आधे-अधूरे नाटक में महेन्द्रनाथ का चरित्र-चित्रण

महेन्द्रनाथ का चरित्र-चित्रण: महेन्द्रनाथ आधे-अधूरे में 'पुरुष एक' नाम से ही आता है। उम्र पचास के आस-पास, चेहरे की विशिष्टता में एक व्यंग्य है। दोस्तो

आधे-अधूरे नाटक में महेन्द्रनाथ का चरित्र-चित्रण

महेन्द्रनाथ का चरित्र-चित्रण: महेन्द्रनाथ आधे-अधूरे में 'पुरुष एक' नाम से ही आता है। उम्र पचास के आस-पास, चेहरे की विशिष्टता में एक व्यंग्य है। दोस्तों का चहेता और हँसमुख महेन्द्रनाथ सावित्री से शादी के बाद कारोबार में लगातार असफल होकर आज पत्नी की कमाई की रोटियाँ तोड़ रहा है और गृह पति की मर्यादा से वंचित है। जीवन की लड़ाई में हार की छटपटाहट है, महेन्द्रनाथ तीन बच्चों का बाप है। पत्नी के परिचितों के आने पर घर से निकल जाता है। "सावित्री को महेन्द्रनाथ सदा से दब्बू, व्यक्तित्वहीन, पर-निर्भर लम्य है और आधा-अधूरा आदमी भी मन की कटुता और तिम्तता के व्यंग्यबाणों से पत्नी के अन्तरमन को भेदता रहता है। नाटक के प्रारम्भ में पुरुष का परिचय स्वागत भाषण के माध्यम से होता है। वह स्वयं कहता है, "यह नाटक भी अपने में मेरी तरह अनिश्चित है।" महेन्द्रनाथ नाटक का नायक है, साथ ही बेकार, निराश और असफल पति है। शादी के बाद ही उसकी पत्नी को वह एक पूरे आदमी का आधा चौथाई अर्थात् अधूरा, लिवलिवा और चिपचिपाता-सा आदमी लगने लगा ।

आधे-अधूरे नाटक में महेन्द्रनाथ का चरित्र-चित्रण

डॉ. पुष्पा बंसल का कहना है- "गृहपति होते हुए भी वह घर का स्वानी नहीं रह गया है, सबसे बड़ा होने पर भी ( वयोवृद्धत्व के नाते ) उसको सम्मान नहीं मिलता। मन में एकदम न चाहने पर भी घर के काम-काज में उसका प्रयोग एक स्टैम्प के समान किया जाता है।" नाटक के महेन्द्रनाथ के चरित्र की निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ उद्घाटित होती है।

कमजोर एवं पराश्रित व्यक्तित्व

महेन्द्रनाथ में न तो स्वतन्त्र चिन्तन की क्षमता है और न ही स्वतन्त्र रूप से कोई निर्णय लेने का सामर्थ्य है। न उसकी अपनी कोई विचारधारा है और न उसका अपना कोई व्यक्तित्व है। वह हमेशा प्रत्येक बात के लिए दूसरों पर आश्रित रहता है। वह हर बात के लिए दूसरों के मुँह की ओर ताकता रहता है। सावित्री स्पष्ट घोषणा करती है - "जब से मैंने उसे जाना है, मैंने हमेशा हर चीज के लिए किसी-न-किसी को सहारा ढूँढते पाया है।. .. यह कहना चाहिए या नहीं...जुनेजा से पूछ लूँ। यहाँ जाना चाहिए या नहीं जुनेजा से राय ले लूँ। कोई छोटी-सी-छोटी चीज खरीदनी है तो भी जुनेजा की पसन्द से कोई बड़े से बड़ा खतरा उठाना है तो जुनेजा की सलाह से यहाँ तक कि मुझसे ब्याह करने का फैसला भी किया, उसने जुनेजा की हामी भरने से।" स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने की क्षमता न होने के कारण तथा पर आश्रित होने के कारण महेन्द्रनाथ की बौद्धिक क्षमताएँ कुंठित हो गईं तथा व्यक्तित्व का पूर्णरूप से विकास नहीं हो पाया। अतः स्पष्ट है कि महेन्द्रनाथ पर - आश्रित व्यक्ति है ।

शंकालु प्रवृत्ति

महेन्द्रनाथ इस नाटक में शंकालु प्रवृत्ति का स्वामी नजर आता है। अपनी पत्नी सावित्री के कार्यकलाप पर शंकालु दृष्टि रखता है। सावित्री अपने बेटे अशोक की नौकरी लगवाने के लिये अपने कामुक पुरुष -मित्र सिंघानिया को घर बुलाती है तो महेन्द्र सावित्री के चरित्र को शंका की दृष्टि से देखता है - इसकी झलक निम्नलिखित उदाहरण में द्रष्टव्य है-

पुरुष एक: कौन आएगा ? सिंघानियाँ

स्त्री: उसे किसी के यहाँ खाना खाने जाना है इधर पाँच मिनट के लिए यहाँ भी आएगा। मुझे यह आदत अच्छी नहीं लगती तुम्हारी कितनी बार कह चुकी हूँ।

पुरुष एक: तुम्हीं ने कहा होगा उससे आने के लिए।

स्त्री: कहना फर्ज नहीं बनता मेरा आखिर मेरा बॉस है।

पुरुष एक: बॉस का मतलब यह थोड़े ही है कि ..?

