Sunday, 27 January 2019

नर्मदा नदी की आत्मकथा पर निबंध

नर्मदा नदी की आत्मकथा पर निबंध

narmada nadi par nibandh
मैं नर्मदा नदी हूँ। मुझे गर्व है कि मैं भारत में बहती हूँ, जहाँ नदियों को माँ और उनके जल को अमृत के समान माना जाता है। मुझे भारत की प्रमुख नदियों में गिना जाता है। मैं साल भर अपनी विशाल जलराशि के साथ बहती हूँ। मेरा नाम भी बड़ा अर्थपूर्ण है। ‘नर्म’ का अर्थ है ‘सुख’ और ‘दा’ का अर्थ है ‘देने वाली’। मेरा एक नाम ‘रेवा’’ भी है। देश की दूसरी प्रमुख नदियाँ पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती हैं पर मैं पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती हूँ। मेरा वर्णन कई प्राचीन ग्रन्थों में है। मेरे जन्म के सम्बन्ध में भी अनेक पौराणिक कथाएँ हैं।

मैं मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकण्टक पहाड़ से निकली हूँ। यहाँ एक प्राकृतिक कुण्ड है। मेरा जन्म इसी कुण्ड से हुआ है। इससे इसका नाम नर्मदा कुण्ड पड़ गया है।

नर्मदाकुण्ड से निकलकर मैं एक बहुत पतली धारा के रूप में कपिल आश्रम तक आती हूँ। प्राचीनकाल में यहाँ कपिलमुनि का आश्रम था। यहाँ से मैं एक प्रपात के रूप में नीचे गिरती हूँ। इस प्रपात का नाम कपिलधारा है। कुछ आगे चलकर मेरा एक और छोटा-सा प्रपात है। यहाँ गिरती हुई धारा दूध के समान प्रतीत होती है। इसलिए इसका नाम ‘दूधधारा’ है।

डिंडौरी और मंडला जिलों से निकलकर मैं जबलपुर में आती हूँ। यहाँ मेरा पाट काफी चौड़ा हो जाता है। मेरे एक ओर विंध्यपर्वत और दूसरी ओर सतपुड़ा पर्वत मालाएँ हैं। इनके बीच मैं कल-कल, छल-छल बहती रहती हूँ। जबलपुर जिले में मेरी धारा को रोककर एक बहुत बड़ा बाँध बनाया गया है। इसका नाम बरगी बाँध है। इससे बहुत बड़े क्षेत्र की सिंचाई होती है तथा बिजली भी बनाई जाती है।

जबलपुर के निकट मेरी छटा देखते ही बनती है। मैं यहाँ भेड़ाघाट नामक स्थान पर मनमोहक प्रपात बनाती हूँ। नीचे गिरती मेरी नन्ही-नन्ही बूँदें धुएँ जैसी लगती हैं। इसलिए इसका नाम धुआँधार प्रपात है। यहाँ संगमरमर की चट्टानों के बीच बहना मुझे बहुत अच्छा लगता है। यहाँ एक स्थान पर धारा इतनी सँकरी है कि बन्दर छलाँग लगाकर पार कर जाते हैं इसलिए इस स्थान को ‘बन्दर कूदनी’ कहा जाता है।

जबलपुर जिले की उर्वरा भूमि को सींचकर मैं नरसिंहपुर, रायसेन और होशंगाबाद की धरती को भी उपजाऊ बनाती हुई हन्डिया और नेमावर नगरों के समीप से गुजरती हूँ। तवा मेरी प्रमुख सहायक नदी है।
खण्डवा जिले में मेरे तट पर ओंकारेश्वर नामक पवित्र तीर्थ है। खण्डवा जिले के ही पुनासा नामक स्थान पर मुझ पर इन्दिरा सागर बाँध बनाया गया है। यह भारत का सबसे बड़ा कृत्रिम जलाशय है। इससे लाखों हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होगी और एक हजार मेगावाट बिजली बनाई जाएगी।

मैं आगे बढ़कर धार और बड़वानी जिलों में बहती तथा महाराष्ट्र राज्य की सीमा बनाती हुई गुजरात राज्य में प्रवेश कर जाती हूँ। यहाँ मुझमें कई नदियाँ आकर मिलती हैं और मेरा पाट बहुत चौड़ा हो जाता है। गुजरात में नवगाँव नामक स्थान पर मुझ पर ‘‘सरदार सरोवर बाँध’’ बनाया गया है।

मुझ पर बने बाँधों से हजारों लोगों को विस्थापित होना पड़ा है। मुझे इसका बहुत दुख है, पर यह सन्तोष भी है कि इससे लाखों हेक्टेयर जमीन सींची जाएगी, मछली पालन होगा तथा गाँवों, शहरों और उद्योगों को बिजली मिलेगी। पर्यटन भी बढ़ेगा।

यहाँ से आगे मैं समुद्र में मिलने चल पड़ती हूँ। गुजरात के भड़ौच जिले में विमलेश्वर नामक स्थान पर खम्भात की खाड़ी में गिरकर मैं अरब सागर में समा जाती हूँ। मैं अपने जन्मस्थान से लेकर समुद्र में मिलने तक सबको अपने जल से तृप्त करती हूँ। मेरे जल में स्नान कर भक्तों को शान्ति मिलती है। मेरे भक्त मुझे बहुत पवित्र मानते हैं। मेरे तट पर अनेक गाँव व नगर बसे हैं तथा अनेक तीर्थ व दर्शनीय स्थल हैं।

मुझे यह बहुत बुरा लगता है कि एक ओर तो लोग मेरी पूजा करते हैं तथा दूसरी ओर मुझमें कचरा, गन्दा पानी और मृतप्राणी डालकर मेरा जल प्रदूषित करते हैं। मेरी सच्ची पूजा तो मुझे स्वच्छ बनाए रखना है।

मैं मध्यप्रदेश की जीवन रेखा हूँ। प्राचीन ग्रन्थों में मेरी स्तुति की गई है। धर्म-ग्रन्थों में ही नहीं, लोकगीतों में भी मेरा उल्लेख है। जो मेरे प्रति लोगों की श्रद्धा व प्रेम का प्रतीक है। कार्तिक माह में श्रद्धा से गाते हुए लोगों की ये पंक्तियाँ मुझे भी अच्छी लगती हैंः-
‘‘नरबदा मैया ऐसे तो मिलीं रे,
ऐसे तो मिलीं रे,
जैसे मिल गय माई और बाप रे.....,
नरबदा मैया ऐसे तो मिलीं रे .....।’’
कितना प्यार भरा है इस गीत में। लोग मुझसे मिल कर ऐसे प्रसन्न हो रहे हैं जैसे बालक को उसके माता-पिता मिल गए हों। लोगों की इस भावना से मेरी आँखें भर आती हैं।
लोग ‘‘हर हर नर्मदे’’ कहकर मेरा जाप करते हैं। मेरी कामना है कि अनन्त काल तक बहती रहूँ और सबको सुख पहुँचाती रहूँ।

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