Saturday, 23 November 2019

पंचतंत्र की 5 श्रेष्ठ कहानियां। Top 5 Panchtantra Stories in Hindi

पंचतंत्र की 5 श्रेष्ठ कहानियां। Top 5 Panchtantra Stories in Hindi

पंचतंत्र की 5 श्रेष्ठ कहानियां। Top 5 Panchtantra Stories in Hindi : पंचतंत्र की रचना पंडित विष्णु शर्मा द्वारा की गयी है। इसकी सबसे ख़ास बात ये है कि पंचतंत्र की सभी कहानियाँ प्रेरणादायक है तथा नीति ज्ञान से परिपूर्ण हैं। पंचतंत्र की कहानियों को इस तरह से लिखा गया है की अंत तक उसकी रोचकता समाप्त नहीं होती। इन कहानियों की जितनी प्रासंगिकता पहले थी, उतनी ही आज भी है।
  1. चालाक खरगोश और शेर
  2. धोखेबाजी का फल
  3. मछलियों की मूर्खता
  4. बंदर और मगरमच्छ
  5. बातूनी कछुआ

चालाक खरगोश और शेर

एक वन में एक शेर रहता था। शेर बड़ा बलवान था। उसे अपने बल पर बड़ा गर्व था। वह प्रतिदिन वन के दर्जनों जानवरों को मार डालता था। कुछ को खा जाता था और कुछ को चीर फाड़ कर फेंक देता था।

शेर के इस अंधाधुंध शिकार से वन के जानवरों में खलबली मच गई। उन्होंने सोचायदि शेर के द्वारा रोज इसी तरह हत्या होती रहीतो एक दिन जानवरों का खात्मा हो जाएगा। वन के जानवर इस प्रश्न पर विचार करने के लिए एकत्र हुए। उन्होंने एक उपाय निकालकर शेर के पास जाने का निश्चय किया।

सभी जानवर शेर की सभा में उपस्थित हुए। शेर जानवरों को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सोचा, “अच्छा हुआ आज जानवर यहीं आ गए। आज भोजन के लिए कहीं जाना नहीं पड़ेगा।” शेर बड़े जोर से गुर्दा उठाऐसा लगा मानो वह उन पर झपटना ही चाहता है। जानवरों ने निवेदन किया, “श्रीमानहमें मारकर खाने से पहले हमारी प्रार्थना सुन लीजिए। आप हमारे राजा हैंहम आपकी प्रजा हैं। आप रोज हमारा अंधाधुंध शिकार किया करते हैं। इसका फल यह होगा कि एक दिन वन में एक भी जानवर नहीं रह जाएगा। फिर आप किसे मार कर खाएंगेहम चाहते हैं कि आप बने रहें और हम भी बने रहें। आपको बिना कष्ट के प्रतिदिन भोजन मिलता रहे। 

शेर गुर्राकर बोल उठातो तुम सब क्या चाहते होजानवरों ने निवेदन किया, “श्रीमानआप अंधाधुंध शिकार करना छोड़ दें। आप अपने स्थान पर ही आराम से बैठे रहेआपके भोजन के लिए हम में से कोई एक जानवर आ जाया करेगा और आप को भोजन मिलता रहेगा। इस प्रकार हम भी व्यर्थ में मारे जाने से बच जाएंगे। जानवरों की बात शेर को पसंद आ गई। उसने कहा, “हमें तुम्हारी बात स्वीकार हैपर याद रहे यदि किसी दिन हमें भरपेट भोजन नहीं मिलातो हम एक ही दिन में सारे जानवरों का खात्मा कर देंगे।” 

जानवरों ने शपथपूर्वक कहा, “नहींश्रीमान हम ऐसा अवसर ही नहीं आने देंगे।” सभी जानवर अपने अपने घर लौट गए। उस दिन के बाद से प्रतिदिन शेर के पास कोई ना कोई जानवर आने लगा और शेर उसे खाकर अपनी भूख शांत करने लगा। धीरे-धीरे कई महीने बीत गए। 

एक दिन एक खरगोश की बारी आई। खरगोश था तो छोटे कद कापर बुद्धिमान था और बड़ा चतुर था। खरगोश शेर के पास पहुंचने के लिए अपने घर से चल पड़ा। मार्ग में उसने सोचा जीवन बड़ा मूल्यवान होता है। इस तरह शेर का भोजन बनना ठीक नहीं है। कोई ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे मेरे प्राण तो बच ही जाएंदूसरों जानवरों के भी प्राण बच जाएं।

बुद्धिमान खरगोश ने सोच-विचारकर एक उपाय ढूंढ निकाला। वह जानबूझकर शेर के पास कुछ देर से पहुंचा। शेर भूख से व्याकुल हो रहा था। खरगोश को देखते ही वह गुर्राकर बोला, “मैं कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं। तुम अब आए होतुम्हारे जैसे नन्हे खरगोश से मेरा पेट कैसे भरेगाजानवरों ने मुझे धोखा दिया है। मैं एक ही दिन में सब का काम तमाम कर दूंगा।” 

