Wednesday, 23 February 2022

न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ और महत्व बताइये।

न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ और महत्व बताइये।

न्यायिक पुनरावलोकन की मुख्य उपयोगिता क्या है ?

न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ

न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ है किसी भी निर्णय की समीक्षा करना। कार्विन के शब्दों में-"न्यायिक पुनराविलोकन का अर्थ न्यायालयों की उस शक्ति से है जो उन्हें अपने न्याय-क्षेत्र के अन्तर्गत लागू होने वाले व्यवस्थापिका के कानूनों की वैधानिकता का निर्णय देने के सम्बन्ध में तथा कानूनों को लागू करने के सम्बन्ध में प्राप्त है, जिन्हें वे अवैध तथा व्यर्थ समझे।" न्यायमूर्ति मार्शल ने सन् 1803 ई०yh में "मावरी बनाम मेडीसन'' के मामले में न्यायिका पुनराविलोकन की व्यवस्था करते हुए कहा था-"न्यायिक पुनराविलोकन न्यायालय द्वारा अपने समक्ष प्रस्तुत विधायी कानूनों तथा कार्यपालिका अथवा प्रशासनिक कार्यों का वह निरीक्षण है जिसके द्वारा वह निर्णय करता है कि क्या यह एक लिखित संविधान द्वारा निषिद्ध किए गए हैं अथवा उन्होंने अपनी शक्तियों से बढ़कर कार्य किया है या नहीं।"भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन का अधिकार सीमित है। भारत का संविधान अमेरिका के संविधान की तरह कठोर नहीं है। इसके परिणामस्वरूप केन्द्र सरकार यदि किसी ऐसे कानून को देश के लिए हितकर समझती है, जिसको उच्चतम न्यायालय ने अवैधानिक घोषित कर दिया है तो वह न्यायिक पुनराविलोकन का तात्पर्य न्यायालय द्वारा विधायिकाओं के द्वारा पारित कानूनों तथा प्रशासनिक नीतियों की संवैधानिकता की जाँच करना तथा ऐसे कानूनों एवं नीतियों को असंवैधानिक घोषित करना है जो संविधान के किसी अनुच्छेद का उल्लंघन अथवा अतिक्रमण करती है। 

न्यायिक पुनरावलोकन का महत्व / उपयोगिता

न्यायिक पुनरावलोकन का महत्व / उपयोगिता निम्न प्रकार की है

(1) सकारात्मक दृष्टिकोण की परिचायक-यद्यपि न्यायिक पुनरावलोकन की विद्वानों के द्वारा बहुत आलोचना की गई हैं परन्तु आलोचनाओं के कारण इसकी उपयोगिता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा है। इसी कारण आज तक इस विषय में उच्चतम न्यायालय के अधिकार सीमित नहीं किए गए हैं। सन् 1937 ई० के बाद अमेरिका सर्वोच्च न्यायालय ने अपना दृष्टिकोण परिवर्तित कर लिया है। सन् 1954 ई० में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसे कानून को अवैधानिक घोषित किया, जिसके कारण सार्वजनिक स्कूलों में पूजादीप आधार पर भेद-भाव किया गया। यह न्यायालय प्रगतिशील अथवा सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचायक है।

(2) संविधानको गतिशील बनाना-सर्वोच्च न्यायालय ने सदैव ही संविधान को अपनी व्याख्याओं के द्वारा प्रगतिशील बनाया है, क्योंकि जब सन् 1789 ई० में अमेरिका का संविधान बना तो यह केवल साधारण ढाँचा ही था। अमेरिका सर्वोच्च न्यायालय ने इस कठोर तथा संक्षिप्त संविधान को अपनी व्याख्याओं द्वारा गतिशील तथा विस्तृत बनाया है।

(3) क्षेत्राधिकार को सुनिश्चित करना-सर्वोच्च न्यायालय ने संघीय तथा राज्यों की सरकारों के वैधानिक विवादों का निर्णय करके उनके अपने अधिकार में रखा है।

(4) संघात्मक व्यवस्था की सुरक्षा-सर्वोच्च न्यायालय ने कांग्रेस तथा कार्यपालिका को एक-दूसरे के क्षेत्र में अनुचित हस्तक्षेप करने से रोका है। संघीय सरकार में सर्वोच्च न्यायालय का यह कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

(5) संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखना-यदि सर्वोच्च न्यायालय पुनरावलोकन का कार्य न करता, तो संविधान अमेरिका में कदापि सर्वोच्च कानून नहीं रह सकता था। परिणामस्वरूप कांग्रेस व राज्यों द्वारा अनगिनत कानून इसके विरुद्ध बन जाते तथा संविधान केवल एक कोरा कागज रह जाता। इस अधिकार के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान तथा नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की है।

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