रोज़ कहानी के पात्रों का चरित्र चित्रण - Roj Kahani ke Patro ka Charitra Chitran

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रोज़ कहानी के पात्रों का  चरित्र चित्रण

अज्ञेय आधुनिकता बोध संपन्न मनोवैज्ञानिक कथाओं के सफल लेखक हैं। वह घटनाओं के कोरे वर्णन के बजाए मानव के अंतर्मन की परतों को उघाड़ने में अधिक रूचि लेते हैं। 'रोज़' सामाजिक आधार पर रची कहानी है। मध्यवर्ग के पारिवारिक एकरसता को जितनी मार्मिकता से यह कहानी व्यक्त कर सकी है वह उस युग की कहानियों 'विरल' है। कहानी का पूरा परिवेश और उस परिवेश और 'बोरडम की बड़ी जटिल सूक्ष्मता से व्यक्त करते हैं। एकांत पहाड़ी वातावरण, सूना बँगला, नल के पानी की निरंतर टिप - टिप, बीमार बच्चे की रिरियाहट, और इस 'युवती माँ' का गजर के हर चोट के साथ थकी आवाज़ 'तीन बज गए या इस असह्य एकरसता को स्वीकार कर लेने की विवशताः "रोज ऐसा ही होता है।" कहानी की पात्र मालती जिस घर में रहती है वह किसी शाप की छाया' से ग्रस्त है। 

उनकी कहानियां प्रायः चरित्र प्रधान होती है। 'रोज़' भी एक चरित्र प्रधान कहानी है, जिसमें एक विवाहिता युवती मालती के यांत्रिक जीवन को आधार बनाया है। कहानी के पात्र डॉ० महेश्वर, उनकी पत्नी मालती, बेटा टीटी है। मुख्य पात्र मालती ही है। कहानी में आये पात्रों का चित्रण इस प्रकार है :-

रोज कहानी में मालती का चरित्र चित्रण

मालती का चरित्र चित्रण :- इस कहानी में लेखक ने मालती के यांत्रिक जीवन को आधार बनाया है। कहानी के प्रारंभ में ही मालती के यन्त्रवत् जीवन की झलक मिल जाती है। जब वह घर में आए अतिथि का स्वागत केवल औपचारिक ढंग से करती है। अतिथि उसके रिश्ते का भाई है, जिसके साथ वह बचपन में खूब खेलती थी। पर वर्षों बाद आए भाई का स्वागत मालती उत्साहपूर्वक नहीं कर पाती, बल्कि जीवन की अन्य औपचारिकताओं की तरह एक और औपचारिकता निभा देती है। विवाह से पूर्व उत्सुकता, उत्साह, जिज्ञासा या किसी बात के लिए उत्कंठा थी भी तो वह दो वर्षों के वैवाहिक जीवन के बाद शेष नहीं रही, जिसे उसका रिश्ते का भाई भाँप लेता है। अतः मालती का मौन उसके अहं या अवहेलना का सूचक न होकर वैवाहिक जीवन की उत्साहीनता, नीरसता और यान्त्रिकता का ही सूचक है ।

मालती यंत्रवत पूरा दिन काम करती रहती और पति के घर आने के उपरान्त ही कुछ खाती है, कहानीकार ने इस पर टिप्पणी जड़ी है – “पति ढाई बजे खाना खाने आते हैं, इसलिए पत्नी तीन बजे तक भूखी बैठी रहेगी ।"

महेश्वर हर रोज़ डिस्पेंसरी से घर लौटने के बाद मालती को अस्पताल की स्थिति सुनाता है। हर दूसरे चौथे दिन वहां गैंग्रीन का रोगी आ जाता है, जिसकी टांग काटने की नौबत भी आ जाती है। मालती पति पर व्यंग्य करती है “सरकारी हस्पताल है न, क्या परवाह है। मैं तो रोज़ ही ऐसी बातें सुनती हूँ । अब कोई मर मुर जाए तो ख्याल ही नहीं होता।” मालती अपने जीवन की नीरसता को प्रायः चुपचाप सहती रहती है और पति से उसकी बातचीत भी कम होती है, पर सरकारी अस्पताल की दुर्दशा और रोगियों के मरने के प्रसंग को लेकर पति पर किए गए उसके व्यंग्य से उसकी संवेदनशीलता एवं जिजीविषा का पता चलता है। 

कहानीकार की दृष्टि का केन्द्र मालती और उसके जीवन की जड़ता ही है। उसका पति और अतिथि पलंग पर बैठकर गपशप करते रहे और मालती घर के अंदर बर्तन मांजती रही, क्योंकि नल में पानी आ गया था। उसकी नियति घर के भीतर खटना ही थी, बाहर की खुली हवा का आनन्द लेना नहीं । लेखक एक मामूली प्रसंग की उद्भावना से मालती की आन्तरिक इच्छा को चित्रित करता है। बर्तन धोने के बाद मालती को पति का आदेश मिला 'थोड़े आम लाया हूँ, वे भी धो लेना।” आम अखबार के कागज़ में लिपटे थे। मालती आमों को अलग कर के अखबार के टुकड़े को खड़े-खड़े पढ़ने लगी। अखबार के टुकड़े को पढ़ने में उसकी तल्लीनता इस तथ्य की सूचक है कि वह बाहर की दुनिया के समाचार जानना चाहती है, पर वह अपनी सीमित दुनिया में बंद है।