खरगोश शेर के सामने झुक कर बोला, “श्रीमानआप क्रोध ना करें। जानवरों का कोई दोष नहीं है। उन्होंने ठीक समय पर आपके लिए खरगोश भेजे थे। मेरे साथ पांच और थे। शेर गरज कर बोला, “तुम्हारे समेत छह थेतो पांच और कहां चले गए

खरगोश ने बड़ी ही नम्रता के साथ कहा, “वही तो बता रहा हूं। श्रीमान हम छह खरगोश आपके पास आ रहे थे। रास्ते में हमें एक दूसरे से मिल गया। वह गरजकर बोला, “कहां जा रहे हो?” जब हमने उससे कहा कि हम वन के राजा के पास जा रहे हैंतो वह बिगड़ कर बोला, “इस वन का राजा तो मैं हूं। मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा राजा नहीं है और बस उसने मेरे पांचों साथियों को मार डाला। मुझे इसलिए छोड़ दिया कि मैं आपको यह बताऊँ कि आप वन के राजा नहीं हैं। उनका राजा तो कोई दूसरा शेर है। यदि आप वन के राजा हैंतो उस दूसरे शेर का मुकाबला करें। 

खरगोश की बात सुनकर शेर क्रोध से आग बबूला हो उठा। वह बड़े ही आवेश से बोला, “ऐसा हैबताओ वह दुष्ट कहां रहता हैखरगोश ने उत्तर दिया, “श्रीमानउसने आपको ना केवल युद्ध के लिए ललकारा हैबल्कि बुरा भला भी कहा है। वह एक गुफा में रहता है।

शेर गर्जन के साथ बोल उठा, “मुझे ले चलो उसके पास। मैं पहले उसका काम तमाम कर लूं। उसके पश्चात तुम्हें खाऊंगा।” खरगोश आगे-आगे चल पड़ा। वह शेर को एक कुएं के पास ले गया। बोला, “श्रीमानवह यहीं रहता है। यहीं थालगता है अपने किले में छिप गया है। उसका किला धरती के भीतर है। आप किले की दीवार पर खड़े होकर उसे ललकारे तो वह अवश्य बाहर निकल आएगा। 

खरगोश ने कुएं की जगत की ओर संकेत करके कहा, “श्रीमानयही किले की दीवार है। शेर क्रोध में तो था हीवह कुएं की जगत पर खड़ा हो गया। उसने भीतर झांक कर देखातो उसे कुएं के पानी में उसी की परछाई नजर आई। शेर ने सोचा कि सचमुच ही दूसरा शेर किले में छिपा हुआ है। वह बड़े जोर से दहाड़ उठा। उसके दहाड़ने पर कुए के भीतर से प्रतिध्वनि निकलीजो उसी की दहाड़ के समान थी। 

शेर ने समझा कि उसकी दहाड़ को सुनकर दूसरा शेर की दहाड़ रहा है। वह क्रोध में पागल हो गया उसने आव देखा ना तावदूसरे शेर को मारने के लिए कुएं में कूद पड़ा। बस फिर क्या थाकुएं में गिरते ही उसके होशो-हवास उड़ गए। वह बाहर निकलने के लिए छटपटाने लगा। लेकिन वह कुएं में ही तड़प-तड़प कर मर गया। 

खरगोश ने जब जंगल के जानवरों को शेर की मृत्यु की खबर सुनाईतो वे बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने खरगोश को बहुत-बहुत धन्यवाद तो दिया ही एक साथ मिलकर उसकी बुद्धिमानी की प्रशंसा के गीत भी गाए। 

धोखेबाजी का फल

एक तालाब के किनारे एक सारस रहता था। सारस बड़ा मक्कार था। वह प्रतिदिन तालाब की मछलियों को खाया करता और बड़े सुख के साथ जीवन व्यतीत करता था। उसे जब भी भूख लगती, तालाब के किनारे पहुंच जाता और पानी में से मछलियों को पकड़-पकड़ कर खा लिया करता था। 

इस तरह कई साल बीत गए। धीरे-धीरे सारस भी बूढ़ा होने लगा। उसके शरीर का बल घटने लगा। वह अब पहले की तरह मछलियों को पकड़ नहीं पाता था। जब भी मछलियों को पकड़ने के लिए चोंच बढ़ाता, मछलियां उछलकर भाग जाया करती थी। सारस चिंतित हो उठा, वह सोचने लगा इस तरह कैसे काम चलेगा? कोई उपाय करना पड़ेगा, जिससे भूखों मरने की नौबत ना आए।

सारस मक्कार तो था ही, उसने एक उपाय खोज निकाला सवेरे का समय था, सारस रोनी सूरत बनाकर तालाब के किनारे जा बैठा। ऐसा लग रहा था मानो, बड़ा दुखी हो। तालाब में रहने वाले एक केकड़े ने जब सारस को उदास देखा, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सारस के पास जाकर उससे पूछा, “क्या बात है चाचाजी, आज आप उदास क्यों हैं? आज आप मछलियों को भी पकड़ नहीं रहे हैं? 

