Tuesday, 2 April 2019

एनसीसी ( NCC )का उद्भव, विकास और भविष्य पर निबंध

एनसीसी ( NCC )का उद्भव, विकास और भविष्य पर निबंध

व्यक्तिगत आवश्यकताओं से ऊपर राष्ट्रीय आवश्यकतायें होती हैं। राष्ट्र के नागरिक यदि शरीर से दुर्बल हैं या राष्ट्र के पास सबल सैनिक नहीं हैं, तो कोई भी दूसरा राष्ट्र आकर उसे कभी भी दबा सकता है और अपनी मनमानी करा सकता है। शत्रु का मुंह तोड़ उत्तर देने के लिये यह आवश्यक है कि राष्ट्र के पास पर्याप्त शक्ति-सम्पन्न सेना हो। दूसरे, देश के नवयुवकों को स्वस्थ और चरित्रवान् बनाने के लिये भी व्यायाम आदि शारीरिक प्रशिक्षण आवश्यक है। आवश्यकता पड़ने पर ये ही नवयुवक देश की सेना में भर्ती होकर देश की शत्रुओं से रक्षा करने में समर्थ होते हैं। प्रगतिशील राष्ट्रों में प्रत्येक नवयुवक के लिए अनिवार्य सैनिक शिक्षा की व्यवस्था है। इंग्लैण्ड में प्रत्येक नवयुवक को, चाहे वह राजवंश का ही क्यों न हो, एक निश्चित अवधि के लिये सेना में कार्य करना पड़ता है। रूस और अमेरिका में भी ऐसी परम्परायें हैं। 1962 में चीनी आक्रमण से शिक्षा लेकर भारत ने भी सैनिक शिक्षा को अनिवार्य घोषित कर दिया है। इससे पूर्व यह एक ऐच्छिक विषय माना गया था।


सैनिक शिक्षा की राष्ट्रीय आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय सरकार ने 1956 में पं० हृदयनाथ कुंजरू की अध्यक्षता में नेशनल कैडिट कोर के विषय में विचार करने के लिए एक समिति गठित की थी। इसी समिति की संस्तुति के आधार पर 8 अप्रैल, 1957 को संसद में एन. सी. सी. अधिनियम पारित कर दिया गया। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य था-“देश के युवकों के चरित्र का विकास करना, उनमें सहयोग और सैनिक भावना को जागृत करना, सेना के प्रति उनमें रुचि जगाना तथा आवश्यकता पड़ने पर सेना में प्रवेश के लिये अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देना।”

1958 से 1962 तक देश में एन० सी० सी० ने पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त की तथा उत्तरोत्तर प्रगति होती गई। शिक्षा संस्थाओं द्वारा एन० सी० सी० यूनिट खोलने की माँग को बढता हुआ देखकर तथा उसकी पूर्ति कर पाना कठिन समझकर सरकार ने 13 से 16 वर्ष तक के बालक-बालिकाओं के लिए एन० सी० सी० की स्थापना की। एन० सी० सी० का अर्थ था Auxiliary Cadet Corps अर्थात् सहायक कैडिट दल। इस संगठन की स्थापना का मूल रूप “राष्ट्रीय युवक आन्दोलन” ही था। इसके उद्देश्य हैं—देश के युवकों और युवतियों में शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास कर उनके चरित्र का निर्माण करना तथा अनुशासित नागरिक बनाना, देश-भक्ति और राष्ट्र-प्रेम की भावना का संचार करना, आत्मविश्वास जगाना और समाज सेवा के लिये प्रशिक्षित करना, आदि।।

1960 से एन० सी० सी० राइफल्स के नाम से इस संगठन को नया स्वरूप दिया गया। इस नवीन योजना के फलस्वरूप 1960 और 1961 में इसका पर्याप्त विकास हुआ। लगभग ४ लाख युवक-युवतियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस नवीन संगठन का उद्देश्य था—सेना के राइफल रेजीमेंट के ढंग पर देश के युवकों को प्रशिक्षित करना। इसमें अध्यापकों पर अधिक उत्तरदायित्व था, उन्हीं को ट्रेनिंग देनी पड़ती थी, प्रशासन का सारा भार उन्हीं पर होता था। अतः केन्द्रीय सरकार ने 1959-60 में ऑफीसर ट्रेनिंग यूनिट की स्थापना की। 1957 में काम्पटी में एन० सी० सी० के अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिये एक प्रशिक्षण विद्यालय पहले ही स्थापित हो चुका था। 1962 में पुरन्दर में एन० सी० सी० अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण देने के लिये एक एन० सी० सी० एकेडमी की स्थापना की गई। 1964 में महिला एन० सी० सी० अधिकारियों के लिये ग्वालियर में एन० सी० सी० कॉलेज की स्थापना की गई।