स्त्री: लोगों को तो ईर्ष्या है मुझसे कि दो बार मेरे घर आ चुका है। आज तीसरी बार आएगा।

पुरुष एक: तो लोगों को भी पता है वह आता है?"

महेन्द्रनाथ अपनी इस शंकालु भावना का प्रदर्शन तब भी करता है जब उसकी बड़ी लड़की बिन्नी मनोज के घर से भाग कर चली आती है। वह अपनी शंका सावित्री पर प्रकट करता है और उससे कहता है कि वह बिन्नी से पूछे कि वह अपना घर छोड़कर क्यों चली आई है। वह बिन्नी के विषय में अपनी शंका इस प्रकार प्रकट करता है-

पुरुष एक: मुझे तो यह उस तरह आयी लगती है।

स्त्री: चाय ले लो।

पुरुष एक: इस बार कुछ सामान भी नहीं है साथ में ।

स्त्री: हो सकता है थोड़ी ही देर के लिए आई हो।

अतः स्पष्ट है कि महेन्द्रनाथ शंकालु स्वभाव का व्यक्ति है। इसका मुख्य कारण उसकी पत्नी का चरित्रहीन होना है।

ईष्यालु एवं कुढनशील

महेन्द्रनाथ को सावित्री के चरित्र पर सन्देह तो हमेशा ही रहता है उसके साथ ही सावित्री के पुरुष मित्रों से उसे ईर्ष्या भी होती है। जब-जब कोई व्यक्ति उसके घर आता है वह जल उठता है और वह ऐस लोगों की उपस्थिति में स्वयं घर से बाहर चला जाता है। बहाने बनाकर घर से चला जाना उसकी ईर्ष्या प्रवृत्ति का ही परिचायक है सिंघानियाँ के आने से पहले का यह वार्तालाप उसकी ईर्ष्या प्रवृत्ति का परिचय देता है।

पुरुष एक: उसमें क्या है? आदमी को काम नहीं हो सकता बाहर?

स्त्री: वह तुम्हें आज भी हो जाएगा तुम्हें ।

पुरुष एक: जाना तो है आज भी मुझे... पर तुम जरूरी समझो मेरा यहाँ रहना होतो... |

स्त्री: तुम्हें सचमुच कहीं जाना है क्या ? कहाँ आने की बात कर रहे थे तुम ?

पुरुष एक: सोच रहा या जुनेजा के यहाँ हो आता।"

श्री ओम शिवपुरी का कहना है - "यह सावित्री के पुरुष मित्रों को जानता है, और जब-तब उनका जिक्र करके अपने दिल की भड़ास निकालता रहता है। अपने कुचले आत्मसम्मान को बचाने की खातिर वह अकसर शुक- शनीचर घर छोड़कर चला जाता है। लेकिन कुछ घण्टे बाद वापिस लौट आता है-थका, हारा, पराजित...क्योंकि यहीं उसकी नियति है। वह फाइलों से जूझता है। सावित्री की बातें सुनना चाहता है। इसलिए फाइलों की उठा-पटक करता है क्योंकि उसे सिधानियों से ईर्ष्या भी है। वह इस बात से भी जलता है कि सावित्री जिन लोगों के सम्पर्क में आती है वे महेन्द्रनाथ की अपेक्षा प्रतिष्ठित, सम्मानित और ऊँचे पदों वाले लोग होते हैं। अपनी इस जलन का प्रदर्शन भी वह स्वयं कर देता है, "अधिकार, रुतबा, इज्जत - यह सब बाहर के लोगों से मिल सकता है इस घर को। इस घर का आज तक कुछ बना है, या आगे बन सकता है, तो सिर्फ बाहर के लोगों के भरोसे। मेरे भरोसे तो सब कुछ बिगड़ता आया है और आगे बिगड़ ही बिगड़ सकता है।

नाटक में महेन्द्रनाथ प्रत्येक क्षण एक कुढ़ा हुआ व्यक्ति दिखाई देता है वह स्वयं को सबसे छोटा अपाहिज व्यक्ति अनुभव करता है इसीलिए प्रत्येक बात पर कुढ़ता रहता है। स्वयं उसके घर के सदस्य ही उसकी उपेक्षा करते हैं और बात-बात पर अपमानित करते रहते हैं। अपनी पत्नी की घोर उपेक्षा और प्रताड़ना के कारण ही वह ओछा बन जाता है और न कहने योग्य बात भी अपने बच्चों के सामने ही कह देता है। पत्नी की उपेक्षा से वह तिलमिला जाता है किन्तु प्रतिरोध करने की शक्ति न होने के कारण केवल कुढ़ता ही रह जाता है यथा-

पुरुष एक: यह सब कहता है वह ? और क्या-क्या कहता है ?

