लौका का चरित्र चित्रण - एक सत्य हरिश्चन्द्र

लौका का चरित्र चित्रण - डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल के नाटक 'एक सत्य हरिश्चन्द्र' का सबसे प्रमुख और विशिष्ट पात्र है-लौका। लौका इस नाटक का नायक भी है। वह हम

लौका का चरित्र चित्रण - एक सत्य हरिश्चन्द्र

लौका का चरित्र चित्रण - डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल के नाटक 'एक सत्य हरिश्चन्द्र' का सबसे प्रमुख और विशिष्ट पात्र है-लौका। लौका इस नाटक का नायक भी है। वह हमारे सामने दो रूपों में आता है- अपने मूल रूप में और सत्यवादी हरिश्चन्द्र के रूप में वह वर्तमान युग का हाड़माँस का जीवन्त व्यक्ति है, पर इस नाटक के भीतर अभिनीत नाटक में वह हरिश्चन्द्र की भूमिका में उतरता है।

अवश्य ही उसके दो रूप हैं, परन्तु उसके दो चेहरे नहीं है। वह चेहरे के ऊपर चेहरा नहीं चढ़ाता, बल्कि वह उसी रूप में हमारे सामने आता है जो वह है । वह जैसा ही व्यवहार करता है। जैसा वह है वह अकेला नहीं है यानी लौका है जब वह हरिश्चन्द्र होता है वह लौका होते हुए भी हरिश्चन्द्र होता है और हरिश्चन्द्र होते हुए भी लौका होता है।

लौका के दो रूप है और दोनों में एकरूपता है। एकरूपता उस हद तक है दोनों में अन्तर नहीं है, अन्तराल भी नहीं है। दोनों दो हैं और दोनों एक हैं एक प्राचीन युग का है और दूसरा आधुनिक युग का है। कह सकते हैं कि दूसरा व्यक्ति पहले व्यक्ति का प्रतिरूप है या उसका अवतार है या उसके अन्दर पहले की आत्मा प्रविष्ट हो गई है। सो दोनों भिन्न हैं और दोनों अभिन्न हैं। यह भिन्नता में अभिन्नता है और अभिन्नता में भिन्नता है। अजीब बात है, दोनों दो हैं और दो नहीं हैं। यह पता नहीं चलता कि ऐसा कैसे हो गया, परन्तु यह सच है कि यह सच हो गया।

लोकप्रियता

लौका इस नाटक के पहले ही पृष्ठ से लेकर अन्तिम पृष्ठ तक छाया हुआ है। शुरू में मंच पर वह केवल दर्शक है, कर्त्ता नहीं जबकि उससे पहले देवधर अपने कार्य कलाप में सक्रिय हो चुका है-"देवधर कुछ रूपये पुरोहित को देकर आगे निकल जाता है। हरिजन कुएँ पर खड़ा लौका यह सारा दृश्य चुपचाप देखता है।" यहाँ नाटक के दोनों प्रमुख पात्रों को नाटककार ने एक दूसरे के साथ ही नहीं आमने-सामने खड़ा कर दिया है। देवधर अपने जोड़-तोड़ में व्यस्त है, परन्तु लौका अभी स्थितियों को पहचान रहा है। वह बाद में सक्रिय होता है । वह सक्रिय ही नहीं होता, सबके आगे निकल जाता है, सब पर छा जाता है। वह एक प्रकार से जन आन्दोलन का सर्वप्रिय लोकप्रिय नेता बन जाता है।

आदर्शवादी

लौका लगातार संघर्ष कर जनता का हित साधता है। नाटक के अन्त का द श्य दर्शनीय है- "लौका-पंचों, यही है सत्यनारायण की कथा । अब आरती होगी।" इसके साथ ही लौका के मुख्य स्वर के साथ आरती होती है। जिसमें जन सद्भावना मिलती है। स्पष्ट है कि यह पात्र के व्यक्तित्त्व का विकास क्योंकि वह दर्शक मात्र से जनता का सर्वमान्य नेता बन गया ।

