Friday, 7 September 2018

नर हो ना निराश करो मन को पर अनुच्छेद लेखन

नर हो ना निराश करो मन को पर अनुच्छेद लेखन

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‘नर’ संज्ञा का सामान्य अर्थ ‘पुरुष’ होता है, जबकि विशेष अर्थ-समर्थ या हर प्रकार से शक्तिशाली लिया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि नर अर्थात पुरुष या मनुष्य सब प्रकार से और सब कुछ कर पाने में समर्थ प्राणी है। जो सबसे समर्थ, सब कुछ कर पाने में समर्थ है, वह यदि किसी कारणवश उदास या निराश होकर बैठ जाता है तो वास्तव में यह बड़ी शर्म की बात है। हार-जीत या सफलता-असफलता तो मनुष्य जीवन के साथ लगी हुई है। अगर वह निराश होकर बैठा नहीं रहता, किसी भी अवस्था में हार नहीं मानता, तो कोई कारण नहीं कि वह हार और असफलता को अपनी विजय एवं सफलता में ना बदल सके। बच्चे गिर-गिरकर ही चलना सीखते हैं। सफल और पक्के घुड़सवार कई-कई बार गिरने-उठने के बाद ही ऐसे बन पाते हैं। आवश्यकता रहा करती है दृढ़ विश्वास और इच्छाशक्ति की। इनके रहने पर अपनी सफलता की राह में अड़ंगा बनने वाले पहाड़ को भी मनुष्य काटकर गिरा सकता है, समुद्र को भी काट सकता है और छलांग लगाकर घने वनों, रेगिस्तानों के पार उतर सकता है। इसके विपरीत जब निराशा व्यक्ति के तन-मन में घर जमा लिया करती है, तब धीरे-धीरे उसके सोचने समझने और कार्य करने की शक्तियां जवाब दे दिया करती हैं। इच्छा शक्ति का अंत हो जाता है। अच्छा भला व्यक्ति निस्तेज हो जाता है। आलसी और निकम्मा बन कर रह जाता है। कुछ भी कर पाने में समर्थ नहीं रह जाता। रोटी-पानी तक के लाले पड़ जाया करते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने और घर परिवार के लिए ही नहीं, समूचे जीवन और समाज के लिए भी एक तरह का बोझ बन कर रह जाता है। सभी प्रकार की हीनताएं और दुर्बलताएं उसे अपना शिकार बना लिया करती है। इस प्रकार निराशा को हम मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु,, सबसे बढ़कर घातक रोग या महामारी कह सकते हैं। विचारवान प्राणी होने के नाते मनुष्य को इन सभी प्रकार की असफलताओं के मूल कारण निराशा को कभी पास फटकने तक नहीं देना चाहिए। हिम्मत से काम ले कर अपनी सफलताओं का रास्ता खुद ही बनाना चाहिए।

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