Wednesday, 20 February 2019

छात्र और अनुशासन पर निबंध या विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का महत्व

छात्र और अनुशासन पर निबंध या विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का महत्व

प्रस्तावना- विद्यार्थी देश का भविष्य हैं। देश के प्रत्येक प्रकार का विकास विद्यार्थियों पर ही निर्भर है। विद्यार्थी जाति, समाज और देश का निर्माता होता है अतः विद्यार्थी का चरित्र उत्तम होना बहुत आवश्यक है। उत्तम चरित्र अनुशासन से ही बनता है। अनुशासन जीवन का प्रमुख अंग और विद्यार्थी जीवन की आधारशिला है। व्यवस्थित जीवन व्यतीत करने के लिए. मात्र विद्यार्थी ही नहीं अपितु प्रत्येक मनुष्य के लिए अनुशासित होना अति आवश्यक है। आज विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता की शिकायत सामान्य सी बात हो गयी है। इससे शिक्षा-जगत् ही नहीं, अपितु सारा समाज प्रभावित हुआ है।

विद्यार्थी और विद्या- "विद्यार्थी" का अर्थ है- ‘'विद्या का अर्थी’' अर्थात् विद्या प्राप्त करने की कामना करने वाला। विद्या लौकिक` या सांसारिक' जीवन की सफलता का मूल आधार है, जो गुरु-कृपा से प्राप्त होती हैं।

संसार' में विद्या सवाधिक' मूल्यवान वस्तु है जिस पर मनुष्य के भावी जीवन का सम्पूर्ण विकास तथा सम्मूर्ण उन्नति निर्भर करती है। इसी कारण महाकवि भर्तृहरि विद्या की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि "विद्या ही मनुष्य का श्रेष्ठ स्वरूप है-विद्या भली-भाँति छिपाया हुआ धन है ( जिसे दूसरा चुरा नहीं सकता ) । विद्या ही सांसारिक भोगो को तथा यश और सुख को देने वाली है विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विद्या ही श्रेष्ठ देवता हैं। राजदरबार मेँ विद्या ही आदर दिलाती हैं, धन नहीँ अत: जिसमें विद्या नहीं, वह निरा पशु है।' इस अमूल्य विद्यारूपी रत्न को पाने के लिए जो मूल्य चुकाना पड़ता है, वह है तपस्या। इस तपस्या का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कवि कहता है
सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्या विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम।।
अनुशासन का स्वरूप और महत्त्व- अनुशासन' का अर्थ है- बड़ो की आज्ञा  (शासन) के अनुसार (अनु) चलना। 'अनुशासन' का अर्थ वह मर्यादा हैं जिनका पालन ही विद्या प्राप्त करने और उसका उपयोग करने के लिए अनिवार्य होता है। अनुशासन को भाव सहज रूप से विकसित किया जाना चाहिए। थोपे जाने पर अथवा बलपूर्वक पालन कराये जाने पर यह लगभग अपना उद्देश्य खो देता है। विद्यार्थियो के प्रति प्राय: सभी को यह शिकायत रहती हैं कि वे अनुशासनहीन होते जा रहे हैं  किन्तु शिक्षक वर्ग को भी इसका कारण ढूंढना चाहिए कि क्यों विद्यार्थियो को उनमें श्रद्धा विलुप्त होती  जा रही है।

अनुशासनहीनता के कारण- वस्तुत: विद्यार्थियों  में अनुशासनहीनता एक दिन में पैदा नहीं हुई है। इसके अनेक कारण हैं, जिन्हें मुख्यत: निम्नलिखित चार वर्गों में बाँटा जा सकता है  
(क) पारिवारिक कारण- बालक की पहली पाठशाला उसका परिवार है। मातापिता के आचरण का बालक पर गहरा प्रभाव पडता है। आज बहुत से  ऐसे परिवार  हैं जिनमें माता-पिता दोनों नौकरी  करते हैं या अलग-अलग व्यस्त रहते हैं। इससे बालक उपेक्षित होकर विद्रोही बन जाता है
(ख) सामाजिक कारण- विद्यार्थी जब समाज में चतुर्दिक व्याप्त भ्रष्टाचार, घूसखोरी, सिफारिशबाजी, भाई-भतीजावाद, फैशनपरस्ती, विलासिता अर्थात् हर स्तर पर व्याप्त अनैतिकता को देखता है तो वह विद्रोह कर उठता है और अध्ययन की उपेक्षा करने लगता है।
(ग) राजनीतिक कारण- छात्र-अनुशासनहीनता का एक बहुत बड़ा कारण दूषित राजनीति है। आज़ राजनीति जीवन के हर क्षेत्र पर छा गयी है। सारे वातावरण को इसने इतना विषाक्त कर दिया है कि स्वस्थ वातावरण में साँस लेना कठिन हो गया है।  
(घ) शैक्षिक कारण- छात्र-अनुशासनहीनता का कदाचित् सबसे प्रमुख कारण यही है। अध्ययन के लिए आवश्यक अध्ययन-सामाग्री¸ भवन एवं अन्यान्य सुविधाओं का अभाव¸कर्त्तव्यपरायण एवं चरित्रवान् शिक्षकों के स्थान पर अयोग्य¸ अनैतिक और  भ्रष्ट अध्यापकों की नियुक्ति, अध्यापकों द्वारा छात्रों की कठिनाइयों की उपेक्षा करके ट्यूशन आदि के चक्कर में लगे रहना या मनमाने ढंग से कक्षाएँ लेना आदि छात्र अनुशासनहीनता के प्रमुख शैक्षिक कारण हैं।

निवारण के उपाय- यदि शिक्षकों को नियुक्त करते समय सत्यता, योग्यता और ईमानदारी का आकलन अच्छी प्रकार कर लिया जाए तो प्राय: यह समस्या उत्पन्न ही न हो। प्रभावशाली, गरिमामण्डित, विद्वान् और प्रसन्नचित्त शिक्षक के सम्मुख विद्यार्थी सदैव अनुशासनबद्ध रहते हैं। पाठ्यक्रम को अत्यंत सुव्यवस्थित व सुनियोजित्त, रोचक, ज्ञानवर्धक एवं विद्यार्थियों के मानसिक स्तर के अनुरूप होना चाहिए।

छात्र-अनुशासनहीनता के उपर्युक्त कारणों को दूर करके ही हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं। सबसे पहले वर्त्तमान शिक्षा-व्यवस्था क्रो इतना व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए कि शिक्षा पूरी करके विद्यार्थी अपनी आजीविका के विषय में पूर्णत: निश्चिन्त हो सके। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी  के स्थान पर मातृभाषा हो। शिक्षा सस्ती की जाए और निर्धन किन्तु योग्य छात्रों को निःशुल्क उपलब्ध  करायी जाए। परीक्षा-प्रणाली स्वच्छ हो, जिससे योग्यता का सही और निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके।

उपसंहार- छात्रों के समस्त असन्तोषों का जनक अन्याय है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से अन्याय को मिटाकर ही देश में सच्ची¸सुख-शान्त लायी जा सकती है। छात्र-अनुशासनहीनता का मूल कारण भ्रष्ट राजनीति¸समाज¸परिवार और दूषित शिक्षा-प्रणाली में निहित है। इनमें सुधार लाकर ही हम विद्यार्थियों में व्याप्त अनुशासनहीनता की समस्या का स्थायी समाधान ढूँढ सकते हैं।
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