सारस ने बड़े दुख के साथ कहा, “क्या करूं भाई, आज मैं सचमुच बड़ा दुख दुखी हूं। मैं इतने दिनों से तालाब की मछलियों को खाता आ रहा हूं। आज मैंने मछलियों के बारे में बड़ी बुरी खबर सुनी है। उसे खबर ने हीं तो मेरे मन को दुखी कर दिया है। केकड़े ने कहा, “चाचा जी आपने कौन सी बुरी खबर सुनी है? दया करके मुझे भी बताइए। 
सारस बोला, “थोड़ी देर पहले कुछ लोग यहां आए थे। वह कह रहे थे कि तालाब को मिट्टी से पाट दिया जाएगा और उस पर खेती की जाएगी। यदि तालाब को मिट्टी से पाट दिया जाएगा, तो सभी मछलियां मर जाएंगी। मछलियों के मरने के दुख से ही मेरा मन बड़ा दुखी है। यह सुनकर केकड़ा भी बड़ा दुखी हुआ। बोला, “सचमुच यह तो बुरी खबर है चाचाजी। 

केकड़े ने तालाब की मछलियों को भी यह खबर सुनाई। मछलियाँ व्याकुल हो रोने-धोने लगी। मछलियां रोती हुई सारस के पास पहुँचीं और आंसू बहाते हुए बोली, “तालाब के पाट दिए जाने पर हम सब मर जाएंगे। दया करके हम सबका उद्धार करो। हम सबकी जान बचाओ।” सारस दुख के साथ बोला, “सचमुच बड़ा संकट आ गया है। किया जाए तो क्या किया जाए? तुम सब संख्या में अधिक हो और मैं अकेला हूं। मैं अकेला तुम सब की जान कैसे बचा सकता हूं?”

मछलियां रोने लगी। रो-रो कर कहने लगीं, “चाहे जैसे भी हो तुम्हें हमारी जान बचाने ही पड़ेगी।” सारस बोला, “अच्छा ठीक है भाई, मैं तुम सब को बारी-बारी से दूसरे तालाब में पहुंचा दूंगा। चलो सब तैयार हो जाओ।” मछलियां आपस में झगड़ने लगीं। एक कहती थी मैं पहले जाऊंगी और दूसरी कहती थी नहीं मैं पहले जाऊंगी। इस तरह सभी मछलियां एक दूसरे से पहले जाने के लिए उतावली हो उठीं। 

सारस मछलियों को शांत करते हुए बोला, “अरे-अरे, तुम सब आपस में झगड़ क्यों रही हो? मैं बारी-बारी से सबको पहुंचा दूंगा।” सारस अपनी बात खत्म करके चार-पांच मछलियों को चोंच में दबाकर उड़ चला, पर वह उन्हें किसी दूसरे तालाब में नहीं ले गया। मार्ग में एक चट्टान पर जा बैठा और उन्हें खा कर फिर तालाब के किनारे जा पहुंचा। सारस ने तालाब के किनारे पहुंचकर कुछ देर विश्राम किया। जब भूख लगी तो फिर मछलियों के पास जा पहुंचा और पहले की ही तरह 4 से 5 मछलियों को चोंच में दबाकर उड़ चला। उन मछलियों को भी उसने पहले की तरह चट्टान पर रख कर बैठ कर खा डाला। वह हामेशा चार से पांच मछलियों को चोंच में दबाकर उस चट्टान पर आता और उन्हें खा जाता। इस प्रकार सारस ने सैकड़ों मछलियों का काम तमाम कर दिया।

तालाब में एक केकड़ा ही बचा था। सारस जब सैकड़ों मछलियों को दूसरे तालाब में पहुंचाने के बहाने मारकर खा चुका, तो केकड़े में सारस से कहा, “चाचा जी आप सैकड़ों मछलियों को दूसरे तालाब में पहुंचा चुके हो। दया करके अब मुझे भी पहुंचा दो। सारस ने कुछ सोचा और बोला, “चलो इस बार केकड़े को भी ले चलो। मछलियां तो बहुत खा चुका हूं, अब केकड़े को भी खाना चाहिए।” 

सारस केकड़े को चोंच में दबाकर उड़ चला। जब चट्टान के पास पहुंचा, तो नीचे उतरने लगा। केकड़े को आश्चर्य हुआ। उसने सोचा यहां कोई तालाब दिखाई नहीं दे रहा है, फिर यह सारस नीचे क्यों उतर रहा है? केकड़ा बोला, “चाचा जी यहां तो कोई तालाब दिखाई नहीं पड़ रहा है, फिर आप नीचे क्यों उतर रहे हो?” 

