Tuesday, 5 July 2022

लड़का लड़की में भेदभाव पर दो मित्रों के बीच संवाद लेखन - Ladka aur Ladki me Bhedbhav Par Samvad lekhan

लड़का लड़की में भेदभाव पर संवाद लेखन : In This article, We are providing लड़का लड़की में भेदभाव पर दो मित्रों के बीच संवाद लेखन and Ladka aur Ladki me Bhedbhav Par Samvad lekhan for Students and teachers.

    लड़का लड़की में भेदभाव पर दो मित्रों के बीच संवाद लेखन 

    पूजा : क्या हुआ मेनका, इतनी चुपचाप क्यों हो ?

    मेनका : कुछ नहीं, बस मन थोड़ा उदास है। 

    पूजा : कुछ नहीं, बस मन थोड़ा उदास है। 

    मेनका : क्यों ? क्या बात हो गयी, घर में झगड़ा हो गया क्या ?

    पूजा : नहीं, हुआ तो नहीं पर हो सकता है। माँ हर समय लड़का न होने का ताना सुनने से दुखी रहती हैं। दादी हैं कि ताना देने से बाज ही नहीं आती। 

    मेनका : देखो जहाँ तक मैं समझती हूँ, लड़का-लड़की दोनों को ईश्वर ने बनाया है। एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है। 

    पूजा : तुम्हारी बात से तो मैं भी सहमत हूँ। लेकिन कुछ हद तक हमारा समाज आज भी पुरुष प्रधान है। पुरुष को कमाऊ, परिवार का मुखिया और वंश चलाने वाला माना जाता है। 

    मेनका : वास्तविकता तो यह है की लड़की के अभाव में वंश परम्परा चलना संभव ही नहीं है। 

    पूजा : यह तुम बिलकुल सही कह रही हो। यह सब जानते हुए भी आज लड़कियों को दहेज़ प्रथा के कारण पराया धन और बोझ समझा जाता है। 

    मेनका : आज जबकि लड़कियां हर क्षेत्र में आगे निकल चुकीं हैं फिर यह असमानता क्यों ?

    पूजा : इस धारणा को आज के युवा वर्ग ने बदल दिया है। अब लड़का-लड़की एक सामान समझे जाने लगे हैं। मगर फिर भी पुराने ज़माने के बुजुर्ग लोग बदलने को तैयार नहीं है। 


    लड़का लड़की में भेदभाव पर दो दोस्तों के बीच संवाद लेखन 

    गरिमा : प्रदीप, तुमने देखा है, सब जगह लड़का-लड़की में भेद किया जाता है। आज समाज तो आधुनिक हो गया है पर उसकी सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया है।

    प्रदीप : हाँ, यह तो हर रोज की बात है।

    गरिमा : माँ, मुझसे ज्यादा प्रकाश का ध्यान रखती है। हर चीज़ पहले उसी को पसंद करने के लिए दी जाती है। मुझसे तो पसंद-नापसंद पूछने का सवाल ही नहीं।

    प्रदीप : हाँ-हाँ, मेरे घर में भी ऐसा ही होता है। माँ मेरी बहिन मानसी की बजाय सबसे पहले मुझे ही देती है।

    गरिमा : हाँ, एक दिन तो हद ही हो गई। उस दिन प्रकाश रात के बारह बजे घर आया पर माँ ने उसे ज़रा भी नहीं डाँटा। मैंने कहा तो कहने लगी कि वो तो लड़का है।

    प्रदीप : हाँ, तुम ठीक कह रही हो। उस दिन मानसी घर में आठ बजे पहुँची तो माँ ने कई दिन तक उसका घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया। भला ये भी कोई बात हुई। लड़के-लड़की के बीच इतना भेदभाव क्यों ?

    गरिमा : परंतु हमारे समाज में तो ऐसा नहीं होना चाहिए। वैसे तो आधुनिकता की होड़ में पुरुष-स्त्री को समान महत्त्व देने की बात कही जाती है। पर अभी भी इस तरह भेदभाव किया जाता है।

    प्रदीप : आज युवाओं को मिलकर लोगों की इस सोच को बदलने का प्रयास करना होगा और इसके लिए हमें अपने घर से ही पहल करनी होगी।

    गरिमा : हाँ-हाँ, तुम बिलकुल ठीक कर रहे हो, हम सबको मिलकर पहले अपने परिवारजनों की सोच को बदलना होगा तभी हम समाज की सोच को बदल सकेंगे। अन्यथा लड़का-लड़की में भेद हमेशा होता रहेगा।


    Ladka aur Ladki me Bhedbhav Par Samvad lekhan

    माला : सुना है सुमन को फिर लड़की हुई है।

    विमला : हां मैंने भी सुना है।

    माला : लगता है बेचारी सुमन उसको लड़कों का सुख प्राप्त नहीं होगा।

    विमला : यह तुमने क्या बात कही बहन, आजकल लड़कियां लड़कों से कम है क्या?

    माला : बात तो तुम्हारी भी सही है।

    विमला : यदि आज भी लड़कियों को लड़कों के बराबर शिक्षा दियी जाए तो लड़कियां लड़कों से कम नहीं हो सकती।

    माला : तुम सही कहती हो आजकल लड़कियों में लड़कों से ज्यादा जोश देखने को मिलता है खेल, पढ़ाई, पॉलिटिक्स हर चीज में तो आगे हैं।

    विमला : तुम सही कहती हो, अच्छा मुझे देर हो रही है मैं चलती हूं।


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