1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया । फलस्वरूप 1962 तक, जो एन० सी० सी० केवल एक ऐच्छिक विषय थी, 1963 से अनिवार्य कर दी गई और उसके विकास के लिये बहुमुखी प्रयास किया गया। 1964 में एन० सी० सी० को समाप्त कर दिया गया तथा एन० सी० सी० को निम्न दो डिवीजनों में विभक्त कर दिया गया-

1- जूनियर डिवीजन।

२—सीनियर डिवीजन।

जुनियर डिवीजन में 13 से 18 वर्ष के छात्र-छात्रायें तथा सीनियर डिवीजन में 18 वर्ष से अधिक आय के कॉलिज एवं विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के लिये प्रशिक्षण अनिवार्य घोषित कर दिया गया। सेना की भांति एन. सी. सी. को भी तीन वर्गों में विभक्त कर दिया गया-

1.       सैनिक विंग।

2.       नौ-सैनिक विंग।

3.       नभ सैनिक विंग।

इनके द्वारा छात्र-छात्राओं को सेना की विभिन्न कार्य प्रणालियों की शिक्षा दी जाने लगी। 1964 से अब तक लाखों युवक युवतियां इस संगठन के द्वारा प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। 20 लाख से अधिक छात्र इस समय भी सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। एन.सी.सी. के संघ की स्थापना की गई है, जिसका उद्देश्य एन.सी.सी. के क्रिया कलापों एवं गतिविधियों का प्रचार एवं प्रसार करना, सम्बन्धित साहित्य प्रकाशित करना तथा विदेशों के इस प्रकार के संगठनों से सम्पर्क स्थापित करना है।

1965 तथा दिसम्बर 1971 के पाकिस्तानी आक्रमणों के समय एन० सी० सी० के हजारों प्रशिक्षित युवकों ने सेना में प्रवेश किया और उन्हें एमरजेन्सी कमीशन मिला। निश्चय ही एन० सी० सी० का देश की सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण और महान् योगदान है। यह देश की सेकिण्ड डिफेन्स लाइन है। सरकार ने यह निश्चय किया है कि आवश्यकता पड़ने पर 17 वर्ष से अधिक आयु के कैंडिटों और अधिकारियों को नागरिक सुरक्षा के लिये प्रयोग किया जा सकता है तथा देश सेवा की दृष्टि से उन्हें कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिये।

देश की सुरक्षा एवं सेवा के लिये एन० सी० सी० का महत्त्वपूर्ण स्थान है। नवयुवक और नवयुवतियों में सत्यता, ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता, जागरूकता तथा अनुशासनप्रियता, आदि गुणों का बीजारोपण इस संगठन के माध्यम से सहज रूप से हो जाता है। वे परिश्रमपूर्वक अपना कर्तव्य पालन करना जाने जाते हैं। एक-दूसरे से मिलकर काम करने की भावना का उनमें उदय होता है, वे देश की सुरक्षा के प्रति जागरूक हो जाते हैं। शत्रु का मुकाबला करने तथा उस पर विजय प्राप्त करने का आत्म-विश्वास उनमें स्वयं जाग्रत हो जाता है। भीरुता और कायरता उनसे दूर भागती है। चतुर्थ पंचवर्षीय योजना के अन्त तक देश में 30 लाख युवक-युवतियाँ एन० सी० सी० का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके थे, जिनमें 15 लाख सीनियर डिवीजन और 15 लाख जूनियर डिवीजन के थे । इस समय यह संख्या २० लाख से अधिक है। भारतवर्ष में एन० सी० सी० का भविष्य निःसन्देह उज्ज्वल है।

देश को सुरक्षा प्रदान करने में सेना की दूसरी पंक्ति के रूप में एन० सी० सी० निश्चित ही एक अमोघ अस्त्र के समान सफल एवं सहायक सिद्ध होगी। प्रत्येक विद्यार्थी को इसके कार्य-कलापों में मन से और रुचि से भाग लेना चाहिये तभी वे देश को भावी संकटों से बचाने में समर्थ हो सकेंगे।

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