Saturday, 11 December 2021

प्रकाशवती पाल का जीवन परिचय - Prakashvati Pal Biography in Hindi

प्रकाशवती पाल का जीवन परिचय - Prakashvati Pal Biography in Hindi


लहौर के एक कन्या विद्यालय की अध्यापिका प्रेमवती ने कक्षा में पढ़ाते हुए अपनी छात्राओं से कहा कि हमारा देश महान होते हुए भी आज पराधीन है। उस पराधीनता को समाप्त करने के लिए सतत प्रयत्न भी किए जा रहे हैं और हमारा पंजाब भी इस पराधीनता से मुक्ति के लिए सदैव अग्रसर रहा है। एक छात्रा ने प्रश्न किया कि पंजाब में ऐसे कौन से प्रयत्न किए जा रहे हैं। अध्यापिका प्रेमवती यह सुनकर हिचकिचाई और कहा कि इसका उत्तर कक्षा में नहीं दिया जा सकता। उत्तर देने में काफी समय भी लगेगा। छुट्टी के उपरांत तुम्हारे प्रश्न का समाधान किया जा सकेगा।

प्रश्न करने वाली छात्रा थी प्रकाशवती कपूर। प्रकाशवती के साथ उसकी सहेली लज्जादेवी ने भी एक दिन फुरसत के समय अपनी अध्यापिका प्रेमवती से यह विषय छेड़ दिया। प्रेमवती ने उसकी जिज्ञासा और उत्कट भाव को भांपकर बताया कि कैसे क्रांतिकारी लोग सक्रिय हैं और लाहौर में उन्हें बम बनाने और शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण दिया जाता है। इन सब कामों के लिए बस आवश्यकता है धन की।

अब तो प्रकाशवती और उनकी सहेलियों का एक दल बन गया जो धन एकत्रित करता और प्रेमवती के माध्यम से उसे क्रान्तिकारियों तक पहुँचा दिया जाता था। प्रकाशवती के मन में क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होने की प्रबल इच्छा जाग उठी। इस विचार को उसने प्रेमवती के सामने प्रकट किया। प्रेमवती ने उसे एक पत्र देकर कहा कि वह क्रांतिकारी यशपाल से जाकर मिले। उस पत्र को यशपाल को देकर प्रकाशवती ने अपने दिल की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि मेरे पिताजी इन सब बातों से दूर रखने के लिए मेरे पैरों में बेड़ियाँ डाल देना चाहते हैं। यशपाल ने कहा कि मैं समझा नहीं, बेड़ियों से आपका क्या तात्पर्य है। आप बड़े भोले हैं जो इतनी छोटी सी बात भी नहीं समझते अर्थात् माता-पिता अपनी संतान को किसी विशेष मार्ग पर जाने से रोकने के लिए उसका विवाह कर देते हैं और इसी को कहते हैं "पैरों में बेड़ियाँ डालना।"

आपके पिताजी आपकी शादी करना चाहते हैं- हाँ! और उन्होंने मेरी शादी तय भी कर दी है। तो इसमें बुराई क्या है? सभी लड़कियों की शादी होती है- आप भी इसका आनंद लें। इस काँटों भरे मार्ग पर चलने से क्या लाभ? देखिए! मैंने निश्चय कर लिया है देश की सेवा करने का और यह काम क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होकर ही कर सकती हैं

प्रकाशवती जी! मैं आपकी भावनाओं का सम्मान करता हूँ, किन्तु क्रांतिकारी दल में शामिल किए जाने का कोई वायदा भी नहीं कर सकता। तथापि मैं आपको लाहौर में अपने क्रांतिकारी साथियों से मिलाए देता हूँ उन्हीं के परामर्श से यह संभव हो सकेगा।

यशपाल ने प्रकाशवती को अपने क्रांतिकारी साथियों से मिलवा दिया और उसे दल में सम्मिलित करने की अनुमति मिल गई। अब क्या था? पिता के प्रतिबंधों से मुक्त होने की लालसा। पिता के नाम पत्र लिखकर छत से कूद पिछली गली से निकल कर घर छोड़ दिया। पत्र में लिखा था कि देश सेवा के कार्यों के लिए मैं घर छोड़कर जा रही हूँ।

प्रकाशवती को पहले तो क्रांतिकारी गतिविधियों एवं उसके तौर-तरीकों का प्रशिक्षण दिया गया और फिर गोपनीय परचे बाँटने का काम सौंपा गया। धीर-धीरे वह इन सब बातों में पूर्णतया दक्ष हो गयी।

पार्टी के काम का काफी विस्तार हो चुका है। बम बनाने की फैक्टरी दिल्ली में खोली गयी। यशपाल को बम बनाने का काफी अनुभव हो चुका था। प्रकाशवती के साथ यशपाल को दिल्ली भेज दिया गया। प्रकाशवती के ठहरने की व्यवस्था महाशय कृष्ण के घर पर की गयी। इस प्रकार बम फैक्टरी में काम करते-करते वे उनकी बारीकियों से भी दक्ष हो गयीं।