लौका इस नाटक का आदर्श पात्र है जो किसी के विरूद्ध नहीं है। न वह किसी के विरूद्ध सोचता है और न कोई कार्य करता है। वह सबके हितों की बात करता है और सबके हित में काम करता है। वह आम जनता में से एक है और आम जनता का पक्षधर है। वह आम जनता के अधिकारों के लिए प्रयत्नशील है और अंततः जन जाग्रति का मंत्र फूंक देता है जिसमें सफल होता है। वह साफ आदमी है, बात को सही रूप में समझने की कोशिश करता है और सबको उसकी वास्तविकता बता देता है।

लौका वर्तमान में जीता है। जहाँ अनेक समस्याएं है और एक वर्ग दूसरे वर्ग को दबाता है, तुच्छ समझता है और हितों को सुरक्षित रखने की प्रयत्नशीलता में दूसरे के हितों पर कुठाराघात करता है लौका जानता है, यह अन्याय है और अन्याय को सहन करना अनुचित है। वह उसका विरोध रता है, परन्तु कभी स्वयं चुप लगा जाता है तो कभी अपने साथियों को भी चुप लगाने के लिये कहता है। उसकी मान्यता है कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं है । अन्त में उसके निरन्तर प्रयत्नों से वह जनता को जाग त करने में सफल हो जाता है और रक्त हीन क्रांति कर देता है। जब सारी जनता उसके साथ है और वह जनता के साथ है तो फिर अन्याय कैसे हो सकता है।

कर्मठता

वह वर्तमान में जीकर भविष्य के लिए सपने देखता है। उसका सपना है समाज में ऐसी व्यवस्था करना जिसे पूरे देश में जाति और धर्म के भेदभाव नहीं होगें। उनमें सर्वोपरि होगा- मनुष्य धर्म। उसकी मान्यता है कि हमें तभी सच्चा स्वराज्य प्राप्त हो सकता है, जब समा मूल समाज की स्थापना होगी।

वह कर्मठ है, विचारक है, विचारों को कर्म में बदलने वाला व्यक्ति है। इतना ही नहीं वह देवधर के जातिवाद और शोषण के विरूद्ध आवाज उठाता है। उल्लेखनीय है कि देवधर भूतपूर्व जमींदार और राजनेता है जिसका दबदबा है, परन्तु वह जनमत को अपने पक्ष में जाग्रत कर लेता है। देवधर जैसे व्यक्ति को मात देना आसान काम नहीं है, परन्तु ऐसे कठिन काम करने में वह पूरी तरह जुट जाता है। जीतन और गपोले शुरू-शुरू में देवधर के पक्षधर है, परन्तु वे धीरे-धीरे लौका के पक्षधर बन जाते है। यह लौका के आदर्शों की शानदार जीत है।

देवधर को यह डर है कि लौका उसकी जगह लेना चाहता है यानी उसे अपदस्थ करके स्वयं राजनेता बनना चाहता है। इससे देवधर परेशान है। उसकी परेशानी यह है कि अब लोगों के अनुसार सोचना शुरू कर दिया है। अगर यह चलता रहा तो उच्च वर्ग के लोग कहीं के नहीं रहेंगे। लोगों पर लौका का प्रभाव है वे उसकी हर बात मानते हैं। देवधर यह भी स्वीकार करता है कि लौका चरित्रवान है और सबका विश्वासपात्र है देवधर उसके इस गुण से भी अभिभूत है कि वह सच बोलता है और उसकी सच्चाई की धाक पूरे इलाके में है।

प्रभावी व्यक्तित्त्व

देवधर उसके बारे में यह भी कहता है कि लौका के अनुसार हर सत्य नया होता है। वह जिया जाता है जो जिया न जा सके, उसे सत्य नहीं मानता।

इससे यह स्पष्ट होता है कि नाटककार ने लौका के ऐसे चरित्र की परिकल्पना की है। जिससे उसके विरोधी भी आंतकित हैं और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से उसके गुणों का बखान कर देते हैं इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वह भी क्या व्यक्ति है जिसका गुणगान उसका कट्टर विरोधी भी करता है। सच्चाई यह है कि आखिर वास्तविकता की उपेक्षा कब तक की जा सकती है या कैसे की जा सकती है।

आगे चलकर जीतन और गपोले नए अनुभव से गुजरते हैं तो उनकी मानसिकता में बदलाव आ जाता है। फिर तो यह सिलसिला चलता है कि देवधर जो कुछ कहता है, उसी को वे दोनों उलट देते हैं। तब एक स्थल पर देवधर आक्रोश में भरकर उनमें कहता है- "बदमाश! विश्वासघाती ! मुझे यह पता नहीं था कि तुम लोग मेरी ही आस्तीन के साँप बन जाओगे। पर मुझे तुम जैसे लोगों की चिंता है केवल उस लौका की, जिसके पास न धन है न कोई साधन है, लोग उसके प्रभाव में क्यों हैं ?

