Friday, 7 December 2018

श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी - Srinivas Ramanujan Biography in Hindi

श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी - Srinivas Ramanujan Biography in Hindi

Srinivas Ramanujan Biography in Hindi
Srinivas Ramanujan

मद्रास (चेन्नई) प्रान्त के तन्जौर जिले के इरोड नामक छोटे से गाँव के स्कूल की घटना है। प्रारम्भिक कक्षा के अध्यापक कक्षा में आए। उन्होंने विद्यार्थियों को कार्य दिया- ‘‘आधे घण्टे में एक से सौ तक की सब संख्याओं का जोड़ निकालकर मुझे दिखाइए।’’ सारे बच्चे सवाल हल करने में लग गए। दस मिनट भी न बीते होंगे कि सात वर्ष का एक विद्यार्थी सवाल हल कर गुरुजी से जाँच कराने ले आया। गुरुजी ने सवालों को जाँचा और सही उत्तर पाया। शिक्षक यह देखकर हैरान रह गए कि बालक ने सवाल हल करने में जिस सूत्र का प्रयोग किया है, उसका ज्ञान केवल उच्च कक्षा के विद्यार्थी को ही हो सकता है।
अध्यापक ने बालक से पूछा- ‘‘बेटा, तुमने यह सूत्र कहाँ से सीखा ?’’ बालक बोला, ‘‘किताब से पढ़कर।’’
अध्यापक इस बात को जानकर आश्चर्यचकित रह गए कि बालक ने इस सूत्र का ज्ञान किसी बड़ी कक्षा की पुस्तक को पढ़कर किया है। गणित की यह विलक्षण प्रतिभा वाले बालक श्रीनिवास रामानुजन आयंगर थे, जिन्होंने सिद्ध कर दिया कि गणित एक रोचक विषय है जिसका खेल-खेल में अध्ययन किया जा सकता है।

नाम
श्रीनिवास रामानुजन आयंगर
जन्म
22 दिसम्बर 1887
जन्म स्थान
इरोड गांव, मद्रास
पिता का नाम
श्रीनिवास अय्यंगर
माता का नाम
कोमलताम्मल
मृत्यु
26 अप्रैल, 1920

श्रीनिवास रामानुजन आयंगर का जन्म तमिलनाडु के इरोड गाँव में 22 दिसम्बर 1887 ईसवी को एक साधारण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीनिवास अय्यंगर और माता का नाम कोमलताम्मल था। बाल्यकाल से ही रामानुजन की गणित में विशेष रुचि थी। वे गणित को खेल मानकर संख्याओं से खेलते रहते। मैजिक वर्ग (समयोगदर्शी) बनाना उनका प्रिय शौक था। रामानुजन की गणित में विलक्षण प्रतिभा को देखकर अध्यापकों को यह विश्वास हो गया कि वे एक दिन गणित में विशेष कार्य करेंगे।

गणित में विशेष रुचि के कारण रामानुजन बड़ी कक्षाओं की गणित की किताबें भी माँग कर पढ़ लेते थे। वह स्लेट पर प्रश्नों को हल किया करते थे। ऐसा इसलिए करते थे जिससे कॉपी का खर्च बच जाय।

रामानुजन जब हाईस्कूल में पढ़ रहे थे तो एक हितैषी ने उन्हें ‘जार्जशुब्रिज’ की उच्च गणित की एक पुस्तक उपहार स्वरुप भेंट की। रामानुजन रात-दिन उस पुस्तक के अध्ययन में तल्लीन हो गए। सोलह वर्ष की आयु में रामानुजन ने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्हें छात्रवृत्ति मिलने लगी। गणित को अन्य विषयों की अपेक्षा अधिक समय देने के कारण वह एफ0 ए0 (इण्टर प्रथम वर्ष) की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गए। परिणामस्वरुप उन्हें छात्रवृत्ति मिलनी बन्द हो गई। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। अतः उन्होंने प्राइवेट परीक्षा दी किन्तु असफल रहे। उन्होंने असफलता से हार नहीं मानी और घर पर रहकर ही गणित पर मौलिक शोध करना प्रारम्भ कर दिया।

इसी बीच रामानुजन का विवाह हो गया। वह जीविकोपार्जन के लिए नौकरी तलाशने लगे। बड़ी मुश्किल से ‘मद्रास ट्रस्ट पोर्ट’ के दफ्तर में उन्हें क्लर्क की नौकरी मिल गई। दफ्तर में मध्यावकाश के समय उनके अन्य साथी जलपान के लिये बाहर चले जाते तब भी वे अपनी सीट पर बैठे गणित के प्रश्न हल करते रहते । 