सारस ने उत्तर दिया, “हां कोई तालाब तो नहीं है, पर चट्टान तो है। देख रहे हो ना उस चट्टान को? मैं तुम्हें उसी चट्टान पर ले चल रहा हूं। चट्टान पर पहुंचने पर तुम्हें सब मालूम हो जाएगा। केकड़े ने चट्टान की ओर देखा। चट्टान के आसपास मछलियों की हड्डियों का ढेर लगा था। केकड़े को समझने में देर नहीं लगी कि सारस धोखेबाज है। यह मछलियों को दूसरे तालाब में पहुंचाने के बहाने उसी चट्टान पर मारकर खा गया है। यह हड्डियां मछलियों की है। यह मुझे भी इस चट्टान पर बैठ कर मार कर खा जाएगा। 

बस फिर क्या था केकड़े ने अपने पंजे सारस की गर्दन में गड़ाने आरंभ कर दिए। सारस फड़फड़ाने लगा और केकड़े को जमीन पर फेंकने का प्रयास करने लगा, पर केकड़ा उसकी गर्दन से चिपक गया था। वह रह-रहकर अपने पंजों उसकी गर्दन में गड़ाने लगा। सारस पीड़ा से व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ा और मृत्यु के मुंह में चला गया। केकड़ा धीरे-धीरे वापस अपने तालाब में जा पहुंचा। 

मछलियों ने केकड़े को देखकर पूछा, “क्यों भाई तुम्हें तो सारस दूसरे तालाब ले गया था? केकड़े ने उत्तर दिया, “मछलियों ईश्वर को धन्यवाद दो, तुम सब मारी जाने से बच गई। सारस बड़ा धोखेबाज था। वह दूसरे तालाब में पहुंचाने के बहाने मछलियों को ले जाता था और एक चट्टान पर बैठ कर उन्हें निगल जाता था। वह जितनी मछलियों को ले गया था, सब को मारकर खा गया है। 

वह मुझे भी खा जाना चाहता था, पर मैं उसके चाल को समझ गया। मैंने अपने पंजे सारस की गर्दन में गड़ाकर उसे मार डाला। धोखे से मछलियों के मारे जाने की खबर सुनकर सभी मछलियां बहुत दुखी हुई, पर धोखेबाज सारस की मृत्यु की खबर से वह प्रसन्न भी थीं। उन्होंने केकड़े को धन्यवाद तो दिया ही, धोखेबाज सारस की मृत्यु पर हर्ष भी मनाया। 

मछलियों की मूर्खता

एक सरोवर में बहुत सी छोटी-छोटी मछलियां रहती थी। उन मछलियों में से दो मछलियां ऐसी थीं, जिनमे एक का नाम सौबुद्धि और दूसरी का नाम सहस्त्रबुद्धि था। सौबुद्धि अपने नाम के अनुसार ही समझती थी कि उसमें सौ बुद्धि है। इसी प्रकार सहस्त्र बुद्धि भी समझती थी कि उसमें सहस्त्र बुद्धि है।

सौबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि दोनों अपने को सभी मछलियों से श्रेष्ठ समझती थी। दोनों के मन में अपनी-अपनी बुद्धि का बड़ा घमंड था। दोनों जब भी बोलती थी ऐंठकर बोलती थी, गर्व के साथ बोलती थी। गर्मी के दिन थे। तालाब में पानी कम हो गया था। पानी के नीचे तैरती हुई मछलियां दिखाई पड़ जाती थी।

एक दिन एक मछुआरा जाल लेकर तालाब के किनारे पहुंचा। वह किनारे पर खड़ा होकर तालाब की ओर देखने लगा। तालाब के पानी में हजारों मछलियां तैर रही थी। मछलियों को देखकर मछुआरे के मुंह में पानी आ गया। वह अपने आप ही बोल उठा, “इस तालाब में बहुत सी मछलियां हैं, पानी भी कम हो गया है। कल सवेरे जाल डालकर इन्हें फंसा लेना चाहिए।”

मछुआरे की बात सुनकर मछलियों के कानों में डर बैठ गया। मछलियां व्याकुल हो उठीं – हाय-हाय, अब क्या किया जाए? कल सवेरे मछुआरा जाल डालकर हम सब को पकड़ लेगा। व्याकुल मछलियां सौबुद्धि के पास गई। वह सबको मछुआरे की बात सुनाकर बोली, “तुम्हारे पास सौ बुद्धि है। तुम सबसे श्रेष्ठ हो। दया करके कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे हम सब उसके जाल में ना फंसे।”

सौबुद्धि इतराकर बोली, “तुम सब व्यर्थ ही डर रही हो। मछुआरा कल यहां नहीं आएगा। उसे पता है कि तालाब में मेरी जैसी श्रेष्ठ मछलियां रहती हैं। तुम सब डरो नहीं। जाओ, सुख से रहो। यदि मछुआरा आएगा तो मैं देख लूंगी।

व्याकुल मछलियां सहस्त्र बुद्धि के पास गई। उसे भी मछुआरे की बात सुनाकर मछलियां ने कहा, “तुम्हारे पास सहस्त्र बुद्धि है। तुम सबसे श्रेष्ठ हो। कृपया कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे हम सब मछुआरों के जाल में ना फंसे।” पर सहस्त्र बुद्धि ने घमंड के साथ उसी तरह की बातें कहीं, जिस तरह सौबुद्धि ने की थी।

तालाब में एक मेंढक भी रहता था। मेंढक का नाम एकबुद्धि था। वह सबसे प्रेम से बोलता, सबके साथ मिल जुलकर रहता था। वह बड़ा अनुभवी और व्यावहारिक था। व्याकुल मछलियां एकबुद्धि के पास भी गई। उसे भी मछुआरे की बात सुनाकर मछलिया बोली, “दया करके कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे हम सब मछुआरे के जाल में ना फंसे।” एक बुद्धि सोचता हुआ बोला, “मेरे पास तो एक ही बुद्धि है। मेरी समझ में तो यही आ रहा है कि तुम लोगों को इस तालाब को छोड़ देना चाहिए। तालाब में पानी कम हो गया है। कल मछुआरा जरूर आएगा और वह तुम सब को फसाने के लिए जाल अवश्य डालेगा।”

