Thursday, 7 November 2019

Dhruva Story in Hindi and Sanskrit Language

Dhruva Story in Hindi and Sanskrit Language : In this article, we are providing ध्रुव तारे की कहानी संस्कृत तथा हिंदी में for our readers.

ध्रुव तारे की कहानी संस्कृत में - Dhruva Story in Sanskrit Language

पुरा उत्तानपादः नाम एकः राजा आसीत् । तस्य द्वे पत्न्यौ स्तः-एका सुनीतिः अपरा च सुरुचिः । राज्ञी सुरुचिः राज्ञोऽतीव प्रियासीत् । उत्तमः नाम तस्याः पुत्रः आसीत् । सुनीतिः राजानं नातिप्रियासीत् तस्याः पुत्रः ध्रुवः आसीत् ।

एकस्मिन् दिने राजा सुरुचेः पुत्रम् उत्तमम् अङ्के निधाय स्नेहं कुर्वन्नासीत् । तस्मिन् समये सुनीतेः पुत्रः ध्रुवः पितुः अङ्के स्थातुमैच्छत्। तद् दृष्टवा विमाता सुरूचिः अब्रवीत् । वत्स ! त्वं राजसिंहासने आरोढम् अयोग्यः असि यतः त्वम् अन्यस्त्रीगर्भात उत्पन्नोऽसि। यदि त्वं राजसिंहासने आरोढुम् इच्छसि तर्हि भगवतः नारायणस्य आराधनां कुरु । मम कुक्षौ च आगत्य जन्म गृहाण ।

विमातुः मुखात् एतानि कटु वचनानि श्रुत्वा बालकः ध्रुवः उच्चस्वरेण रोदनमारभत । किन्तु राजा उत्तानपादः इदं सर्वं तूष्णीं भूत्वा पश्यन्नासीत् । अत्रान्तरे बालकः ध्रुवः रोदनं कुर्वन् मातुः सुनीतेः पार्श्व गतः अवदत् च विमातुः कटु-व्यवहार विषये । पुत्रात् सुरुचेः कटुवचनमाकर्ण्य सुनीतिः संयमेन ध्रुवमब्रवीत् - वत्स ! धैर्य शान्तिं च धारय । यद्यपि त्वं विमातुः आचरणेन प्रताडितोऽसि तथापि त्वं परार्थे कदापि अमङ्गलं कामनां मा कुरु । यः पुरुषः अन्यान् खिन्नं करोति सः तस्य फलं अवश्यमेव प्राप्नोति। अतः भौ वत्स ! त्वं विमातुः कटुसत्यं पालयन् भगवतः नारायणस्य चरणकमलयोः आराधनां कुरु । तपसा तव पूर्वजाः परां शान्तिम् अलभन्त ।

मातुरादेशेन ध्रुवः ईश-ध्यानं प्रति प्रेरणां गृहीत्वा स राजप्रासादं त्यक्त्वा च वनम् अगच्छत् । वने ध्रुवः घोरतपः अकरोत् । तस्य मन्त्रः आसीत् - 'ओम् नमो भगवते वासुदेवाय' ध्रुवस्य तपसा प्रसन्नो भूत्वा भगवान् विष्णु: तस्य समक्षं प्रकटीभूतः ईप्सितं वरं च प्रादात् ।
ध्रुवः स्वर्गलोके अचलं पदं प्राप्तवान् ।

ध्रुव तारे की कहानी हिंदी में - Dhruva Story in Hindi Language

प्रियव्रत और उत्तानपाद- ये दोनों मनु के पुत्र थे। महाराज उत्तानपाद की दो रानियां थीं। एक सुनीति और दूसरी सुरुचि। राजा उत्तानपाद का प्रेम सुरुचि के प्रति अधिक था। सुनीति बड़ी रानी थी। उसकी कोई संतान न थी। महाराज को इसलिए सुरुचि से दूसरा विवाह करना पड़ा। लेकिन सुनीति को घर में नहीं रहने दिया गया। इसलिए उसे थोड़ी दूरी पर जंगल में भेज दिया गया।

थोड़े समय बाद सुरुचि के संतान हुई। उसके कुछ अंतराल बाद सुनीति को भी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। उसका नाम रखा गया ध्रुव। एक दिन राजा उत्तानपाद सुरुचि के बालक को गोद में बिठाकर स्नेह कर रहे थे। तभी ध्रुव खेलता हुआ वहां आया और पिता की गोद में बैठने के लिए ललचाई आंखों से देखने लगा। पिता उसके मन के भावों का समझ गए और गोद में बिठाकर उसे प्यार करने लगे।

अपने सौत के पुत्र ध्रुव को राजा की गोद में बैठे देख कर सुरुचि ईर्ष्या से जल उठी। उसने पिता की गोद में बैठे बालक को खींच कर नीचे उतारते हुए कहा, पिता की गोद में बैठने के लिए तुझे मेरी कोख से जन्म लेना होगा।

तेजस्वी बालक ध्रुव को विमाता के ये वचन बाण की भांति लगे। वह तिलमिला उठा और वहां से रोता हुआ अपनी माता के पास चला गया। महाराज को यह बात अच्छी तो नहीं लगी, किंतु वे कुछ बोल न पाए।

ध्रुव की माता सुनिति ने जब अपने पुत्र को रोते हुए देखा तो उसे गोद में उठा लिया और बड़े स्नेह से पुचकार कर रोने का कारण पूछा। ध्रुव ने सब कह सुनाया तो सुनिति को इससे बड़ी व्यथा हुई। वह रोती हुई बोली, बेटा ! सभी लोग अपने भाग्य से सुख या दुख पाते हैं, अतः दुसरे को अपने अमंगल का कारण नहीं मानना चाहिए।

सुनिति ने समझाया, यदि तुम्हे पिता का स्नेह चाहिए तो उन कमल नयन भगवान के चरण कमलों की आराधना करो तुम्हारे पितामह भगवान मनु ने यज्ञों के द्वारा जिनकी आराधना करके दूसरों के लिए अप्राप्य भूलोक तथा स्वर्ग लोक के भोग एवं मोक्ष को प्राप्त किया है। उनके अतिरिक्त तुम्हारा दुख दूर करने वाला कोई नहीं है। अत: तुम उन दयामय नारायण की शरण लो।

माता के आदेश से वह भगवान की भक्ति करने के लिए अपना घर व राजमहल त्यागकर वन चले गए। वन में उन्होंने कठोर तपस्या की। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र के जाप के साथ भगवान नारायण की कठोर तपस्या की । उनकी तपस्या से भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन देकर कहा, ‘हे राजकुमार! तेरी सभी इच्छाएं पूर्ण होंगी । समस्त प्रकार के सुख अंत समय में तू मेरे लोक को प्राप्त करेगा ।’

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