Wednesday, 2 January 2019

स्मृति पाठ का सारांश Summary of Smriti in Hindi

स्मृति पाठ का सारांश Summary of Smriti in Hindi

Summary of Smriti in Hindi
पं० श्रीराम शर्मा द्वारा रचित लेख ‘स्मृति’ एक संस्मरणात्मक लेख है, जो साहसिक एवं शिकार कथा पर आधारित है। यह पं० श्रीराम शर्मा द्वारा लिखित ‘शिकार’ नामक पुस्तक से संकलित है जिसमें लेखक ने अपने बचपन की रोमांचकारी घटना का वर्णन किया है। सन् 1908 ई० में दिसंबर या जनवरी के महीने में शाम के साढ़े तीन या चार बजे जब लेखक अपने छोटे भाई के साथ झरबेरी से बेर तोड़कर खा रहा था, उन्हें (लेखक को) उनके बड़े भाई ने बुलवाया। लेखक पिटाई के भय से डर गया, परंतु भाई साहब ने लेखक को मक्खनपुर डाकखाने में पत्र डालने के लिए दिए जो बहुत आवश्यक थे। लेखक अपने छोटे भाई के साथ अपने-अपने डंडे लेकर व माँ के दिए चने लेकर चल दिए। लेखक ने पत्रों को अपनी टोपी में रख लिया क्योंकि उनके कुर्ते में जेबें न थी। मार्ग में दोनों भाई उस कुएँ के पास पहुँचे जो कच्चा था तथा जिसमें एक अतिभयंकर काला साँप था। प्रतिदिन लेखक व उसके मित्र कुएँं में ढेला फेंककर साँप की क्रोधपूर्ण फुसकार पर कहकहे लगाते थे। आज भी लेखक के मन में साँप की फुसकार सुनने की इच्छा जाग्रत हुई। लेखक ने एक ढेला उठाया और एक हाथ से टोपी उतारकर कुएँ में गिरा दिया। लेखक के टोपी हाथ में लेते ही तीनों चिट्ठियाँ जो टोपी में रखी थीं चक्कर काटती हुए कुएँ में गिर गई। निराशा व पिटने के भय से दोनों भाई कुएँ के पाट पर बैठकर रोने लगे। लेखक का मन करता कि माँ आकर गले लगाकर कहे कोई बात नहीं या घर जाकर झूठ बोल दे, परंतु लेखक झूठ बोलना नहीं जानता था तथा सच बताने पर उसे पिटाई का भय था, तब लेखक ने कुएँ मे घुसकर चिट्ठियाँ निकालने का दृढ़ निश्चय किया। लेखक ने अपनी व भाई की धोतियाँ तथा रस्सी बाँधी और रस्सी के एक सिरे पर डंडा बाँधकर कुएँ में डाल दिया तथा दूसरा सिरा कुएँ की डेंग से बाँध दिया और स्वयं धोती के सहारे कुएँ मे घुस गया। कुएँ में धरातल से चार-पाँच गज की ऊँचाई से लेखक ने देखा कि साँप उसका मुकाबला करने के लिए फन पैâलाकर तैयार था। लेखक को साँप को मारने व चिट्ठियाँ लेने के लिए कुएँ के धरातल पर उतरना ही था क्योंकि चिट्ठियाँ वहीं गिरी हुई थी। जैसे-जैसे लेखक नीचे उतरता वैसे-वैसे उसका चित्त एकाग्र होता जाता। कच्चे कुएँ का व्यास कम होता है इसलिए डंडा चलाने के लिए पर्याप्त स्थान न था। तभी लेखक ने साँप को न छेड़ने का निर्णय लिया। लेखक ने डंडे से चिट्ठियाँ सरकाने का प्रयास किया और साँप की फुसकार से लेखक के हाथ से डंडा छूट गया। लेखक ने दूसरा प्रयास किया और साँप डंडे से चिपट गया। डंडे के लेखक की ओर खिंच आने से साँप की मुद्रा बदल गई और लेखक ने लिफाफे और पोस्टकार्ड चुन लिए। लेखक ने चिट्ठियों को धोती से बाँध दिया, जिसे छोटे भाई ने ऊपर खींच लिया तथा डंडा उठाकर हाथों के सहारे ऊपर चढ़ गया। ऊपर आकर वह थोड़ी देर पड़ा रहा तथा किशनपुर के जिस लड़के ने उसे ऊपर चढ़ते देखा था उसे कहा कि इस घटना के बारे में किसी से न कहे। सन 1915 में मैट्रीक्युलेशन उत्तीर्ण करने के बाद लेखक ने यह घटना अपनी माँ को बताई और माँ ने लेखक को अपनी गोद में छुपा लिया।

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