एक बुद्धि की बात सौबुद्धि और सहस्त्र बुद्धि ने उसकी बड़ी हंसी उड़ाई, दोनों ने बड़े गर्व के साथ मछलियों से कहा, “यह तो मूर्ख है। इसकी बातों पर विश्वास मत करना। चुपचाप इसी तालाब में रहो, कुछ नहीं होगा।

मछलियां बुद्धि सौबुद्धि और सहस्त्र बुद्धि की बात मानकर उसी तालाब में रह गई, पर मेंढक अपने बाल-बच्चों को लेकर उसी दिन दूसरे तालाब में चला गया। दूसरे दिन सवेरा होते ही मछुआरा जाल लेकर तालाब के किनारे पहुंचा। उसने मछलियों को फसाने के लिए जाल तालाब में फैला दिया। मछलियां व्याकुल होकर इधर से उधर भागने लगी, पर भाग कर कहां जा सकती थी। सारी मछलियां जाल में फंस गई।

सौबुद्धि और सहस्त्र बुद्धि ने भी बचने का प्रयत्न किया, पर वह दोनों भी जाल में फंस गई। मछुआरा फंसी हुई मछलियों को जाल में लेकर चल पड़ा। वह जाल कंधे पर रखे हुए था। उसका रास्ता उसी तालाब की ओर से होकर जाता था, जिसमें एकबुद्धि अपने बाल-बच्चों के साथ जाकर बस गया था।

एक बुद्धि किनारे पर बैठा हुआ था। उसने जब जाल में फंसी हुई मछलियों को देखा तो उसे बड़ा दुख हुआ। उसने अपने बाल-बच्चों को बुलाकर कहा, “एकबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि की बात मानने के कारण बेचारी सभी मछलियों को जान से हाथ धोना पड़ा। दोनों अनुभवहीन थी, घमंडी थीं। घमंड के कारण दोनों ने यह नहीं समझा कि तालाब में पानी कम है और मछुआरा तालाब में जाल डालने से रुकेगा नहीं। अगर मछलियों ने मेरी बात मान का तालाब को छोड़ दिया होता, तो उन्हें इस तरह अपनी जान गवानी पड़ती।

बंदर और मगरमच्छ की कहानी

एक नदी के किनारे वृक्ष पर एक बंदर रहता था। बंदर अकेला रहता था। वह वृक्ष के मीठे मीठे फलों को खाता और आनंदमय जीवन बिताया करता था। मन में कोई चिंता तो रहती नहीं थी इसलिए बड़ा स्वस्थ रहता था। एक दिन भोजन की खोज में एक मगरमच्छ नदी के किनारे पहुंचा। बंदर ने मगर को देखकर उससे पूछा, “तुम कौन हो भाई, कहां रहते हो?” मगर ने उत्तर दिया, “मैं मगर हूं, मेरा घर नदी के उस पार है।”

बंदर फल का खा रहा था। उसने मगर से पूछा, “क्या तुम भी खाओगे भाई?” बंदर ने चार-पांच फल नीचे गिरा दिए। मगर ने उन फलों को खाकर कहा, “वाह ! वाह ! यह तो बड़े मीठे हैं। बंदर ने कहा और खाओगे? मगर ने उत्तर दिया कि दोगे तो क्यों नहीं खाऊंगा। बंदर ने कुछ और फल नीचे गिरा दिए। मगर ने उन फलों को खाकर कहा, “क्या तुम प्रतिदिन इसी तरह के फल खाते हो?” बंदर बोला, “हां भाई फल ही मेरा भोजन है। मैं रोज ऐसे ही फलों को खाता हूं।”

मगर बोला यदि मैं कल आऊं तो क्या तुम मुझे कल भी फल खिलाओगे? बंदर ने उत्तर दिया, “क्यों नहीं खिलाऊंगा?” मगर दूसरे दिन भी गया और बंदर ने पहले दिन की भांति ही उसे फल खिलाएं। फल यह हुआ कि मगरमच्छ प्रतिदिन आने लगा और बंदर उसे प्रतिदिन फल खिलाने लगा। इस प्रकार प्रतिदिन आने जाने से बंदर और मगरमच्छ में गहरी मित्रता हो गई। मगर प्रतिदिन आता और बंदर उसे फल खिलाया करता था। दोनों में वार्तालाप भी खूब हुआ करते थे।

एक दिन की बात है, बंदर ने मगर से कहा, “भाई मैं तो अकेला हूं। क्या तुम भी मेरी ही तरह अकेले हो?” मगर ने उत्तर दिया, “नहीं भाई। मैं अकेला नहीं हूं। मेरे घर में मेरी पत्नी भी है।” बंदर बोला, “तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया? यदि तुम मुझे पहले बताते तो मैं तुम्हें भाभी के लिए भी फल दिया करता।” अच्छा कोई बात नहीं, आज भाभी के लिए भी फल ले जाओ। बंदर ने कुछ और फल तोड़कर गिरा दिया। मगर ने उन फलों को ले जाकर अपनी पत्नी को दिया।

