सुख कहानी का सारांश - Sukh Kahani ka Saransh

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सुख कहानी का सारांश - Sukh Kahani ka Saransh

सुख कहानी का सारांश - भोला बाबू ने आवकाश ग्रहण किया। श्याम को उन्होंने अस्त होते हुए सूरज को देखा। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि दुनिया में अच्छी-अच्छी सुंदर चीजें भी है। सबसे पहले उन्होंने अपने खुशी बात अपनी पत्नी से कही। लेकिन उसने उत्तर दिया—ऐसा सूरज तो वह जिंदगी भर देख रही है। भोला बाबू को झुंजलाहट हुई। उसने खेलते हुए नीलू को पुकारा। उसे अपना अनुभव बताया कि वह सबको बुलाकर ले आए। प्रत्यक्ष कोई बच्चा खेल छोड़कर उनके पास नहीं आया । फिर उन्होंने ऊँट पर सवार होने वाले से कहा कि वह ताडो के बीच से देख ले... आसमान में क्या दिखाई देता है ? ऊँट वाला आकाश की तरफ देखता हुआ चला गया। भोलाबाबू का संयम टूटने लगा फिर उन्होंने सोचा कि अनपढ़ लोगों तक उनके बात पहुँचते नहीं। अतः माधव के पास चले गए। वह मुख्तार था। वहा उनकी मुलाखात जिलेदार साहब से हो जाती है। भोलाबाबू सूर्यास्त का जिक्र तुरंत नहीं करना चाहते। इसी लिए वे उनसे मछली पकड़ने की बात करते हैं। जिलेदार साहब सूर्यास्त का संबंध मौसम के साथ जोड़ देते हैं। उन्हें एहसास हुआ कि जिलेदार साहब पढ़े-लिखे हैं। लेकिन पढ़ाई और समझ दो अलग-अलग चीज़े हैं। अब वे सोहन से पूछते है कि क्या उसने कभी ढलते हुए सूरज को देखा है ? सोहन इतना भोला-भाला और अनपढ़ है कि उसे लगता है कि वे गांव के सूरजा की बात कर रहे हैं। भोला बाबू का धैर्य समाप्त होता है। अवकाश ग्रहण करने के बाद उन्होनें पहली बार ढलते हुए सूरज को देखा। पहाड़ों पर, पेड़ों पर छाई हुए लालिमा, गोल होते हुए सूरज का बिंब और पीछे छोड़ दी गई मुलायम लाल किरण... भोला बाबू प्रकृति के सौंदर्य और जीवन की सच्चाई पहली बार देख रहे थे। वे उसकी अभिव्यक्ति कर रहे थे। लेकिन घरवाले और गांववाले उन तक पहुँच नहीं सके। भोला बाबू की दृष्टि उन सबके पास नहीं थी। भोला बाबू को रोना आ गया तब उनकी पत्नी भी रोने लगी उसे देखकर बच्चे भी रोने लगे। भोलाबाबू दुख वे नहीं समझ सके। लेकिन रोने में मात्र शामिल हो गए। चलो, भोलाबाबू की दृष्टि से एक 'सुख' की बूँद भी पर्याप्त थी।

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