Friday, 25 March 2022

सांस्कृतिक विविधता पर निबंध - Sanskritik Vividhata Essay in Hindi

सांस्कृतिक विविधता पर निबंध - Sanskritik Vividhata Essay in Hindi

    सांस्कृतिक विविधता पर निबंध - 1

    भारत विभिन्नताओं का देश है। प्रजाति, जाति, जनजाति, धर्म, भाषा, जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियां, खान-पान, रहन-सहन और वेश-भूषा की दृष्टि से यहां कई विभिन्नताएं दिखायी देती हैं। ये सब विशेषताएं या भिन्नताएं भारतीय समाज के मौलिक आधारों और उनमें होने वाले परिवर्तनों को समझने में सहायक हैं तथा ये भारतीय समाज में अनेकता भी पैदा करती हैं।

    सांस्कृतिक विविधता पर निबंध - Sanskritik Vividhata Essay in Hindi

    भारत एक ऐसा देश है, जिसमें विविधता के अनेक आयाम दृष्टिगोचर होते हैं, यहां अनेक संस्कृतियों का सहअस्तित्व पाया जाता है। भारत में समय-समय पर अनेक बाहा आक्रमणकारी लोग आते रहे और उन्होंने यहां शासन किया। यहां से धन सम्पत्ति लूट कर ले जाने के बजाय अधिकांश लोग यहीं बस गये। इस प्रकार भारत अनेक संस्कृतियों का संगम-स्थल एवं द्रवण-पात्र बन गया। सांस्कृतिक बहुलता भारत की नियति बन गई। यही कारण है कि भारत में विभिन्न धर्मों, भाषाओं, प्रथाओं, रीति-रिवाजों, खान-पान, वेश-भूषा, विचारों, विश्वासों, संस्कारों आदि के रूप में बहुलता पायी जाती है। 

    विभिन्न संस्कृतियों का भारत में सह-अस्तित्व ही सांस्कृतिक बहुलतावाद के नाम से जाना जाता है। यहां सांस्कृतिक बहुलतावाद को अनेक रूपों में देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक तरफ बहुत धनी, उच्च जाति और उच्च वर्ग के लोग हैं, तो दूसरी ओर अत्यधिक निर्धन, निम्न जाति के लोग हैं। विभिन्न जातियों, धर्मों, क्षेत्रों और भाषाओं से सम्बद्ध समूह सारे देश में फैले हुए हैं। धर्म, भाषा, क्षेत्र, प्रथा और परम्परा के आधार पर यहां अल्पसंख्यक समूह बने हुए हैं। बहुसंख्यक समूह भी अनेक सम्प्रदायों, जातियों, गोत्रों और भाषायी समूहों में विभक्त हैं। 

    अपने सदस्यों के लिए अच्छी शिक्षा, रोजगार और जीवन-स्तर प्राप्त करने की इन समूहों में आकांक्षाएं हैं। सभी लोगों को समान अवसर प्राप्त नहीं हैं, इसलिए वे 'वितरक-न्याय' से वंचित हैं। इस प्रकार की असमानता स्वयं भारतीय समाज की देन है, जिसके कारण समय-समय पर तनाव एवं संघर्ष पैदा होते रहते हैं, परस्पर अविश्वास एवं मानसिक कुंठाएं भी बढ़ती हैं। इन कारणों से भारत की आन्तरिक एकता, सम्बद्ध चेतना और भारतीयता की भावना को गहरा आघात लगा है। यह स्थिति भारतीय सामाजिक संरचना के स्वरूप और वास्तविकता के बीच भेद के कारण उत्पन्न हुई है। 