मगर की पत्नी ने फलों को खाकर कहा, “यह तो बहुत मीठे हैं। कहां से लाए हो?” मगर बोला, “नदी के उस किनारे पर एक बंदर रहता है, वह मेरा मित्र है। उसी ने मुझे यह फल दिए हैं। बड़ा भला है, मुझे रोज फल खिलाया करता है। मगर की पत्नी बड़ी प्रसन्न हुई। मगर प्रतिदिन फल लाकर अपनी पत्नी को खिलाने लगा।

बंदर रोज उसे तो फल खिलाता ही था, उसकी पत्नी के लिए भी फल दिया करता था। मगर की पत्नी को फल तो मीठे लगते थे पर उसे मगर और बंदर की मित्रता अच्छी नहीं लगती थी। उसने सोचा रोज-रोज मगर का बंदर के पास जाना ठीक नहीं। कहीं ऐसा ना हो कि मगर विपत्ति में फंस जाए, क्योंकि वृक्ष पर रहने वाले की मित्रता पानी में रहने वाले से नहीं हो सकती। अतः मगर की पत्नी ने किसी तरह बंदर को फंसा कर मार डालने का निश्चय किया।

उसने सोचा कि बंदर के मरने पर उसका मीठा-मीठा मांस को खाने को मिलेगा ही और मगर की मित्रता भी समाप्त हो जाएगी। एक दिन मगर की पत्नी ने कुछ सोचकर उससे कहा, “बंदर तुम्हें रोज मीठे-मीठे फल खिलाता है, और मेरे लिए भी फल भेजता है। तुम भी उसे अपने घर भोजन करने के लिए आमंत्रित करो। मगर बोला, “बंदर को तो तैरना आता नहीं, फिर वह भोजन करने के लिए मेरे घर कैसे आएगा?”

मगर की पत्नी बोली, “बंदर तुम्हारा मित्र है, वह सहना नहीं जानता पर तुम तो जानते हो। क्या तुम उसे अपनी पीठ पर बिठाकर नहीं ला सकते? परंतु पत्नी की बात मगर के गले के नीचे नहीं उतरी। पत्नी प्रतिदिन बंदर को निमंत्रित करने के लिए आग्रह करती, किंतु मगर उसकी बात पर ध्यान नहीं देता था। सच बात तो यह थी कि मगर बंदर को कष्ट नहीं देना चाहता था। जब पत्नी की बात का प्रभाव मगर नहीं पड़ा तो उसने एक टेढ़ी चाल चली। उसने सोचा कि इस तरह तो काम नहीं चलेगा। बंदर को फसाने के लिए कोई और चाल चलनी चाहिए।

मगर की पत्नी बीमारी का बहाना करके बिस्तर पर पड़ गई। जब मगर उससे उसका हाल पूछने लगा तो वह बोली मुझको एक भयानक रोग ने पकड़ लिया है। वह रोग बंदर के कलेजे को छोड़कर किसी और दवा से दूर नहीं हो सकता। अतः कहीं से बंदर का कलेजा ले आओ। मगरमच्छ चिंतित हो उठा और उसने चिंता भरे स्वर में कहा, “यह तो बड़ी कठिन बात है, भला बंदर का कलेजा कहां से मिलेगा?

मगर की पत्नी बोली, “हां कठिन बात तो है, पर यदि तुम चाहो तो ला सकते हो। मगर बोला, “भला मैं क्यों नहीं चाहूंगा? तुम्हारी बीमारी को दूर करने के लिए मैं सब कुछ कर सकता हूं।” बताओ तो मैं बंदर का कलेजा कैसे ला सकता हूं? मगर की पत्नी बोली, “तुम्हारा मित्र बंदर है ना, तुम उसे मारकर उसका कलेजा ला सकते हो। मगर ने बड़े आश्चर्य के साथ कहा, “यह तुम क्या कह रही हो? जो मित्र मुझे रोज मीठे मीठे कल खिलाता है, मैं उसे मारकर उसका कलेजा लाऊँ?”

मगर की पत्नी बोली, “यदि तुम मुझे मृत्यु से बचाना चाहते हो तो तुम्हें बंदर का कलेजा लाना ही पड़ेगा। मित्र तो बहुत से मिल जाएंगे, यदि मैं मर गई तो फिर तुम्हें नहीं मिल सकती। मगर ने अपनी पत्नी को बहुत समझाया पर उसने एक ना सुनी। वह बराबर यही कहती रही कि यदि तुम मेरी जिंदगी प्यारी है, तो किसी तरह अपने मित्र बंदर का कलेजा ले आओ।

