Saturday, 2 March 2019

यदि हिमालय न होता तो क्या होता पर निबंध

यदि हिमालय न होता तो क्या होता पर निबंध

यदि हिमालय न होता तो श्रष्टि का इतिहास कुछ और ही होता। भारत उत्तर दिशा में सुरक्षित नहीं होता। हिंदू संस्कृति का आध्यात्मिक स्वरुप होता भी तो किसी अन्य रूप में होता। गंगा-जमुना, सिंधु, ब्रम्हपुत्र और पांच नदियों का नामोनिशान नहीं होता। जगत जल के बिना तड़पता। मानव रत्नों और महा औषधियों के कोष से वंचित होता। पर्यटक प्रकृति सौंदर्य देखने के नाम पर अपने आंगन में ही घूम कर संतोष कर लेते।

यदि हिमालय न होता तो पौराणिक देवों में सर्वाधिक प्रभाव भगवान शिव पर पड़ता। उनका निवास स्थान कैलाश ना होता। हिमालय की पुत्री उनकी अर्धांगिनी पार्वती ना होती। पार्वती या उमा हिमालय की पुत्री हैं।

यदि हिमालय न होता तो महाभारत के वीर पांडव तथा द्रौपदी को जीवन की अंतिम शांति प्राप्त न होती क्योंकि वे तो देवात्मा हिमालय के आंचल में गलकर ही तो अपने जीवन का अंत करना चाहते थे। क्योंकि हिमालय में ही तो स्वर्गारोहण गिरी है उसके बिना क्या धर्मराज युधिष्ठिर का स्वर्गारोहण संभव था?

यदि हिमालय न होता तो हिंदू धर्म का आध्यात्मिक विचार प्रकट होता नहीं, होता भी तो उसका रंग रूप, साज सज्ज कुछ नहीं होती। जिसकी कल्पना भी असंभव है। हिमालय पर्वत पर ही तो यज्ञ, तप और अनुष्ठान करके ऋषि मुनियों, योगियों ने अध्यात्म की ज्योति जलाई, जीवन के सत्य से साक्षात्कार कर जीवन कृतार्थ किया। मानव को धर्म का संदेश देकर उसका जीवन धर्ममय बनाया।

यदि हिमालय ना होता तो उसके अंचलों में बसे देवस्थान ना होते। अमरनाथ, कैलाश मानसरोवर, बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार आदि अनंत पूजा और श्रद्धा केंद्र ना होते। शंकराचार्य का ज्योतिर्मठ ना होता। यदि हिमालय ना होता तो मुक्तिकामी तपस्वी साधकों को पवित्र स्थान प्राप्त ना होता।

यदि हिमालय न होता तो उत्तर की ओर से भारत की सुरक्षा का विश्वास कौन देता। अत्याचारी अरबों का आक्रमण हजारों वर्ष पूर्व ही हो गया होता जो भारत की अस्मिता को ही बदल देता भारत के इतिहास को पलट देता।

यदि हिमालय न होता तो सिन्धु, ब्रम्हपुत्र, गंगा यमुना नदियों के अभाव में भारत की धरती शस्य श्यामला होकर सोना नहीं उगलती। अन्न के अभाव में देशवासियों को प्रायः अकाल का सामना करना पड़ता है। इन नदियों के अमृतसम सलिल के अभाव में मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी और धरती भी प्यासी जाती।

यदि हिमालय न होता तो हजारों मील में फैले उसके घने जंगलों से फल-फूल, लकड़ी, जड़ी-बूटियां, वनस्पति, खनिज, रत्नों के अभाव में भारत की सभ्यता का कहीं पता ना होता। विज्ञान की उन्नति, आयुर्वेद और एलोपैथी की नींव ही खिसक जाती। हिमालय ना होता तो कश्मीर नहीं होता ना उसके केसर की क्यारियां होती। कहते हैं कि चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के घोड़ों ने कश्मीर की केसर क्यारीयों मैं लोट लोट कर के अपने खयाल लाल कर लिए थे। भोजपत्रों पर लिखे सहस्त्रो प्राचीन ग्रंथ आज हमारे पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं वह ना होते। बांस के वनों के अभाव में कृष्ण की मुरली ना बजती तथा ज्ञान प्रसार का मुख्य आधार कागज ना होता। हिमालय के घने जंगलों के अभाव में और हिमनदी के अभाव में वर्षा ना होती धरती प्यासी ही मरती। शेर, हाथी, चीते हाथी जंगली जीव ना होते।

हिमालय ना होता तो सृष्टि में प्राकृतिक सौंदर्य की कल्पना ही ना होती। उसके अभाव में पर्यटन का कार्य ना होता। कालिदास के मेघदूत का अलकापुरी ना होती। प्रसाद, पन्त, निराला, महादेवी को छायावादी दृष्टिकोण प्राप्त न होते।

हिमालय ना होता तो पर्वतारोहियों को उसके सर्वोच्च पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट को स्पर्श कर उसका आलिंगन करने का निमंत्रण कौन देता। कर्नल हंटर और शेरपा तेनजिंग विश्व  एवरेस्ट के सर्वप्रथम आरोही होने की यशस्विता कैसे प्राप्त करते।

इसलिए डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है कि हिमालय को भारतीय साहित्य और इतिहास से हटा दिया जाए तो वह बहुत निष्प्राण हो जाएगा। हिमालय हमारा प्रहरी है, देव भूत है, रत्न खानी है, इतिहास विधाता है, संस्कृति का मेरुदंड है।

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