Monday, 21 September 2020

Hindi Essay on "Adhunik Bharat ki Pramukh Samasya", "भारत की आधुनिक समस्याएं पर निबंध" for Class 6, 7, 8, 9, 10, 11 & 12

भारत की आधुनिक समस्याएं पर हिंदी निबंध: इस लेख में हम पढ़ेंगे भारत की आधुनिक समस्याएं पर निबंध जिसमें हम जानेंगे भारत की प्रमुख समस्याएं, "सामाजिक समस्या उपाय", "आधुनिक भारत की प्रमुख समस्या" आदि। Hindi Essay on "Adhunik Bharat ki Pramukh Samasya" Nibandh.

Hindi Essay on "Adhunik Bharat ki Pramukh Samasya", "भारत की आधुनिक समस्याएं पर निबंध" for Class 6, 7, 8, 9, 10, 11 & 12

भारत हो या कोई अन्य देश, जहाँ भी जीवन है और आदमी रहते हैं, वहाँ समस्याएँ न हों, ऐसा कभी सोचा भी नहीं जा सकता ! भारत जब से भी अस्तित्व में आया है, तभी से तरह-तरह की समस्याओं से दो-चार हो रहा है। परन्तु जब 'आधुनिक समस्याएं’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, तब उन सबका अर्थ और सम्बन्ध परम्परागत समस्याओं से न होकर कछ नयी किस्म की समस्याएँ एवं प्रश्न ही हो सकते हैं। अत:यहाँ गरीबी, बेकारी, महँगाई जैसी जन्मजात और परम्परागत समस्याओं की चर्चा नहीं की जा सकती। ये तो सभी विकासशील देशों की ही नहीं, विकसित देशों की भी समस्याएँ हैं। हमारे विचार में आधुनिक समस्याओं से अभिप्राय वे नयी बातें और परिमाण हैं, जो विश्वास के संकट, मूल्यों-मानों के संकट के कारण सामने उठकर समस्याओं का रूप धारण करती जा रही हैं। जिनकी उपेक्षा पश्चिम की देन या प्रभाव कहकर, दिशाहीन सिनेमा की उपज बताकर नहीं की जा सकती। वास्तव में इनके मूल कारणों में जाकर इनकी तह तक पहुँचने की आवश्यकता है। नहीं तो विघटन और गिरावट का जो दौर शुरू हुआ है, वह कहीं भी न रुक भारतीय सभ्यता-संस्कृति को विनाश के किसी अनजाने अन्धे कुएँ में फेंक देगा!

देश जब स्वतंत्र हुआ था, तब लोगों के मन-मस्तिष्क तरह-तरह के आशावादों और विश्वासों से भर उठे थे ! लोगों ने मानने की गलती कर ली थी कि अब किसी जादू की छड़ी के ज़ोर से हमारी सारी मुसीबतों का अन्त और समस्याओं का समाधान हो जायेगा! स्वतंत्रता-संघर्ष में मँज-तप कर निकले नेता जब तक रहे, ये आशा और विश्वास एक सीमा तक बने रहे । लेकिन जैसे ही राजनीतिज्ञों की अगली खेप, नये धनपति बन गये लोगों की पीढ़ी ने जीवन-समाज और प्रशासन में कदम रखा, शोषण और भ्रष्टाचार का अनजाना दौर शुरू हो गया ! नये-नये उद्योग-धन्धों की स्थापना और पश्चिम की नकल पर विकास की जो लम्बी-ऊंची उड़ान शुरू हुई, उसका थोड़ा-बहुत होने वाले लाभों को या तो नये राजनेता डकारने लगे, या फिर नये उभर रहे धनी वर्ग और पुराने धनियों की नवीनतावादी सन्ताने। आम आदमी पर तरह-तरह के बोझ और दबाव बढ़ने लगे। विकास की कीमत तो आम आदमी को चुकानी पड़ रही थी, पर फल कहीं और जा रहा था । फलस्वरूप अस्तित्व-रक्षा का प्रश्न स्वतंत्र भारत की पहली बड़ी आधुनिक समस्या बनकर सामने आया । इस समस्या के कारण भी वही नये नेतागण और पूंजीपति वर्ग के नये लोग ही थे। जो आम जनता को आश्वासन तो कुछ दे रहे थे; पर व्यवहार के स्तर पर कर कछ और ही रहे थे। फलस्वरूप पैदा होने वाले अविश्वास के भाव ने अपने अस्तित्व के प्रति भी अविश्वास प्रकट कर अस्तित्व के संकट की समस्या के साथ-साथ विश्वास के संकट की समस्या को भी गहरा दिया। हमारे विचार में आज हमारी सभ्यता-संस्कृति की नैतिकता, नीति आदि, घर-परिवार के विघटन-टूटन, पारस्परिक अविश्वास आदि से सम्बन्ध रखने वाली जितनी भी आधुनिक समस्याएँ हैं, उनको जन्म देने वाली बुनियादी समस्याएँ ऊपर कही गयी दो समस्याएँ ही है। नित्य प्रति बढ़ते जा रहे आथिक दबावों, पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति के जहरीले प्रभावों ने निरन्तर बढ़कर , भारतीय चेतना पर छाकर उस सब को गहरा ही बनाया है। पश्चिमीभाषा, सभ्यता-संस्कृति, उसकी हिंसक और कामुक, दूसरे शब्दों में, मात्र उपभोक्तावादी दृष्टिने आज स्वतंत्र भारत के सामने लगभग तीन-साढ़े तीन दशकों के बाद से अपनी पहचान के संकट की समस्या ने एक भयानक रूप धारण कर लिया है। हमारे लिए अच्छा और उपयोगी, अपनाने योग्य और आनन्द दायक वही है कि जो विदेशी है। या फिर अपना होते हुए भी विदेश से होकर हम तक पहुंचा है। जैसे लुधियाने में बना स्वैटर इंग्लैण्ड-अमेरिका में पहँच वहाँ का लेबल लगा दिया जाता है। उसे खरीद कर जब कोई भारतवासी आकर किसी भारतीय को देता है, तो वह उसके वास्तविक स्वरूप को न पहचान, विदेशी मालमान निहाल हो जाता है, कुछ इसी प्रकार की मानसिकता हम सबकी बन गयी है। पहचान के संकट की समस्या कुछ इसी प्रकार की है।

