीकार किया कि राजनीतिक सिद्धांत गम्भीर पतन की स्थिति में है। मिल तथा मार्क्स के पश्चात विद्वान् राजनीतिक चिन्तकों की अनुपस्थिति को इस बात के पक्ष में एक प्रमाण समझा गया। यह सामान्य विश्वास कि सामाजिक उतार-चढ़ाव तथा विवाद सदैव विलक्षण राजनीतिक चिन्तन पैदा करते हैं, 20वीं शताब्दी के मध्य में उस समय टूट गया जब सामाजिक विवाद तथा राजनीतिक आधारभूत सांस्कृतिक परिवर्तन तो हुए लेकिन इससे उच्च स्तरीय राजनीतिक चिन्तन पैदा न हुआ। समकालीन राजनीतिक चिन्तन एक शताब्दी पुराने विचारों पर आश्रित था, जिसके परिणामस्वरूप राजनीतिक चिन्तन का पतन हुआ।

फिर भी, बहुत से आधुनिक राजनीति वैज्ञानिक 20वीं शताब्दी में राजनीतिक सिद्धांत की त्रुटियों को तो स्वीकार करते हैं मगर इसके पतन या समाप्ति के विषय को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार, यह अभी भी जीवित है तथा यह परिवर्तित भी हुआ है, और विकसित भी। इसाय बर्लिन (Isaaih Berlin) इस विचार को कि राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक दर्शन की भावना से भी समाप्त हो गया है या इसका पतन हो गया है, का दृढ़तापूर्वक अस्वीकार करता है। कोई भी युग राजनीतिक दर्शन के बिना न तो हआ है और न हो सकता है और यह 20वीं शताब्दी के विषय में भी सच है।

राजनीतिक सिद्धांत 20वीं शताब्दी में दो मुख्य धाराओं में विकसित हुआ - व्यवहारवादी राजनीतिक सिद्धांत तथा परम्परावादी राजनीतिक सिद्धांत। उत्तर-व्यवहारवाद के आने से दोनों धाराओं में दूरी कम हुई। तथ्य बनाम मूल्य विवाद का स्थान तथ्य तथा मूल्य ने ले लिया तथा विज्ञान बनाम परम्परा का स्थान विज्ञान तथा परम्परा ने ले लिया। एक समय मार्क्सवादी राजनीतिक सिद्धांत लोकप्रिय रहा लेकिन पेरेस्ट्राइका तथा ग्लासनॉस्ट की धारणाओं के अन्तर्गत इसका रूपान्तरण हुआ। राजनीतिक 'वैज्ञानिक' तथा 'चिन्तक' निरन्तर औद्योगिक समाज की समस्याओं के अध्ययन तथा व्याख्या, वर्णन तथा भविष्यवाणी से परिपूर्ण सिद्धान्तों के निर्माण में लगे रहे हैं। नई धारणाओं, मॉडलों, दृष्टिकोणों तथा सिद्धान्तों का विकास कार्य प्रगति पर है। परंपरागत तौर पर - नव-मार्क्सवाद (Neo-Marxism) तथा नव-थॉमसवाद (NeoThomism), राष्ट्रवाद, इतिहासवाद, अस्तित्ववाद, उदारवाद, समाजवाद, यूरोपीय साम्यवाद, व्यापक मानव-अधिकारों तथा स्वतन्त्रता का सिद्धांत, पेरेस्ट्राइका तथा ग्लासनॉस्ट, लोकतान्त्रिक समाजवाद, गांधीवाद, मानववाद, मानव अधिकारवाद आदि ये सब 20वीं शताब्दी के सैद्धान्तिक उत्पादन हैं। इसाय बर्लिन के कथनानुसार ये एक महान् परम्परा की समाप्ति नहीं दर्शाते, अगर ये कुछ दर्शाते हैं तो नए तथा अपूर्व विकास को राजनीतिक बुद्धिमत्ता की तलाश 20वीं शताब्दी में चलती रही है।

निष्कर्ष (Conclusion) - कुछ भी हो, 1970 से शुरू होने वाले दशक में और इसके बाद में 'राजनीति विज्ञान' और 'राजनीति-दर्शन' के बीच का यह विवाद उतना उग्र नहीं रहा। जहाँ डेविड ईस्टन ने 'उत्तर-व्यवहारवादी क्रांति' के नाम पर सामाजिक मूल्यों के प्रति राजनीतिविज्ञान के बढ़ते हुए सरोकार का संकेत दिया, वहाँ राजनीति-दर्शन के समर्थकों ने भी अपनी मान्यताओं को तथ्यों के ज्ञान के आधार पर परखने में संकोच नहीं किया है।

कार्ल पॉपर ने वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method) का विस्तृत निरूपण करते हुए उपयुक्त सामाजिक मूल्यों के बारे में निष्कर्ष निकालने में तनिक भी संकोच नहीं किया है।

जॉन राल्स ने न्याय में नियमों का पता लगाने के लिए अनुभवमूलक पद्धति अपनाने में अभिरुचि का परिचय दिया है। सी० बी० मैक्फ र्सन ने जोसेफ शुंपीटर और रॉबर्ट डाल के अनुभवमूलक दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए लोकतंत्र का आमूल-परिवर्तनवादी सिद्धांत (Radical Theory) प्रस्तुत किया है। हर्बर्ट मार्क्यूज़ और युर्गेन हेबरमास ने समकालीन पूँजीवाद की आलोचना करते हुए अनुभवमूलक निरीक्षण की गहन अन्तर्दृष्टि का परिचय दिया है। अब यह स्वीकार किया जाता है कि राजनीति विज्ञान हमें सामाजिक और प्राकृतिक विज्ञानों की तरह अपने साधनों को परिष्कृत करने में सहायता देता है। परन्तु साध्यों की तलाश के लिए हमें राजनीतिक दर्शन की शरण में जाना पड़ेगा। साध्य और साधन परस्पर आश्रित हैं इसलिए राजनीतिक दर्शन और राजनीति विज्ञान परस्पर पूरक भूमिका निभाते हैं। संक्षेप में, 20वीं शताब्दी में परम्परावादी स्वरूप वाले राजनीतिक सिद्धांत का ह्रास होने लगा जिसके प्रमुख कारण हैं - राजनीति को विज्ञान बनाने की प्रवृत्ति, व्यवहारवादी आन्दोलन, इतिहासवाद, अति तथ्यवाद और विचारधारा का बढ़ता प्रभाव।

फिर भी यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि परम्परावादी राजदर्शन की परम्परा एकदम समाप्त नहीं हुई है। अन्तर केवल इतना ही है कि जहाँ पश्चिमी देशों में इसका प्रभाव सीमित और मन्द हुआ है, वहाँ पूर्व में परम्परावादी दर्शन अति उग्र और आक्रामक हो गया है। पश्चिम में विज्ञान और व्यवहारवाद के कारण परम्परावाद कमजोर हआ है वहाँ पूर्व में धर्म और दर्शन के प्रभाव तथा विज्ञान एवं व्यवहारवाद के अभाव के कारण प्रबल हुआ है।

पिछले कुछ दशकों से यह माना जा रहा है कि पश्चिम में राजनीतिक सिद्धांत का पुनः उत्कर्ष (revival) हो रहा है।


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