आखिर मगर करता तो क्या करता? वह विवश हो गया और अपने मन को दबाकर बंदर के पास चल पड़ा। उस दिन मगर कुछ देर से बंदर के पास पहुंचा। बंदर उसे देखते ही बोल उठा, “क्यों भाई आज देरी क्यों? मैं तो कब से तुम्हारी राह देख रहा हूं।” मगर कुछ मुंह बना कर बोला, “क्या बताऊं मित्र आज मेरी पत्नी ने मुझसे झगड़ा कर लिया। उसे मनाने में देर हो गई। तुम मेरे साथ घर चलो तुम्हारे समझाने बुझाने से कदाचित वह मान जाए। चलोगे ना? बंदर बोला, “क्यों नहीं चलूंगा? इसी बहाने भाभी को भी देख लूंगा। पर कठिनाई तो यह है कि मैं तैरना नहीं जानता।

मगर बोला, “तुम इसकी चिंता मत करो। तुम तैरना नहीं जानते तो मैं तो जानता हूं। मेरी पीठ पर बैठ जाओ, मैं तुम्हें अपने घर ले चलूंगा।” बंदर राजी हो गया, वह वृक्ष से नीचे उतरा और मगरमच्छ की पीठ पर जा बैठा। मगर उसे लेकर बीच धारा की ओर चल पड़ा। मगर जब बीच धारा में पहुंचा और डुबकी लगाने लगा, बंदर आश्चर्य के साथ बोल उठा, “यह क्या कर रहे हो भाई? तुम डुबकी लगा रहे हो, तुम्हारे डुबकी लगाने से तो मैं डूब जाऊंगा। मगर बोला, “यही तो मैं चाहता हूं कि तुम डूब कर मर जाओ।”

वास्तव में बात यह है कि मेरी पत्नी से मेरा झगड़ा नहीं हुआ, वह बीमार है। उसकी बीमारी बंदर के कलेजे से ही दूर हो सकती है। मैं तुम्हारे कलेजे के लिए झूठ बोल कर तुम्हें यहां ले आया हूं। अब तो तुम्हें मरना ही पड़ेगा। जब तुम मर जाओगे तो मैं तुम्हारे कलेजा निकाल लूंगा और अपनी पत्नी को ले जा कर दे दूंगा। बंदर सोचने लगा, “मगर को मैंने मीठे-मीठे फल खिलाएं, इसे अपना सच्चा मित्र समझा पर इसने मेरे साथ आज यह विश्वासघात किया। अब किया जाए तो क्या किया जाए?

बंदर जानता था कि मगर के पास बुद्धि नहीं होती। अतः उसने सोच कर कहा, “मगर भाई, तुम्हारी पत्नी की बीमारी का सुनकर मुझे बड़ा दुख हुआ है। मैं भाभी की बीमारी को दूर करने के लिए एक नहीं सौ कलेजे दे सकता हूं। तुमने पहले मुझे क्यों नहीं बताया। मैं अपना कलेजा लिए आता। दुख की बात तो यह है कि मैं कलेजे को वृक्ष पर ही छोड़ आया हूं। मगर बड़ा मूर्ख था, उसने मूर्खता के कारण बंदर की बात सच मानकर बोला, “क्या कहा तुमने? तुम अपना कलेजा वृक्ष पर छोड़ आए हो?” बंदर बोला, “हां ! मगर भाई, मैं अपना कलेजा वृक्ष पर ही छोड़ आया हूं।

मगर ने कहा तो फिर चलो, वृक्ष पर जाकर कलेजा ले लो। मगर अपनी बात को पूरी करके किनारे की ओर लौट पड़ा। बंदर यही तो चाहता था। वह मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने सोचा मूर्ख और विश्वासघाती मगर को मैंने अपनी बुद्धि से धोखे में डाल दिया है। मगर जब किनारे पहुंचा तो बंदर उछल कर सूखी धरती पर जा पहुंचा और फिर उछलकर पेड़ की डाल पर जा बैठा।

उसने वृक्ष की डाल पर से मगर से कहा, “मूर्ख मगर, तू मेरी मित्रता के योग्य नहीं है, तू विश्वासघाती तो है ही, महामूर्ख भी है। भला किसी का कलेजा भी उसके शरीर से अलग रह सकता है? तू मुझे फंसा कर मेरी जान लेना चाहता था, पर मैंने तुम्हें फंसा कर अपनी जान बचा ली। मेरा कलेजा मेरे शरीर में ही था। मैंने तो तुझसे झूठ ही कहा था कि कलेजा मैं वृक्ष पर छोड़ आया हूं। कलेजा यदि वृक्ष पर ही छोड़ जाता, तो जीवित कैसे रहता है। जाओ जाओ फिर कभी मेरे पास मत आना। मगर करता तो क्या करता? वह पश्चाताप करता हुआ अपने घर लौट गया। जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाता है, उसे इसी तरह पछताना पड़ता है।

बातूनी कछुए की कहानी

कछुए को बात करने का रोग था। जब तक वह किसी से बात नहीं कर लेता था, उसके मन को शांति नहीं मिलती थी। जब वह बात करने लगता तो करता ही जाता था। वह सोचता नहीं था कि उसकी बात सुनने वाले को अच्छी लग रही है या नहीं। तालाब के किनारे दो बगुले भी रहा करते थे। कछुए ने बगलों से मित्रता कर ली थी। वह प्रतिदिन बगुलों से देर तक बात किया करता था। बात करने में वह दूर की हांका करता था।

