Friday, 18 February 2022

भावात्मक तथा चेतनात्मक संस्कृति में अंतर स्पष्ट कीजिए।

भावात्मक तथा चेतनात्मक संस्कृति में अंतर

(1) भावात्मक संस्कृति - इस प्रकार की संस्कृति में हमारे विचारों, भावनाओं, मनोधारणाओं, नैतिकता, सामाजिक मूल्यों, आदर्शों व जीवन के प्रति दृष्टिकोणों का भावात्मक विकास होता है। भौतिक सुख की अपेक्षा मानसिक या आध्यात्मिक उन्नति ही इसका लक्ष्य है। भौतिक सुख की आध्यात्मिक कल्पना को ही उच्च माना जाता है। ईश्वर में एकग्रत होना परलौकिक सुख के लिए रात-दिन पुरुषार्थ करना आवश्यक है इस संस्कृति में सत्य वही है जिसे हमारी आत्मा सत्य स्वीकार करे, ज्ञान वही है जो ईश्वर के बारे में पता दे, कानून वह है जो नैतिक आदर्शों से ओत-प्रोत हो। इस संस्कृति में मस्तिष्क नहीं वरन् हृदय व दृष्टिकोण को विशाल बनाने के लिए प्रयत्न किए जाते हैं। भौतिक उपकरण हमारी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है उनकी माँग उन्हीं के बराबर होती है जिसके कारण भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। भौतिक आविष्कार नहीं होते बल्कि सामाजिक आविष्कार भी होते हैं। वास्तव में समाज में कोई भी सामाजिक सांस्कृतिक आविष्कार तभी हो सकता है जब समाज उसकी निरन्तर आवश्यकता का अनुभव करता है। प्राचीन भारत में हम किसी भी प्रकार की भौतिक इच्छा की उपलब्धि नहीं करते थे। अतः भौतिक आविष्कारों का न होना स्वाभाविक ही था।

(2) चेतनात्मक संस्कृति - चेतनात्मक संस्कृति भौतिक युक्त संस्कृति होती है इसमें आध्यात्मिकता व कल्पना का स्थान व्यावहारिकता व यथार्थता ग्रहण कर लेती है। इसके मुख्य उपादान, विचार, आदर्श, कला, कानून का विकास मानते हैं। इसमें हम भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले औतिक उपकरण को ही आविष्कृत मानते हैं तथा वही सत्य है जिसे हम अपनी आँखों से देख सकते हैं। इस संस्कृति का उद्देश्य जीवन में अधिक-से-अधिक भौतिक सुविधाएँ लेना है। बेवर ने इसमें प्रोटेस्टैण्ट धर्म की व्याख्या करके दिखाया है संवेगात्मक सांस्कृति में विवाह का उद्देश्य सहयोगात्मक विधि से अधिकाधिक धन कमाना भौतिक सुख साधनों की उपलब्धि तथा अधिक जैविक व लैंगिक सख प्राप्त करना। परिवार व शिक्षा संस्थाएँ दोनों ही यह पाठ पढ़ाती हैं कि अधिक से अधिक धन कमाया जाए बल्कि पत्नी मोक्ष या ईश्वर की प्राप्ति कराने में नहीं वरन अधिक धन उपार्जित करने में सहायक होती है प्रत्येक बात में वैज्ञानिक तथ्यों का सहारा लिया जाता है। दूसरों के विषय में सोचने के लिए हमारे पास समय नहीं होता यह सांस्कृति भावात्मक सांस्कृति को विपरीत विशेषताओं को प्रकट करती है। वर्तमान काल में यूरोप व अमेरिका की सांस्कृति इसी प्रकार की है। सोरोकिन के शब्दों में, "चेतनात्मक संस्कृति एवं समाज इस अन्तिम सिद्धांत पर आधारित है कि सच्ची वास्तविकता व मूल्य ऐन्द्रिक होते हैं और हमारी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अनुभूत वास्तविकता व मूल्यों से बढ़कर कोई भी सत्य नहीं है।" 


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