नकल भी आधुनिक भारत की एक विकराल हो रही आधनिक समस्या कही जा सकतीहै। छात्र परीक्षाओं में नकल करते हैं या छुरे-पिस्तौल के बल पर करना चाहते हैं, नकल ही समस्या का एक रूप है। परन्तु पश्चिमी चकाचौंध, मारधाड़, हिंसा, बलात्कार आदि की नकल पर बनने वाली भारतीय फिल्में हमारी नयी पीढ़ियों को क्या बाँट और मिला रही हैं? वे ऐसे सपने बाँट रही है जो कभी पूरे नहीं हुआ करते। ऐसा हम जानते हैं, फिर भी उनकी नकल करने की हर प्रकार से कोशिश करते हैं। जब कोशिशें पूरी नहीं हो पातीं, तो हमें अपनी वास्तविक शक्तियों पर विश्वास नहीं रह जाता। हम सपने पूरे करने के लिए हर प्रकार के अनैतिक रास्तों पर चलने लगते हैं; फिर चाहे वह रास्ता हिंसा, मारकाट,बलात्कार, चौरी-डकैती आदि के पड़ावों से होकर ही क्यों न जाता हो। इस प्रकार सपने बेचने वाली संस्कृति की नकल की प्रवृत्ति ने विश्वास के संकट की समस्या को और भी गहरा बनाया है। तरह-तरह के भ्रष्टाचार, रिश्वत, काला बाज़ार, स्मगलिंग आदि बुराइयाँ इसीसमस्या के विभिन्न नाम और रूप कहे जा सकते हैं!

ऊपर भारत की जिन आधुनिक समस्याओं के नाम-स्वरूप बताये गये हैं, उनके विषम प्रभाव और मार से हमारी भारतीयता और मानवीयता मरती जा रही है। आपस में सत्य,अहिंसा, प्रेम, भाईचारे आदि के आधार पर जो गहरे सम्बन्ध थे, उनमें दरार आकर निरन्तर चौड़ी होती जा रही है। स्वार्थों की ऐसी अबूझ भावनाएं हमारे बीच में आ गयी हैं कि उन्होंने पति-पत्नी के सहज सम्बन्धों को तो क्या, भाई-भाई, बहन-भाई, पिता-पुत्र और माँ-बेटी के सम्बन्धों को भी जड-मूल से उखाड़ कर रख दिया है। इस प्रकार अस्तित्व का संकट, विश्वास का संकट, नकल की प्रवृत्ति, पश्चिमोन्मुख सपने देखने की भावना, सम्बन्धों का संकट आदि स्वतंत्र भारत की आधुनिक समस्याएं हैं। इन समस्याओं का सम्बन्ध क्योंकिलोगों की प्रवत्तियों, मन और आत्मा से है, सो इनके रहते बेकारी, महँगाई तथा भ्रष्टाचारों से सम्बन्ध रखने वाली बाहरी समस्याओं का भी कोई समाधान संभव नहीं हो पा रहा। हिंसा, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट, चोरी-डकता और सा नाज़ारा की घटनाएँ कोढ़ में खाज की तरह बढ़ती जा रही हैं। रक्षक ही भक्षक बनते जा रहे हैं। बेचारे आम आदमी की सुनवाई कहीं भी नहीं। समाज-सेवा की रट लगाने वाले राजनेता ही वास्तव में भ्रष्ट एवं संकल्पहीन हो गये हैं। जन-हित का कोई उत्साह कहीं भी दिखायी नहीं दे रहा। परिणाम हमारे सामने है–समस्याओं की समस्या घोर अराजकता!

अब प्रश्न उठता है कि इन आधुनिक मानी जाने वाली समस्याओं का आखिर समाधान क्या है? इनके कारण जो मानवता और देश टूटने की प्रक्रिया में पड़ गये हैं, उन्हें कैसे बचाया जा सकता है। हमारे विचार में इस सबका एक ही उत्तर तथा समाधान हो सकता है। वह यह कि नैतिकता एवं नैतिक शक्तियों पर विश्वास जगाया जाये। दृढ़-संकल्प बनकर खोये विश्वासों को लौटाया जाये। शासन-सत्ता और व्यवहार के स्तर पर दृढ़ इच्छा-शक्ति का परिचय देकर उन समस्त बुराइयों, कुण्ठाओं की जड़ पर प्रहार किया जाये,जो इन समस्याओं की जनक हैं। संकल्प और क्रिया मिलकर ही अपनेपन के उस भाव को फिर से जगा सकते हैं कि जिसके जाग जाने पर अपने-आप ही सभी प्रकार की समस्याएँ दम तोड़ दिया करती हैं। चारित्रिक दुर्बलताओं से उबरकर ही इस राह पर बढ़ा जा सकताहै, अन्य कोई चारा नहीं!


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