बगुले कछुए से बात तो करते थे पर कभी-कभी उसकी बातों से ऊब भी जाते थे, क्योंकि वह दूर की हांकने में बड़ा तेज था। बगुले कुछ कहते तो नहीं थे पर अपने मन में वह यह अवश्य ही समझते थे कि कछुए को बात करने की बीमारी है।

संयोग की बात है, पानी ना बरसने के कारण जोरों का अकाल पड़ा। तालाब का पानी सूख गया, पेड़-पौधे भी सूख गए। खेत-खलिहान बर्बाद हो गए। चारों ओर हाहाकार मचने लगा। तालाब का पानी सूख जाने के कारण बगुलों का जीवन संकट में पड़ गया। उन्होंने उस तालाब को छोड़कर दूसरी जगह जाने का निश्चय किया।

तालाब का पानी सूख जाने के कारण कछुआ भी संकट में पड़ गया था, पर उसमें बगुलों की तरह उड़ने की शक्ति नहीं थी। फिर भी वह दूसरी जगह जाने को विवश था। बगुले जब दूसरी जगह जाने लगे तो वह विदा मांगने के लिए कछुए के पास आए। कछुआ बगुलों की बात सुनकर बड़ा दुखी हुआ। वह रुआसा होकर बोला, “तुम दोनों तो जा रहे हो, मुझे यहां किसके सहारे छोड़े जा रहे हो?” बगुलों ने उत्तर दिया, “क्या किया जाए भाई, तालाब का पानी सूख गया है। अब यहां निर्वाह करना कठिन है। हमें भी तुम्हें छोड़ते हुए दुख हो रहा है, पर हम विवश है।

कछुआ बोला, “हां, बात तो ठीक है पर क्या तुम दोनों भी मुझे भी अपने साथ नहीं ले चल सकते?” बगुलों ने उत्तर दिया, “तुम हमारे साथ कैसे चल सकते हो? हमारी तरह तुम उड़ तो सकते नहीं।” कछुए ने सोचते हुए कहा, “तुम्हारी तरह उड़ तो नहीं सकता पर एक उपाय है। यदि तुम दोनों चाहो तो एक उपाय के द्वारा मुझे अपने साथ ले चल सकते हो।”

बगुलों ने पूछा, “वह कौन सा उपाय है?” कछुए ने कहा, “कहीं से ढूंढ कर एक लंबी पतली सी लकड़ी ले आओ, तुम दोनों अपने अपने मुख से एक-एक किनारे को पकड़ लेना, मैं लकड़ी को बीच में मुख से पकड़कर लटक जाऊंगा।” इस तरह तुम दोनों मुझे अपने साथ ले चल सकते हो। बगुलों ने कहा कि उपाय तो अच्छा है, पर कठिनाई यह है कि तुम्हें बोलने की बीमारी है। यदि उड़ते समय तुम्हें बात करने की धुन सवार हो गई तो हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा पर तुम व्यर्थ में अपनी जान गवा बैठोगे।

कछुआ बोल उठा, “वाह ! तुम दोनों क्या बात कर रहे हो, मैं ऐसी मूर्खता क्यों करूंगा? क्या मुझे अपने प्राणों का मुंह नहीं? फिर तो बगुलों ने कछुओं की बात मान ली। बगुले ढूंढकर एक लंबी पतली लकड़ी ले आए। दोनों ने एक-एक किनारे को मुख से पकड़ लिया। कछुआ बीच से मुख से लकड़ी को कसकर पकड़ कर लटक गया। बगुले मुख में लकड़ी को पकड़े हुए सावधानी से उड़ चले।

बगुले जब उड़ते हुए नगर के ऊपर से आगे बढ़ने लगे तो नगर के लोगों की दृष्टि उन पर पड़ी। उन्होंने आज तक ऐसा दृश्य नहीं देखा था। बगुले लकड़ी के एक-एक किनारे को पकड़कर उड़े जा रहे थे। कछुआ बीच से लकड़ी को मुंह से दबाए लटका हुआ था। लोग तालियां बजा-बजा कर हंसने लगे। जोर-जोर से कहने लगे कि देखो कैसा अद्भुत दृश्य है, दो बगुले कछुए को लेकर उड़ जा रहे हैं।

लोगों के हंसने की आवाज बगुले और कछुए के कानों में भी पड़ी। बगुले तो चुप रहे पर कछुए को तो बात करने का रोग था। लोगों की हंसी सुनते ही उसका रोग उमड़ आया। कछुए के मन में लोगों को डांटने की बात पैदा हो गई। ज्यों ही कछुए ने अपना मुंह खोला, लकड़ी उसके मुंह से छूट गई। वह नीचे गिर गया और मर गया। कछुए के मरने पर बगुलों को बड़ा दुख हुआ। वह आपस में एक दूसरे से कहने लगे, “अगर कछुए में अधिक बात करने का रोग ना होता तो उस बेचारे की जान इस तरह ना जाती।”

अधिक बात नहीं करनी चाहिए। बात करने से पहले सोच लेना चाहिए कि किस बात का क्या फल होगा। अधिक बात करने वाले को पछताना पड़ता है, हानी उठानी पड़ती है।

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