प्रोफेसर हार्डी से उनका परिचय और विदेश गमन : एक दिन उनके कार्यालय के अधिकारी ने उन्हें देख लिया। पूछ-ताछ करने पर पता चला कि रामानुजन गणित के कुछ सूत्र लिख रहे हैं। उनकी मेज की दराज खोलने पर ऐसे तमाम पन्ने मिले जो गणित के सूत्रों से भरे पड़े थे। अधिकारी ने उन सूत्रों को पढ़ कर स्वयं को धिक्कारा ”क्या यह प्रतिभाशाली युवक क्लर्क की कुर्सी पर बैठने लायक है ?“ उसने रामानुजन के उन पन्नों को इंग्लैण्ड के महान गणितज्ञ प्रोफेसर जी0 एच0 हार्डी के पास भेज दिया। प्रो0 हार्डी उन पन्नों को देख कर अत्यन्त प्रभावित हुए और इस नतीजे पर पहुँचे कि रामानुजन जैसी प्रतिभा को अन्धेरे से बाहर निकालना ही चाहिए। उन्होंने प्रयास करके रामानुजन को इंग्लैण्ड बुलाया और बड़े-बड़े गणितज्ञों से उनका परिचय कराया। शीघ्र ही रामानुजन के कुछ शोध पत्र वहाँ की पत्र पत्रिकाओं मे प्रकाशित हुये जिन्हें पढ़ कर पाश्चात्य जगत के विद्वान आश्चर्य चकित रह गए। प्रोफेसर हार्डी ने महसूस किया कि रामानुजन का गणित के कुछ क्षेत्रों मे पूर्ण अधिकार है, लेकिन कुछ की कम जानकारी है। उन्हें कम जानकारी वाली चीजें पढ़ाने का उत्तरदायित्व प्रो0 हार्डी ने स्वयं ले लिया। हार्डी ने जितना रामानुजन को पढ़ाया उससे ज्यादा रामानुजन से सीखा भी। प्रोफेसर हार्डी ने एक जगह लिखा है- ” मैंने रामानुजन को पढ़ाने की कोशिश की और किसी हद तक इसमें सफल भी हुआ लेकिन रामानुजन को मैंने जितना सिखाया, उससे ज्यादा उनसे सीखा भी।“

रामानुजन इंग्लैण्ड में रहते हुये भी खान पान, आचार-विचार और व्यवहार में पूर्णतः भारतीय बने रहे। गणित के क्षेत्र में निरन्तर शोध कार्यों से उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ती गई। इंग्लैण्ड की प्रसिद्ध संस्था,’रॉयल सोसाइटी’ जो वैज्ञानिक शोधों को प्रोत्साहित करती थी, ने वर्ष 1918 ई0 में रामानुजन को अपना फेलो (सम्मानित सदस्य) बनाकर सम्मानित किया। सम्पूर्ण एशिया में इस सम्मान से सम्मानित होने वाले ये पहले व्यक्ति थे।

मृत्यु : निरन्तर मानसिक श्रम और खान-पान में लापरवाही से उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा।बीमारी की हालत में भी वह गणितीय सूत्रों से खेलते रहे। आखिर रोगी शरीर कब तक चलता। वह स्वदेश लौट आये और 26 अपै्रल, 1920 को 33 वर्ष की अल्पायु में ही चिर निद्रा में विलीन हो गए। उनके निधन पर प्रोफेसर हार्डी ने कहा था, ”आज हमारे बीच से अमूल्य हीरा खो गया। हम सब देख चुके हैं कि रामानुजन से पूर्व संसार में किसी भी व्यक्ति द्वारा इतनी कम आयु में गणित जैसे जटिल समझे जाने वाले विषय पर इतनी अधिक खोज नहीं की गई है।“

वास्तव में रामानुजन ने इतनी कम उम्र में गणित में जो योगदान दिया, वह अभूतपूर्व है। उन्होंने अपने जीवनकाल में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। उनके द्वारा दिए गए अधिकांश प्रमेय गणितज्ञों द्वारा सही सिद्ध किये जा चुके हैं। ऐसे महान गणितज्ञ पर हम सब भारतीयों को गर्व है।

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