उसके जीवन का एक और अभाव उजागर होता है और वह है अखबार का अभाव। अखबार मालती को बाहर की दुनिया से जोड़ने का काम कर सकता है, परन्तु वह उससे भी वंचित है। कथावाचक याद करता है कि मालती बचपन में पढ़ने से बहुत कटती थी। “एक दिन उसके पिता ने उसे एक पुस्तक लाकर दी, और कहा कि इसके बीस पेज रोज पढ़ा करो। हफ्ते भर बाद मैं देखूँ कि उसे समाप्त कर चुकी हो। नहीं तो मार-मार कर चमड़ी उधेड़ दूंगा। मालती ने चुपचाप किताब ली, पर क्या उसने पढ़ी ? वह नित्य ही उसके दस-बीस पेज़ फाड़कर फेंक देती जब आठवें दिन उसके पिता ने पूछा, 'किताब समाप्त कर ली ?' तो उत्तर दिया, 'हाँ कर ली।' पिता ने कहा लाओ, 'मैं प्रश्न पूछूंगा।' तो चुप खड़ी रही। पिता ने फिर कहा तो उद्धृत स्वर में बोली, 'किताब मैंने फाड़कर फेंक दी है मैं नही पढूंगी।" वही उद्धत मालती आज कितनी दीन और शांत हो गई है और एक अखबार के टुकड़े को तरसती है। 

मालती 'बिल्कुल, अनैच्छिक, अनुभूतिहीन, नीरस, यंत्रवत वह भी थके हुए यंत्र के समान जीवन जीती है। घड़ी की टिकटिक और पानी के नल की टिपटिप पर उसके दिल की धड़कन चलती है। उसके जीवन की गाड़ी भी मंद गति से चलती है। 'रोज़' कहानी मालती के समझौते और सहनशीलता की कहानी है। वह सब कुछ सहकर गृहस्थी की गाड़ी धकेलती रहती है।

अज्ञेय की कहानियों के कथोपकथन आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य के आदर्श कथोपकथन है। मनः स्थिति का उद्घाटन, लाघव, भाषा की परिनिष्ठता, दार्शनिकता, परिष्कृति एवं नाटकीयता अज्ञेय के कथोपकथनों की प्रमुख विशिष्टता है। अज्ञेय की रोज़' कहानी का देशकाल पहाड़ी गांव का जीवन है।

अज्ञेय ने अपनी कहानियों की मांग के अनुसार शब्दों का प्रयोग किया है। जिस कहानी का परिवेश जैसे है, उनके संवादों में उसी क्षेत्र की भाषा के शब्दों का प्रयोग होता है। इस कहानी में जनपदीय शब्दों का प्रयोग हुआ है, जैसे – खटखटाए, उकताए, खनखनाहट। अंग्रेजी शब्दावली का प्रयोग भी इस कहानी में हुआ है - डिस्पेंसरी, नोटबुक, स्पीडोमीटर।

अतः इस कहानी का शिल्प व चरित्र उत्कृष्ट है। यह अज्ञेय की सर्वश्रेष्ठ कहानी है । इसमें संबंधों की वास्तविकता को एकांत वैयक्तिकता से अलग ले जाकर सामाजिक संदर्भ में देखा ।

रोज कहानी में डॉ० महेश्वर का चरित्र चित्रण

क) डॉ० महेश्वर का चरित्र चित्रण - महेश्वर डाक्टर है। एक पहाड़ी गांव में सरकारी डिस्पेंसरी में नियुक्त है। वह जिस घर में रहते हैं सरकारी डिस्पेंसरी का कवार्टर है। महेश्वर "प्रातः काल सात बजे डिस्पेंसरी चले जाते हैं और डेढ़ दो बजे लौटते हैं। उसके बाद दोपहर भर छुट्टी रहती है। केवल शाम को एक दो घण्टे चक्कर लगाने के लिए चले जाते हैं, डिस्पेंसरी के साथ छोटे से अस्पताल में पड़े हुए रोगियों को देखने और अन्य जरूरी हिदायतें करने—उनका जीवन बिल्कुल एक निर्दिष्ट ढर्रे पर चलता है।" यह जीवन ढर्रा सकारात्मक उत्साही जीवन पद्धति का सूचक नहीं है, बल्कि एकरस, ऊबाऊ, यांत्रिक दिनचर्या का पर्याय है। नित्य वहीं काम, उसी प्रकार के मरीज, वही हिदायत, वहीं नुस्खे, वही दवाईयाँ। 

यही वजह है कि 'वे अपनी फुरसत के समय में भी सुस्त रहते हैं।" घर आकर वह मालती का हाथ नहीं बंटाते। कभी कभार बच्चे को संभालते, नहीं तो मालती को स्वयं संभालना पड़ता। महेश्वर पलंग पर बैठे चांदनी का आनन्द लेता है और मालती रसोई को सम्भालते हुए, बच्चे की चिंता करती है।

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