Saturday, 2 March 2019

प्रतियोगिता जो मैं भूल नहीं सकूंगी पर निबंध

प्रतियोगिता जो मैं भूल नहीं सकूंगी पर निबंध

आइए, मैं अपनी एक ऐसी प्रतियोगिता की सत्य कथा सुनाता हूं जिसे जीवन में भूल पाना कठिन है। मन से हटा पाना दुष्कर है। स्मृति पटल से विस्मरण कर पाना असंभव है। 
दिल्ली स्कूल अंताक्षरी प्रतियोगिता। बाल दिवस की पूर्व संध्या। स्थान है, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग, दिल्ली का सभागार। समय है, 4:00 बजे सायं। 
दिल्ली के 399 स्कूलों के 3999 प्रतियोगी अंताक्षरी प्रतियोगिता में भाग लेने उपस्थित थे। मंच पर विराजमान थे तीन निर्णायक तथा चौथे संयोजक महोदय। मुख्य अतिथि थे शिक्षा निदेशक।
प्रतियोगिता में विजेताओं के लिए तीन पुरस्कार थे 1001, 501 तथा 251 रूपये नकद तथा तीन कप। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले छात्र के विद्यालय को चल वैजयंती भी दी जाने वाली थी।
नियम यह रखा गया कि विद्यार्थी यदि 1 सेकंड में किसी छंद के अंतिम अक्षर से कोई पद, कविता या दोहा नहीं बोलता तो उसे आउट समझा जाए। वह उठकर पीछे की सीट पर बैठ जाए। केवल हिंदी कवि के पद्य ही अंताक्षरी में बोले जा सकते थे अन्य नहीं। फिल्मी गीत तो बिल्कुल नहीं।
मैं अपने विद्यालय लक्ष्मी देवी जैन गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल पहाड़ी धीरज की ओर से इस प्रतियोगिता में भाग ले रही थीं। मेरी हिंदी अध्यापिका डॉक्टर सुषमा गुप्ता ने मेरे साथ कठोर परिश्रम किया था। उन्होंने सुप्रसिद्ध हिंदी कवि तथा कवियित्रियों के पद्य छांटकर मुझे दिए थे, कंठस्थ करवाए थे। मैंने भी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। 1 माह से निरंतर अभ्यास कर रही थी। पद्य के शुद्ध उच्चारण और लय पर विशेष बल था।
मन में उत्साह था। विस्मरण की चिंता नहीं थी। स्कूल का नाम रोशन करने की तमन्ना थी। 1001 की राशि प्राप्त की, करतल ध्वनि के बीच पुष्प माला पहनने, अध्यापिकाओं से आशीर्वाद लेने की तीव्र इच्छा थी। संयोजक ने शिक्षा निदेशक महोदय से अक्षर देने की प्रार्थना की। उन्होंने अच्छा ना देकर प्रसाद जी के गीत का एक पद्य सुनाया 
अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो। 
प्रशस्त पुण्य पंथ है बढ़े चलो बढ़े चलो।। 
इस प्रकार ‘ल’ वर्ण से अंताक्षरी का प्रारंभ हुआ। जैसे जैसे अंताक्षरी प्रतियोगिता बढ़ रही थी वैसे वैसे प्रतियोगियों के मुख से उच्चारित काव्य सुनने में आनंद आ रहा था। अनुभव हुआ कि अध्यापक अध्यापिकाओं ने सचमुच तैयारी करवाई है। प्रथम चक्र में 399 छात्रों में मुश्किल से 21 विद्यार्थी आउट हुए। दूसरा सत्र आरंभ हुआ तो पहले ही छात्र ने पीठ शब्द पर अपना दोहा समाप्त किया। ‘ठ’ पर धड़ाधड़ छात्र-छात्राएं उड़ने लगे। ‘ठ’ ने 50 से 60 छात्रों को ठोकर मार दी। आई मेरी बारी- मैंने मिथिला शरण गुप्त का यह दोहा सुनाकर अंताक्षरी को गति प्रदान की- 
ठहर अरी, इस ह्रदय में, लगी विरह की आग। 
ताल ग्रंथ से और भी धधक उठेगी जाग।। 
अंताक्षरी रुकती, प्रतियोगियों को आउट करती, पुनः अग्रसर होती चलती रही। 10वें चक्र में केवल 10 छात्र-छात्राएं रह गई- 9 छात्राएं तथा एक छात्र।
दस दौर और चले। ट, ठ, ड की त्रिमूर्ति ने 7 विद्यार्थियों को आउट कर दिया। शेष तीन में से एक मैं भी थी। मुझे लगा कि प्रथम आने का एक ही उपाय है कि विरोधियों को क्ष, त्र, ज्ञ पर अटकाया जाए। दूसरे दोनों प्रतियोगी भी शायद इन्हीं वर्णों के चक्कर में फंसाकर परास्त करना चाहते थे। अचानक मेरे पास क्ष पड़ा। मैने रघुवीर शरण मित्र का दोहा बोला- 
क्षमा पुरुष का कवच है, साहस नर का अस्त्र।
धैर्य पुरुष का धर्म है त्याग पुरुष का शास्त्र।। 
मेरे साथ बैठी लड़की त्र पर न बोल सकी उसके बाद लड़के की बारी थी। वह सरस्वती का पुत्र होने की क्षमता प्रकट करना चाहता था। उसने कबीर का दोहा सुना दिया-
त्रिया त्रिष्णा पापणी का सुकृति न जोड़ी।
पैड़ी चढ़ी पहाड़ लागै मोरि खोड़ी।
तृतीय का निश्चय हो चुका था। रह गए मैं और एक छात्र। लगी एक दूसरे से प्रथम पुरूष्कार छीनने का प्रयास करने। प्रतियोगिता का दौर चल रहा था पर द्रोपदी का चीर समाप्त होने में नहीं आ रहा था। इस बीच मुझे एक उपाय सूझा। मैंने एक गिलास पानी मांगा। पानी आने तक विश्राम चाहा। दो क्षण सुस्ताने को सोचने को मिले। मुझे म से बोलना था। एक पंक्ति स्वयं बना डाली-
मन वचन कर्म से करें कृतार्थ। 
सदा रहो जीवन कृतज्ञ।।  
ज्ञ पर अपने को विचलित देख उस छात्र का अध्यापक चिल्ला उठे यह पद गलत है। पर निर्णायक त्रिमूर्ति ने उनकी बात नहीं मानी। घड़ी टिक-टिक कर चलती रही सेकंड समाप्ति पर आया। इधर निर्णायक ने घंटी बजाई 5 से 4 मिनट के वाद विवाद में निर्णय हुआ कि लड़का तभी हारा माना जाएगा जब लड़की ज्ञ पर बोल दे। मैं पहले से ही तैयार थी। लड़के के अध्यापक की ओर इशारा करके बोली-
ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की।
एक दूसरे से ना मिल सके यह विडंबना है जीवन की।। 
हाल तालियों से गूंज उठा। मेरा चेहरा चमक उठा। सपना साकार हुआ, पुष्पाहार पहनाया गया, फोटो खींचे गए। 1001 रुपये दिए गए। स्कूल की ओर से डॉ. गुप्ता ने शील्ड प्रदान की।
अपनी बुद्धि से जीती हुई उस प्रतियोगिता को भूल पाना संभव नहीं मेरे लिए।

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