Tuesday, 21 August 2018

राजगुरु की सवारी तेनालीराम की कहानी। Rajguru ki Sawaari Tenaliram stories in Hindi

राजगुरु की सवारी तेनालीराम की कहानी। Rajguru ki Sawaari Tenaliram stories in Hindi

बात उन दिनों की है जब तेनालीराम का विजयनगर के राजदरबार से कोई संबंध नहीं था। वह किसी भी तरह महाराज तक अपनी पहुंच बनाना चाह रहे थे। मगर यह आसान नहीं था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने राजगुरु तक अपनी पहुंच बनाई और उनकी बहुत सेवा की। राजगुरु तेनालीराम से अपने सारे काम करवा लेते मगर राजमहल की बात आती तो टाल जाते। इससे तेनालीराम काफी दुखी हुए।

वह समझ गए कि राजगुरु मुझे महाराज तक पहुंचने नहीं देना चाहते। अतः एक दिन उसने राजगुरु को सबक सिखाने का मन बना लिया। एक दिन राजगुरु नदी में नहाने गए। किनारे पर जाकर उन्होंने वस्त्र उतारे और पानी में उतर गए। तेनालीराम उनके पीछे-पीछे था। वह पेड़ की ओट में छुप गया और राजगुरु के डुबकी लगाते ही उसने उनके कपड़े उठा लिए और जाकर पेड़ के पीछे छुप गया। कुछ देर बाद जब राजगुरु स्नान करके बाहर निकले तो अपने कपड़े वहां ना पाकर ठिठक गए।
“अरे यह कौन है ? वह चिल्लाया मेरे वस्त्र किसने उठाए हैं ? रामलिंग मैंने तुम्हें देख लिया है। तुम पेड़ के पीछे छिपे हो। देखो मजाक छोड़ो और मेरे कपड़े मुझे दे दो। मैं तुम्हें महाराज तक अवश्य पहुंचाऊंगा।” तेनालीराम का असली नाम राम सिंह ही था। बचपन से लेकर जवानी तक ननिहाल तेनाली में होने के कारण वह तेनालीराम के नाम से प्रसिद्ध हो गया था।

“आप झूठे हैं राजगुरु, आज तक आप मुझे झूठे दिलासे देते रहे हैं।” कहते हुए तेनाली रमन बाहर आ गया। राजगुरु बोले, “इस बार मैं पक्का वादा करता हूं।” तेनालीराम ने कहा, “ठीक है, तो वादा करें कि मुझे इसी वक्त कंधे पर बैठाकर आप राजमहल लेकर जाएंगे।” राजगुरु बोले, “कंधे पर बैठाकर, तुम पागल तो नहीं हो गए हो राम लिंग ?” तेनाली रमन ने कहा –“हां मैं पागल हो गया हूं आप के झूठे आश्वासन पा-पाकर। यदि मेरी शर्त मंजूर हो तो बोलो वरना मैं चला।”

“अरे नहीं नहीं मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।” हथियार डालते हुए राजगुरु बोले –“लाओ मेरे कपड़े मुझे दे दो।” तेनालीराम ने उनके कपड़े उन्हें दे दिए। राजगुरु ने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले, फिर उसे अपने कंधों पर बैठाकर महल की ओर चल पड़े। जब राजगुरु नगर में पहुंचे तो लोग यह विचित्र दृश्य देखकर हैरान थे। लड़के सीटियां और तालियां बजाते उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। चारों ओर शोर मच गया की –“राजगुरु का जुलूस, देखो राजगुरु का जुलूस।” राजगुरु अपने आप को ऐसा अपमानित महसूस कर रहे थे, जैसे भरे बाजार में वह नंगे चले जा रहे हो।

