सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली मुहावरा का अर्थ और वाक्य प्रयोग

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सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली मुहावरा का अर्थ और वाक्य प्रयोग

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली मुहावरा का अर्थ– आजीवन पाप करके अंत में धर्मात्मा या साधु बनने का ढोंग करना; जीवन-भर बुरा काम कर अंत में अच्छा बनने का ढोंग करना। 

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली मुहावरा का वाक्य प्रयोग

वाक्य प्रयोग– जिंदगी-भर चोरबाजारी करके वह बढ़ापे में चंदन लगाकर धर्मात्मा बनने चला है-नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। 

वाक्य प्रयोग– जीवन-भर दलाली और बेईमानी करनेवाला मोहनदास बुढ़ापे में बदल गया है, चंदन-रोली लगाकर रोज मंदिर जाता है। ऐसे ही लोगों के लिए कहावत है 'सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को'। 

वाक्य प्रयोग– जिंदगी भर मुकेश ने गुंडागर्दी की, अब बुढ़ापे में वह महात्मा बना फिर रहा है। ये तो नौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली वाली बात है।

वाक्य प्रयोग– रमेश  ने खुद  और आज समाज के लोगों का उद्धार कर रहा है इसे कहते हैं नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।

वाक्य प्रयोग– बलात्कार के जुर्म में वह विवादों में फंसा हुआ था और इन दिनों बालिकाओं की शिक्षा के लिए प्रयासरत है, इसे कहते हैं नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।

वाक्य प्रयोग– गिरधारीलाल ने जवानी में खूब गुटखा और पान चबाया चबाया और अब दुसरे लोगों गुटखा चबाने से मना करते हैं तो लोग उन्हें ताना मारते हैं सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। 

यहां हमने “सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली” जैसे प्रसिद्ध मुहावरे का अर्थ और उसका वाक्य प्रयोग समझाया है। सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली मुहावरे का अर्थ होता है- "आजीवन पाप करके अंत में धर्मात्मा या साधु बनने का ढोंग करना; जीवन-भर बुरा काम कर अंत में अच्छा बनने का ढोंग करना।" जब कोई व्यक्ति जिंदगी भर गलत काम करके अच्छा बनने का ढोंग करता है तो इस कहावत का प्रयोग करते हैं। 

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