    सांस्कृतिक विविधता पर निबंध - 2

    संसार में कुछ ही संस्कृतियों में ऐसी विविधता है जैसी भारतीय संस्कृति में है। हमारे देश में बहुत सी भाषायें और बोलियाँ बोली जाती हैं जिन्होंने साहित्य को एक महान विविधता प्रदान की है। दुनिया के सभी महान धर्मों के लोग यहाँ पर भाईचारे के साथ निवास करते हैं। क्या आप जानते हैं कि भारत संसार के बहुत से धर्मों का निवास स्थान हैं जैसे जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सिक्ख धर्म और हिन्दू धर्म। यहाँ पर अनेक तरह की वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला का निर्माण हुआ है। विभिन्न प्रकार के लोक तथा शास्त्रीय संगीत और नृत्य हमारे देश में विद्यमान हैं। इसी तरह अनेक त्योहार और प्रथायें भी हैं। यही विविधता देश की संस्कृति को एक तरफ साझी या मिश्रित बनाती है तो दूसरी ओर इसे समृद्ध और सुंदर भी बनाती है। हमारी संस्कृति में इतनी विविधता क्यों है? इसके अनेक कारण हैं। देश की विशालता तथा भौगोलिक और जलवायु संबंधी विशेषताओं की भिन्नता इस विविधता का एक प्रमुख कारण है।

    शायद आप हैरान होते होंगे कि क्यों पकाने के लिये केरल के लोग नारियल तेल इस्तेमाल करते हैं और उत्तर प्रदेश के लोग सरसों का तेल इस्तेमाल करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि केरल एक समुद्रतटीय प्रदेश है और नारियल वहाँ बहुतायत में पाया जाता है जबकि उत्तर प्रदेश एक मैदानी इलाका है जो कि सरसों के उत्पादन के लिये अनुकूल है। पंजाब के भाँगड़ा नृत्य या आसाम के बिहू नृत्य में क्या समानता है? दोनों ही फसल की अच्छी उपज के बाद मनाये जाते हैं। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि हम अलग-अलग भाषायें बोलते हैं जैसे बंगाली, तमिल, गुजराती या उड़िया? भारत विभिन्न प्रकार के नृत्य और संगीत का भण्डार है जिसे हम सामान्यतः उत्सव के लिये और सामाजिक उत्सवों जैसे शादी या बच्चे के जन्म के समय प्रयोग में लाते हैं।

    विभिन्न नृजातीय समूहों का परस्पर मिल जाना हमारी सांस्कृतिक विविधता का दूसरा महत्त्वपूर्ण घटक है। अनंत काल से यहाँ-वहाँ से लोग यहाँ आते रहे हैं और बसते रहे हैं। हम यहाँ पर प्रोटो आस्ट्रेलायड, नीग्रो और मंगोलायड जैसी आदिम प्रजातियों से संबंधित लोगों को पाते हैं। विभिन्न नृजाति समूह जैसे ईरानी, ग्रीक, कुषाण, शक, हूण, अरबी, तुर्की, मुगल और यूरोपियन भी यहाँ आये। वे यहीं बस गये और यहाँ के स्थानीय निवासियों के साथ घुल-मिल गये। अन्य संस्कृति के लोग अपने सांस्कृतिक गुणों, चिंतन और विचारों के साथ आये थे जो यहाँ की संस्कृति के साथ समायोजित हो गये। आप यह जानकर हैरान होंगे कि सिलाई की हुई पोशाकें जैसे कि सलवार, कुर्ता, टोपी आदि केवल ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के कुषाणों शकों तथा पार्थियानों द्वारा भारत में लाई गयी थी। इससे पहले भारतीय बिना सिलाई किये हुये कपड़े पहनते थे। आधुनिक पोशाक जैसे- पैंट, शर्ट और स्कर्ट यूरोपीय लोगों के द्वारा अट्ठारहवीं सदी में लायी गयी थीं। 

    भारत ने सदियों से हमेशा अन्य विचारों को अपनाने की अपनी असाधारण क्षमता को दिखाया है। इसने हमारी संस्कृति को समृद्ध और विविध बनाया है। बाहरी संस्कृतियों से संपर्क के साथ-साथ भारत के भीतरी विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृतियों के बीच भी आदान-प्रदान होता रहा है। लखनऊ में चिकन का काम, पंजाब की फुलकारी, बंगाल की कांथा कढ़ाई, उड़ीसा का पटोला जैसी विविधतायें एक खास क्षेत्रीय विशेषता का अहसास कराती हैं। भारत के पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण केन्द्र अपनी-अपनी विशेषताओं के बावजूद पूर्णतः अलगाव में विकसित नहीं हुए हैं। क्षेत्रीय भौगोलिक अवरोधों के बावजूद यहाँ के लोग व्यापार व तीर्थ यात्रा के लिये भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक आते जाते रहे हैं। कुछ इलाके शासकों की विजयों और संधियों के कारण एक दूसरे से जुड़ गये। लोगों ने एक स्थान से दूसरे स्थानों तक सांस्कृतिक आचार-व्यवहार एवं विचारों को संचारित किया। सैनिक अभियानों के कारण भी यहाँ के लोग एक स्थान से दूसरे स्थान तक गये। इसने भी विचारों के आदान-प्रदान में सहायता की है। 

