Monday, 10 January 2022

भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या कीजिए और उसकी आलोचना कीजिए।

भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या कीजिए और उसकी आलोचना कीजिए।

  1. 1935 ई. के गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट की मुख्य धाराओं का विश्लेषण कीजिए।
  2. 1935 के अधिनियम' की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1935

ब्रिटिश सरकार ने आश्वासन देकर सन् 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन को खत्म कर दिया जिससे भारतीयों को यह आशा हुई कि अब उन्हें शासन प्राप्त हो जायेगा। परन्तु अंग्रेजी सरकार ने ऐसा नहीं किया।

पं. मदनमोहन मालवीय के शब्दों में, "गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1935 बाहरी रूप में लोकतांत्रिक तथा भीतरी रूप में पूर्णतया धोखा था।'

इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित थे -

  • ब्रिटिश संसद का प्रभुत्व - गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1935 के लागू हो जाने से भारत . पर ब्रिटिश हुकूमत का प्रभुत्व बना रहा था। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार समस्त अधिकार ब्रिटिश सम्राट को प्राप्त थे। भारत मंत्री को शासन का प्रमुख व्यक्ति बनाया गया था तथा गवर्नर जनरल भारत मंत्री का पिठू होता था। इससे भारत को ब्रिटेन की आधीनता से मुक्ति नहीं मिल पायी थी।
  • कमजोर संघीय व्यवस्था - गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1935 में जिस संघीय व्यवस्था को स्थापित करने का प्रावधान किया गया था वह अत्यन्त ही दुर्बल थी। देशी रियासतें संघ में शामिल होने के लिए स्वतंत्र थीं तथा ब्रिटिश प्रान्तों में लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले प्रान्तों तथा रियासतों में तालमेल बैठाना कठिन था। इस व्यवस्था में गवर्नर जनरल के विशेषाधिकार बने रहने के कारण भी यह व्यवस्था स्वीकार करने योग्य न थी।
  • गवर्नर का प्रान्त में पूर्ण स्वामी होना - गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1935 के अन्तर्गत प्रान्त में गवर्नर पूर्ण स्वामी था तथा केन्द्र में वह गवर्नर जनरल कानूनी अधिनायक था। इन्हें निम्नलिखित अधिकार प्राप्त थे
    1. गवर्नर तथा गवर्नर जनरल का बजट पर पूर्ण अधिकार था।
    2. वे अंग्रेजी सरकार के लिए कार्य करते थे।

कानून और व्यवस्था की पूर्ण शक्ति गवर्नर जनरल को प्राप्त थी। गवर्नर जनरल के पास व्यापक प्रान्तीय शक्तियाँ थीं।

  • द्वैध शासन प्रणाली - गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1935 के अन्तर्गत द्वैध शासन प्रणाली को अपनाया गया था। यह प्रणाली असफल थी क्योंकि सम्पूर्ण भारत पर इसे लागू करना अनुपयुक्त था।
  • संघीय न्यायालय - दिल्ली में एक संघीय न्यायालय की स्थापना की गयी थी। यह न्यायालय न तो सर्वोच्च न्यायालय था और न ही सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय। यह देश का उच्च न्यायालय था।
  • साम्प्रदायिक निर्वाचन - इस अधिनियम के अन्तर्गत साम्प्रदायिक निर्वाचन एवं प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को लागू किया गया। इसका देश में विरोध किया गया था।
  • आरक्षण एवं रक्षा व्यवस्था की व्यवस्था - इस एक्ट के अन्तर्गत अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण एवं रक्षा-कवच बनाने के सम्बन्ध में अधिकार गवर्नर एवं गवर्नर जनरल को दे दिये गये थे। इसलिए इस वर्ग के लोग गवर्नर जनरल की कृपादृष्टि पाने के लिए उनके पिट्ठू बन गये थे।
  • भारतीय को स्वयं निर्णय लेने का अधिकार न होना - भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अन्तर्गत भारतीयों की आशानुरूप उन्हें आत्म-निर्णय का अधिकार नहीं दिया गया था। अंग्रेज भारतीयों को शासन करने में असक्षम मानते थे।
  • प्रान्तीय स्वराज्य पर रोक - यद्यपि प्रान्तों को शासनाधिकार प्रदान कर दिया गया था परन्तु वास्तव में उन्हें पूर्ण स्वराज्यीय संस्था नहीं बनाया गया था। गवर्नर जनरल को प्रान्तों के शासन को अपने हाथ में लेने का अधिकार था।
  • अनुचित मताधिकार - प्रान्तों में विधानमंडल के मत देने का अधिकार मात्र 16% आबादी को ही दिया जाता था। इसके सम्बन्ध में शिक्षा व सम्पत्ति को मापदण्ड माना गया था। अशिक्षित एवं गरीब व्यक्ति को मत देने का अधिकार नहीं था।
  • बर्मा को अलग कर देना - आर्थिक एवं सांस्कृतिक रूप से भारत के लिए उपयोगी बर्मा क्षेत्र को भारत से अलग कर दिये जाने से भारत को क्षति हुई थी।
  • मन्त्रियों का शक्तिहीन होना . प्रान्तीय शासन व्यवस्था पूर्ण स्वराज्यीय संस्था नहीं थी। प्रान्तीय स्वशासन में मंत्रियों को विभाग तो दिये गये थे परन्तु उनके पास शक्तियाँ बहुत सीमित थीं। मन्त्रियों की पदावधि गवर्नर तथा गवर्नर जनरल की इच्छा पर निर्भर थी।

भारत शासन अधिनियम 1935 की आलोचना

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के अनुसार, "यह घोषणा करना कि विधि एवं व्यवस्था मन्त्री को सौंप दी गयी है, छल एवं कपट से कम न था।"

गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1935 में बहुत सी कमियाँ विद्यमान थीं। यह अधिनियम औपचारिक मात्र था। पंडित जवाहगल नेहरू के अनुसार, "यह गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1935, गुलामी का घोषणापत्र मात्र था।'

सन 1935 ई. का अधिनियम दो आधारों पर 1919 के अधिनियम की अपेक्षाकृत उचित था ! प्रथम तो इसमें प्रान्तों के द्वैधशासन के स्थान पर पूर्ण उत्तरदायी शासन की व्यवस्था थी। द्वितीय, केन्द्र में आंशिक उत्तरदायित्व की स्थापना का प्रयास किया गया। इसके अतिरिक्त विधान सभाओं के सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गयी तथा मताधिकार का भी विस्तार किया गया।

परन्तु यह अधिनियम भी भारतीयों को सन्तुष्ट न कर सका। इसमें गवर्नर जनरल तथा गवर्नरों को इतने 'विशेष उत्तरदायित्व' तथा 'स्वविवेकी शक्तियाँ' सौंपी गयी कि मन्त्रियों के पास शासन करने को कुछ शेष नहीं रहा। इसलिए प्रत्येक राजनीतिक दल ने इस अधिनियम की आलोचना की। पं जवाहरलाल नेहरु ने इस अधिनियम की तुलना उस मोटर से की थी, जिसमें केवल ब्रेक हों और इंजन बिलकुल न हो। मुस्लिम लीग ने भी इस अधिनियम की आलोचना की। जिन्ना के अनुसार, "1935 ई. की योजना पूर्ण रूप से सड़ी हुई, मौलिक रूप से खराब तथा पूर्ण रूप से अस्वीकृति के योग्य थी।"


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