इससे लौका की वास्तविक स्थिति का पता चल जाता है कि वह कितनी ऊँचाइयों पर है । लौका एक ऐसा व्यक्ति है। जिसका कोई मित्र या शत्रु नहीं है अर्थात् वह गुट नहीं बनाता और सबके हित में काम करता है। इसमें कोई पक्षपात नहीं करता। वह सबका सहयोग लेता है, सबको सहयोग देता है। इस रूप में लोग उसके मित्र हो सकते हैं उसका शत्रु तो कोई नहीं। हाँ, देवधर उसे अपना शत्रु अवश्य मानता है और उसे नीचा दिखाने के लिए किसी अवसर की तलाश में रहता है। फिर भी, लौका में बदले की भावना नहीं है। हाँ, वह जनमत को जाग्रत अवश्य करता है जिससे सारा माहौल देवधर के विरुद्ध हो जाता है।

किसी पात्र के चरित्र को जानने के कई तरीके है वह क्या कहता है, और उसके बारे में दूसरे लोग क्या कहते हैं ? इसमें सबसे पहली बात तो इस प्रकार स्पष्ट हो जाती है कि उसकी कथनी और करनी में अन्तर है या नहीं। इसके साथ ही यह भी देखना आवश्यक है कि उसकी कथनी और करनी का सम्बन्ध उसके विचारों के साथ है या नहीं और अगर सम्बन्ध है तो वह कैसा है, कितना है। इन आधारों पर पात्र का चरित्र उभरता है और उसकी सही तस्वीर हमारे सामने आ जाती है।

कथनी करनी में समानता

इस सन्दर्भ में 'एक सत्य हरिश्चन्द्र' नाटक में लौका के चरित्र को देखें तो हमारे सामने कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं। लौका की कथनी और करनी के बीच कहीं कोई अन्तर नहीं है। नाटककार लाल ने सर्वत्र यही दिखाया है कि वह जो सोचता है, वही कहता है, वही करता है जैसे हम उसके इस विचार को लें धर्म और जाति के भेदभाव के बिना समतामूलक समाज की स्थापना ।

इस विचार को लौका अपने व्यक्ति रूप में प्रस्तुत करता है और हरिश्चन्द्र की भूमिका निभाते समय भी उसके यही विचार हैं। वास्तव में, वह इन दोनों रूपों में समान धर्मा है। हरिश्चन्द्र के रूप में विश्वामित्र के समक्ष उसके विचार इन शब्दों में व्यक्त हुए हैं। "यह डोम यह पतुरिया, ये लोग कहाँ के हैं ? कैसे आए? मेरी तरफ एक क्षण इनके जीवन में भी आया होगा, जहाँ इन्हें बिक जाना पड़ा होगा। जब तक खरीदनें वाला रहेगा, कभी न कभी सबको बिकना पड़ेगा, उसे भी जो खरीद रहा है। मैं ही डोम हूँ, मैं ही हरिश्चन्द्र हूँ, मैं ही शैव्या हूँ, मैं ही पतुरिया हूँ, पर मैं किसी की रक्षा नहीं कर सकता। शैव्या स्वयं रक्षा करे अपनी! पतुरिया स्वयं रक्षक है अपनी स्वयं अपनी रक्षा करे हरिश्चन्द्र ।"

यहाँ नाटककार ने दार्शनिक विचार बिन्दुओं को उभार कर सामने रख दिया है, जिन्हें हरिश्चन्द्र (लौका) के माध्यम से कहलाया है। इन विचारों के अनुसार राजा और रंक, डोम और सवर्ण, पतुरिया और सामान्य नारी के बीच कोई भेदभाव नहीं है, सब समान हैं। सभी परिस्थिति की उपज हैं। सब के मार्ग में बाधक बनती है- सामाजिक व्यवस्था । समाज व्यवस्था जाति, वर्ग और वर्ण के आधार पर विभाजित होकर संचालित है। इसके कारण कुछ भी घटित हो सकता है, ये ही है- हरिश्चन्द्र के माध्यम से लौका के विचारों की अभिव्यक्ति जिससे उनके समतामूलक समाज का विचार द ढ़ता पाता है।