स्त्री: वह इस वक्त तुमसे बात नही कर रह रही ।

पुरुष एक: पर बात तो मेरे ही घर की हो रही है।

स्त्री: तुम्हारा घर! हाँ!: 

पुरुष एक: तो मेरा घर नहीं है यह? कह दो नहीं है।

स्त्री: सचमुच तुम अपना घर समझते इसे तो... |

पुरुष एक: कह दो, जो कहना चाहती हो।

स्त्री: दस साल पहले कहना चाहिए था मुझे...जो कहना चाहती हूँ ।

पुरुष एक: कह दो अब भी... इससे पहले कि दस साल, ग्यारह साल ।"

नाटक में और कई स्थल हैं जहाँ पर ईर्ष्याभाव एवं कुढ़नशीलता महेन्द्रनाथ की चारित्रिक विशेषता बनकर उभरती है।

प्रभावहीन व्यक्तित्व एवं आरामतलब : 

महेन्द्रनाथ का व्यक्तित्व अपनी पराश्रिता, दब्बूपन एवं आरामतलब जिन्दगी के कारण प्रभावहीन हो गया है। वह गृहस्वामी होकर भी गृहपति की मर्यादा से वंचित है। उसे न घर में सम्मान प्राप्त है न बाहर। उसकी पत्नी उसे पति मानने से इन्कार करती है- " मत कहिए मुझे महेन्द्रनाथ की पत्नी।" बड़ी लड़की घर से भाग जाती है। लड़का अशोक निकम्मा हो जाता है तथा छोटी लड़की उद्दण्ड हो जाती है। महेन्द्रनाथ अपने को 'रबड़ स्टैम्प और रबड़ का टुकड़ा मानता है। उसका जीवन अस्तित्वहीन और अर्थहीन हो गया है, ऐसा उसे हरदम लगता है। वह अपना आत्म - विश्लेषण और आत्म-परीक्षण करते हुए कहता है - " अपनी जिन्दगी चौपट करने का जिम्मेदार मैं हूँ.. . इन सबकी जिन्दगियाँ चौपट करने का जिम्मेदार मैं हूँ... क्योंकि अन्दर से मैं आरामतलब हूँ।" अपना आत्मपरीक्षण करते हुए आगे कहता है, "मुझे पता है मैं एक कीड़ा हूँ, जिसने अन्दर-ही-अन्दर इस घर को खा लिया है। महेन्द्रनाथ सारा दिन घर में बेकार -- बेगार रहकर चाय पीता रहता है, अखबार पढ़ता रहता है और घर के सारे सामान को अव्यस्थित करके रख छोड़ता है जिससे सावित्री आकर बड़बड़ाती है। बाल बच्चों के प्रति कर्त्तव्य को वह निभाता नहीं है बल्कि उन्हीं के समक्ष सावित्री को पीटता है, उसके बाल नोचता है, जिससे बालक उसका सम्मान नहीं करते। महेन्द्रनाथ स्पष्ट कहता है - "मेरी क्या यही हैसियत है इस घर में जो जब जिस वजह से जो भी कह दे, चुपचाप सुन लिया करूँ? हर वक्त की धुतकार, हर वक्त की कोंच, बस यही कमाई है यहाँ मेरी इतने सालों से।"

अतः स्पष्ट है कि महेन्द्रनाथ अपने परिवार में उपेक्षित और तिरस्कृतपूर्ण जीवनयापन कर रहा है। न ही उसको अपने घर में सम्मान प्राप्त है और न बाहर। आरामतलबी एवं आलसी प्रवृत्ति ने उसके हृदय में हीन भावना उत्पन्न कर दी है। इसीलिए बेकारी की हालत के कारण बच्चे एवं पत्नी उससे दूर होते जा रहे हैं। बच्चों एवं पत्नी के प्रति कर्त्तव्य को भी वह भली-भाँति नहीं निभाता तथा अपनी ऐय्यासी के कारण पूरे परिवार को आर्थिक अभाव की दलदल में धकेल दिया है। महेन्द्रनाथ की बेकारी - बेगारी एवं आरामतबली - अकर्मकता के कारण सावित्री की इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती जिसके कारण वह पर-पुरुषों से सम्पर्क जोड़ती है। जिससे उसका परिवार विघटन के कगार पर पहुँच जाता है।

अतः कहा जा सकता है कि महेन्द्रनाथ के रूप में मोहन राकेश जी ने एक ऐसे मध्यवर्गीय निम्न आय वाले परिवार के मुखिया का चित्रण किया है जो अपने पराश्रित, आलसीपन और दब्बूपन के कारण एक-दूसरा हुआ आधा-अधूरा व्यक्ति है। वह नाटक का नायक है परन्तु सबसे दुर्बल और दयनीय पात्र भी है। वह गृहस्वामी होकर गृहपति की मर्यादा से वंचित है। पूरे परिवार की भर्त्सना सहता है। अपमानित होकर घर छोड़ता है परन्तु अपनी चारित्रिक दुर्बलताओं के कारण उसी घर में लौटकर अपमानित और निरर्थक जिन्दगी जीने के लिए मजबूर है।

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