    इस प्रकार भारतीय संस्कृति में एक समानता का आगमन हुआ जिसे हमारे संपूर्ण इतिहास ने बरकरार रखा है। हमारी एकता का एक और महत्त्वपूर्ण कारण है, वह है मानसून प्रणाली। भौगोलिक विविधताओं और मौसमी विभिन्नताओं के होते हुए भी, भारत एक अन्तर्निहित एकता का अनुभव करता है। मानसून व्यवस्था भारतीय जलवायु की संरचना का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है जो पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोता है। मानसून के आगमन ने सुनिश्चित कर दिया है कि भारतीय लोगों का मुख्य पेशा कृषि होगा। साथ ही जलवायु और भौगोलिक स्वरूपों की विभिन्नता ने खानपान, पोशाक, आवास और आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया है जिससे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थानों का निर्माण हुआ है। इन घटकों ने व्यक्ति की सोच और दर्शन को प्रभावित किया। भौतिक विशेषताओं और जलवायु की विभिन्नता के कारण विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का विकास हुआ है। विभिन्न क्षेत्रों की किन्हीं खास विशेषताओं ने इन संस्कृतियों को एक पहचान दी है। हमारी संस्कृति की मिश्रित प्रकृति, हमारे संगीत, नृत्य के स्वरूपों, नाटकों, कला और अन्य कलाकृतियों जैसे चित्रकला, मूर्तिकला तथा हमारे स्मारकों की वास्तुकलाओं में हमारी सभी भाषाओं के साहित्य भी इसी प्रकृति को प्रतिबिंबित करते हैं।

    हमारी राजनीतिक पद्धतियों में भी ऐसी ही विविधता में एकता प्रलक्षित होती है। वैदिक काल के शुरुआती दौर में समाज मूलतः पशुपालक था, लोग चरागाह की खोज में एक जगह से दूसरी जगह घूमा करते थे। कृषि कार्य के आरंभ के साथ वैदिक काल के लोग एक जगह स्थायी रूप से बसने लगे। इस स्थायी जीवन से सामाजिक उन्नति और शहरों का विकास हुआ जिसमें नियम और कानून की आवश्यकता महसूस हुई। तब एक राजनीतिक संगठन का उदय हुआ। इनमें सभा और समितियाँ शामिल थीं। इन राजनीतिक निकायों के द्वारा लोग सरकार चलाते थे। समय के साथ राष्ट्र की अवधारणा का उदय हुआ और एक खास क्षेत्र पर अधिकार शक्ति का नया मापदंड बना। कुछ जगहों पर गणराज्यों का भी उदय हुआ था। ईसा पूर्व छठी शताब्दी से चौथी शताब्दी को भारत में महाजनपद काल के रूप में जाना जाता है। सरकार चलाने में राजाओं की बहुत बड़ी भूमिका होती थी। इन महाजनपदों में विशाल साम्राज्य भी स्थापित हुये जहाँ सम्राट के पास निरंकुश शक्ति होती थी। अशोक, समुद्र गुप्त, हर्षवर्द्धन जैसे प्राचीन शासकों के बारे में आप शायद जानते होंगे। मुगलों ने भी भारत में एक बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया था। फिर अंग्रेजों ने अपने आपकों यहाँ स्थापित किया और 1858 में भारत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन गया था। परंतु एक लंबे संघर्ष के बाद हम 1947 में अपनी आजादी को प्राप्त करने में सफल हुए। आज हम एक प्रभुतासंपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष तथा जनवादी गणतंत्र हैं और हमारे देश के एक कोने से दूसरे कोने तक सरकार की समरूप व्यवस्था है।


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