Monday, 18 March 2019

विद्यार्थी जीवन पर निबंध / छात्र जीवन पर निबंध

विद्यार्थी जीवन पर निबंध / छात्र जीवन पर निबंध

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यह विशिष्ट समय अवधि जिसमें बालक या युवक किसी शिक्षा संस्था में अध्ययन करता है विद्यार्थी जीवन है।  जीविका उपार्जन की चिंता से मुक्त अध्ययन का कालखंड विद्यार्थी जीवन है।

भारत की प्राचीन विद्या पद्धति में 25 वर्ष की आयु तक विद्यार्थी घर से दूर ऋषि आश्रमों में रहकर विविध विधाओं में निपुणता प्राप्त करता था किंतु देश की परिस्थिति परिवर्तन से यह प्रथा लुप्त हो गई। इसका स्थान लिया विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों ने। इन तीनों संस्थाओं में जब तक बालक युवक अध्ययनरत है वह विद्यार्थी कहलाता है। उसकी अध्ययन अवधि में उसका जीवन विद्यार्थी जीवन नाम से अभिहित किया जाता है।

दूसरी और आधुनिक भारत में गुरुकुल तथा छात्रावास पद्धति प्राचीन ऋषि आश्रमों का समय अनुसार परिवर्तित रूप है। इन गुरूकुलों तथा छात्रावासों में रहकर अध्ययन करने वाला विद्यार्थी सही अर्थ में विद्यार्थी जीवन का निर्वाह करता है।

वर्तमान विद्यार्थी जीवन भी दो प्रकार का है- (1) परिवार में रहते हुए विद्यार्थी जीवन (2)छात्र आवासीय छात्र जीवन। परिवार में रहते विद्यार्थी जीवन में विद्यार्थी परिवार में रहकर उसकी समस्याओं, आवष्यकताओं, मांगों को पूरा करते हुए भी अध्ययन करता है। नियमित रुप से विद्यालय जाना और पारिवारिक कामों को करते हुए भी घर पर रहकर ही पढ़ाई में दत्तचित्त होना, उसके विद्यार्थी जीवन की पहचान है।

दूसरी ओर छात्रावास में ही रहता हुआ वह पारिवारिक झंझटों से मुक्त पूर्णता शैक्षिक वातावरण में रहता हुआ विद्यार्थी जीवन का निर्वाह कर अपना शारीरिक मानसिक तथा आध्यात्मिक आत्मिक विकास करता है।

विद्यार्थी जीवन उन विद्याओं, कलाओं तथा शिल्पों के शिक्षण का काल है जिनके द्वारा छात्र जीवन के अनंतर जीवकोपार्जन करता हुआ पारिवारिक दायित्वों का वाहन कर सके। अतः यह काल संघर्षमय संसार में सम्मान पूर्वक जीने की योग्यता निर्माण करने का समय है। इन सब के निमित्त ज्ञानार्जन करने, शारीरिक और मानसिक विकास करने, नैतिकता द्वारा आत्मा को विकसित करने की स्वर्णिम अवधि है, विद्यार्थी जीवन।

निश्चित पाठ्यक्रम के अध्ययन से छात्र ज्ञानार्जन करता है। समाचार पत्र पत्रिकाओं, पुस्तकों के अध्ययन तथा आचार्यों के प्रवचनों से वह मानसिक विकास करता है। शैक्षणिक प्रवास और भारत दर्शन कार्यक्रम उसके मानसिक विकास में वृद्धि करते हैं। प्रातः कालीन व्यायाम और सायं कालीन खेल उसका शारीरिक विकास करते हैं। नैतिकता का आचरण उसके चरित्र को बलवान बनाता है, आत्मा का विकास करता है।

प्रश्न यह है कि क्या आज का विद्यार्थी सच्चे अर्थों में विद्यार्थी जीवन का दायित्व पूर्ण कर रहा है? इसका उत्तर नहीं होगा। कारण उसे अपने विद्यार्थी जीवन में ना तो ऐसी शिक्षा दी जाती है जिसे जीवन क्षेत्र में प्रवेश करते ही जीविका का साधन प्राप्त हो जाए और ना ही उसे वैवाहिक अर्थात पारिवारिक जीवन जीने की कला का पाठ पढ़ाया जाता है इसलिए विद्यार्थी जीवन से अर्थात गैर जिम्मेदारी से पारिवारिक जीवन अर्थात संपूर्ण जिम्मेदारी के जीवन में पदार्पण करता है तो उसे असफलता का ही मुंह देखना पड़ता है।

आज का विद्यार्थी जीवन जीने के लिए अनुपयुक्त बहू विधि विषयों का मस्तिष्क पर बोझ डालता है। ज्ञानार्जन के नाम पर पुस्तकों का गधे भर का भार कमर पर लाद देता है। आज का विद्यार्थी जीवन बेकार के ज्ञानार्जन का कूड़ादान बनकर रह गया है।

आज का विद्यार्थी जीवन विद्या की साधना, मन की एकाग्रता और अध्ययन के चिंतन मनन से कोसों दूर है। इसलिए छात्र पढ़ाई से जी चुराता है, श्रेणियों से पलायन करता है। नकल करके पास होना चाहता है। जाली डिग्रियों के भरोसे अपना भविष्य उज्जवल करना चाहता है।

स्कूल, कॉलेज में उपयुक्त खेल मैदानों, श्रेष्ठ खेल उपकरणों तथा योग्य शिक्षकों के अभाव में गेम्स विद्यार्थी जीवन की पहुंच से परे होते जा रहे हैं। ऐसे में आज का विद्यार्थी जीवन जीवन को स्वस्थ और स्फूर्तिपद बनाने में पिछड़ रहा है।

आज का विद्यार्थी जीवन में राजनीति की वीरांगना से प्रेम करता है। हड़ताल, तोड़फोड़, जलसे-जुलूस, नारेबाजी, जिंदाबाद मुर्दाबाद का पाठ पड़ता है। जो पढ़ता है वह उसे प्रत्यक्ष करता है। उसे कार्यान्वित करें क्यों ना? जब 18 वर्षीय छात्र विद्यार्थी को वोट देने का अधिकार देकर भारत सरकार ने उसे राजनीति रूपी वीरांगना से प्रेम करने का आशीर्वाद दे दिया है।

आज के छात्र का विद्यार्थी जीवन प्रेम और वासना के आकर्षण का जीवन है। वह गर्लफ्रेंड, बॉयफ्रेंड बनाने में रुचि लेता है। वह घूमने-फिरने, होटल, क्लबों में जाने में समय का सदुपयोग मानता है। विद्यार्थी जीवन में विद्या की अर्थी उठाता है अपने ज्ञान के पवित्र कर्म को कामाग्नि से होम करता है।

आज के तेजी से बढ़ते बदलते समय में महंगाई की मार ने, पारिवारिक उलझन और संकटों ने, दूरदर्शन की चकाचौंध निर्माण सामाजिक विकृतियों और राजनीतिक अस्थिरता ने भारतीय जीवन से ही जीवन जीने का हक छीन लिया है तब विद्यार्थी जीवन उससे अछूता कैसे रह सकता है? गिरते परीक्षा परिणाम, फर्स्ट डिवीजन और डिस्टिंकशन की गिनती संख्या वर्तमान विद्यार्थी जीवन के अभिशाप के प्रमाण हैं।
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