नाटक के आरम्भ से लेकर अन्त तक उसने अपने निर्धारित विचार के अनुसार ही काम किए हैं। देवधर धन देकर लोगों को खरीदता और अपना पक्षधर बनाता है, लौका ऐसा कोई काम नहीं करता। वह किसी भी कीमत पर बिकने के लिए भी तैयार नहीं है। जातिय दंगे कराकर देवधर समाज को विभाजित करना चाहता है, परन्तु लौका ऐसा कुछ नहीं करता। वह देवधर द्वारा गाँवों में लगाई आग को बुझा देता है और पीड़ितों को किसी प्रकार शान्त करता है। वह बदले की भावना को अच्छा नहीं मानता और उसके अनुसार हिंसा-हिंसा का जवाब नहीं है। अतः प्रमाणित हो जाता है कि वह कथनी करनी और सोच में एक समान रहता है।

अटल सत्यपालक

वह सत्य को जीवन का मुख्य आधार मानकर चलता है उसने सत्य को अपने जीवन में, जीवन व्यवहार में अपनाया है, उतारा है। वह सच्चे अर्थों में सत्यपालक है न वह झूठ को ठीक मानता है, न उसने झूठ को पसन्द किया । वह सत्य के मार्ग पर चलकर ही कुछ पाना चाहता है और सत्य के मार्ग पर चलकर वह कुछ भी खो दे, इसकी चिन्ता बिल्कुल नहीं करता। उसने सत्यपथ पर चलने की कीमत चुकाई है फिर भी उसने सत्य को नहीं छोड़ा। उसने सत्य की परीक्षा हरिश्चन्द्र बन कर दी और उसमें वह खरा उतरा । नाटककार ने दिखाया है कि वह कितना विश्वासी प्राणी है वह अपने विश्वास के सहारे निरन्तर अपने सत्य के पथ पर चलता रहा। उसे सत्य पथ से डिगाने के प्रयास किए गए, परन्तु वह अडिग रहा। वह लौका के रूप में और हरिश्चन्द्र के रूप में अपने निर्धारित लक्ष्य से हिला नहीं । उसे भय दिखाया गया, प्रलोभन दिए गए। उसे कष्ट पहुँचाए गए। उसके समर्थकों में फूट डालने की कोशिश की गई फिर भी कुछ न हुआ। लौका ऐसी चट्टान है जिसे अपनी जगह से हिलाया नहीं जा सकता।

सहजता

लौका धन, शक्ति, मद, स्त्री आदि आर्कषणों से दूर है वह आज की दुनिया में किसी प्राचीन युग का महामानव है जो झुकता नहीं, उसका प्रतिद्वन्द्वी देवधर उससे मात खा जाता है । लौका उससे यह कहने की स्थिति में आ गया है- "हरिश्चन्द्र सदा अपने सत्य की परीक्षा देता रहे और तुम (इन्द्र - देवधर) परीक्षा लेते रहो। मैनें इस नाटक में राजा बनकर देख लिया, जब तक तुम हो, हम केवल बनाए ही जा सकते हैं, अपने आप कुछ नहीं हो सकते, पर अब बनने और होने का मर्म हमें मिल गया। चुप रह जाना हमारा विरोध था, पर तुम उस भाषा को नहीं समझ सके। सत्ता है तुम्हारे पास। हम सब तुम्हारे हाथों के कठपुतले थे। यह सारा नाटक तुम्हारा रचा हुआ था और तुम्हीं उसके सूत्रधार थे चलो, अब तुम्हें देनी होगी परीक्षा अपने सत्य की । " 

लौका आदर्श पात्र, परन्तु व्यवहारिक जीवन से उठा है। उसमें अनेक उदात्त गुण हैं। परन्तु वह यथार्थ जीवन से उभरा है। इस प्रकार नाटक को, समाज को गति देने वाला आदर्श पात्र है।

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