दिल्ली असेंबली में बम विस्फोट के कारण भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को गिरफ्तार कर लाहौर जेल भेज दिया गया था। चन्द्रशेखर आजाद की योजना थी कि भगतसिंह को लाहौर जेल से छुड़ाया जाए। इसके लिए यशपाल को दिल्ली से लाहौर भेज दिया गया। प्रकाशवती दिल्ली में ही रहीं।

बम विस्फोट के कारण क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की मृत्यु हो गई थी। लाहौर की बहावलपुर कोठी में बम फट जाने के फलस्वरूप भगतसिंह को छुड़ाने की योजना विफल हो गयी। यशपाल ने प्रकाशवती को अपने साले ध्रुवदेव के नाम से पत्र लिखा। पता नहीं कैसे उस पत्र के टुकड़े पुलिस के हाथ लग गए और पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए महाशय कृष्ण के घर की घेराबंदी की किन्तु प्रकाशवती वहाँ से खिसककर ख्यालीराम गुप्त के घर पहँच गयीं और वे गिरफ्तारी से बच गई।

दिल्ली बम विस्फोट का पुलिस को पता चल गया और अनेक लोग गिरफ्तार भी हो गए और कई लोग इधर-उधर भाग गए। प्रकाशवती को अब कानपुर में चन्द्रशेखर आजाद के पास पहुँचा दिया गया। आजाद ने प्रकाशवती को निशाना लगाना सिखा दिया जिसमें वे काफी अभ्यस्त हो गयी। आजाद की प्रेरणा से उन्होंने अपना अंग्रेजी का ज्ञान बढ़ाया और स्वास्थ्य की दृष्टि से व्यायाम इत्यादि भी करने लगी। 27 फरवरी 1931 को एल्फेड पार्क, इलाहाबाद में आजाद के निधन से उन्हें काफी सदमा पहुँचा। उन्होंने अपना संरक्षक और शुभचिंतक खो दिया था। उसके कुछ दिन बाद ही इलाहाबाद में पुलिस के साथ मुठभेड़ में यशपाल भी पकड़े गये। प्रकाशवती को एक और झटका लगा और उन्हें ऐसा लगने लगा जैसे वह आश्रयहीन हो गई हों। किन्तु संकट से उबर कर वे क्रांति संगठन सूत्रों का स्वयं संचालन करने लगीं। अंतत: जून 1934 में प्रकाशवती को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया गया।

1936 में उनका विवाह बन्दी यशपाल से जेल के भीतर सम्पन्न हुआ। यशपाल उन दिनों बरेली जेल में थे। जेल अधीक्षक मेजर मल्होत्रा अचानक यशपाल के पास जाकर पूछते हैं कि क्या वे मिस प्रकाशवती कपूर को जानते हैं? जी हाँ! जानता हूँ। आप यह क्यों पूछ रहे हैं? मेजर मल्होत्रा ने मुस्कराते हुए कहा “मिस प्रकाशवती कपूर ने डिप्टी कमिश्नर की मार्फत बरेली जेल में आपके साथ विवाह करने का प्रार्थनापत्र दिया है।" एक बार फिर भावुक होकर कहा कि --आप तो अभी दस-ग्यारह साल जेल में रहने वाले हैं- ऐसे में उसका त्याग तो देखिए। त्याग और धर्म की भावना तो केवल हिन्दू नारी में ही हो सकती है।"

यशपाल की सहमति लिखित रूप में प्राप्त कर बरेली जेल को अदालत के रूप में परिणत कर डिप्टी कमिशनर मि. पैडले और गवाहों की उपस्थिति में यशपाल और प्रकाशवती का विवाह संपन्न हुआ, उस समय यशपाल की माँ भी उपस्थिति थीं जिनका आशीर्वाद दोनों को प्राप्त हुआ। अब प्रकाशवती कपूर प्रकाशवती पाल हो गयीं। जेल में विवाह के कारण लोगों को कौतुहल और आश्चर्य हो रहा था किन्तु आनंद के उन क्षणों में मिठाई बाँटी गई। वहाँ से पुनः वे अपनी-अपनी जेलों में वापस गए। जेल से छटने के बाद ही उन दोनों का मिलन हुआ।

चंद्रशेखर आजाद की प्रेरणा से ही प्रकाशवती का क्रांति-स्वप्न साकार हुआ। बाद में उन्होंने अपना शिक्षा- क्रम जारी रखते हुए कुछ दिन बनारस हिन्दू विश्व-विद्यालय में भी अध्ययन किया। यह सत्य है कि प्रकाशवती को क्रांतिकारी बनाने वाले यशपाल थे तो यह भी निर्विवाद सत्य है कि यशपाल को लेखक बनाने में प्रकाशवती का योगदान है और वे सफल लेखक बन सके।


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