धीरे-धीरे यह काफिला राजमहल के करीब पहुंच गया। महाराज अपने कक्ष में विराजमान थे। शोर सुनकर वह बरामदे में आए, फिर बुर्ज में आकर नीचे का नजारा देखने लगे। उन्होंने देखा कि राजगुरु एक व्यक्ति को अपने कंधों पर बिठाए चले आ रहे हैं, शर्म से उनका सिर झुका हुआ है और शरीर पसीने-पसीने हो रहा है। पीछे आते लोग उनका मजाक उड़ा रहे हैं और कंधे पर बैठा व्यक्ति हंस रहा है। राजगुरु का ऐसा अपमान देखकर राजा को बेहद गुस्सा आया। उन्होंने अपने दो अंगरक्षकों को हुक्म दिया कि जो व्यक्ति राजगुरु के कंधे पर बैठा है, उसे नीचे गिरा दो और खूब पिटाई करके छोड़ दो। मगर दूसरे व्यक्ति को सम्मान सहित हमारे पास ले आओ।

राजगुरु महाराज को नहीं देख पाए, मगर तेनालीराम ने देख लिया कि उनकी ओर इशारा करके महाराज अपने अंगरक्षकों को कुछ बता रहे हैं। तेनालीराम समझ गया कि दाल में कुछ काला है। वह झट से कंधे से उतरा और राजगुरु से क्षमा याचना करके उन्हें अपने कंधे पर उठा लिया और उनकी जय-जयकार करने लगा। तभी राजा के अंगरक्षक वहां पहुंचे, उन्होंने राजगुरु को तेनालीराम के कंधे से नीचे गिरा दिया और बुरी तरह उनकी पिटाई करने लगे। बेचारे राजगुरु पीड़ा और अपमान में दिखने लगे। सैनिकों ने उनकी खूब पिटाई की, फिर तेनालीराम से बोले “आइए, आपको महाराज ने बुलाया है।”

राजगुरु भौचक्के थे कि यह सब क्या हुआ ? अंगरक्षक तेनालीराम को लेकर महाराज के पास पहुंचे तो उसे देखकर महाराज गुस्से से बोले, महाराज, “यह किसे ले आए। हमने ऊपर वाले की पिटाई करने को कहा था और नीचे वाले को लाने को कहा था।” सैनिक बोले, “यह नीचे वाले ही हैं महाराज। वह पाजी तो इनके कंधों पर बैठा था।” महाराज बोले, “ओह, इसका मतलब यह व्यक्ति बहुत धूर्त है। इसने पहले ही अंदाजा लगा लिया कि क्या हो सकता है। इसे ले जाकर मौत के घाट उतार दो। इसने राजगुरु का अपमान किया है।”

उस समय वहां कुछ दरबारी भी आ गए थे। वह ऊपर से गंभीर लेकिन मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे कि इस युवक ने राजगुरु की अच्छी दुर्गति की। जब सैनिक तेनालीराम को लेकर चले तो कुछ दरबारी भी पीछे हो लिए। एक स्थान पर जाकर उन्होंने तेनालीराम से इस दुस्साहस का कारण पूछा तो उन्हें लगा कि तेनालीराम निर्दोष है। उसे किसी प्रकार राजदरबार में लाया जाए ताकि उन्हें राजगुरु और दूसरे बेईमान दरबारियों को सबक सिखाने का अवसर मिले। उन्होंने तेनालीराम से दोनों सैनिकों को दस-दस स्वर्ण मुद्राएं दिलवा कर इस वादे के साथ छुड़वा लिया कि वह नगर छोड़कर चला जाएगा।

सिपाहियों ने तबेले में जाकर एक बकरे को हलाल करके अपने खून से सनी तलवार राजा को दिखा दी। तेनालीराम को अपनी जान बचने की खुशी थी, परंतु बीस स्वर्ण मुद्राओं के जाने का दुख भी था। वह इस बात के लिए किसी भी तरह चुप बैठने वाला नहीं था। उसने अपने घर जाकर अपनी मां और पत्नी को सिखा-पढ़ाकर महल में भेज दिया। दोनों सास-बहू महाराज के पास जाकर फूट-फूट कर रोने लगी। महाराज बोले, “क्या बात है ? तुम कौन हो और यहां आकर तुम्हारे रोने का क्या कारण है ?” तेनालीराम की मां सिसक-सिसक कर रोने लगी और बोली, “महाराज, एक मामूली अपराध के लिए आपने मेरे बेटे रामलिंग को मृत्युदंड दे दिया। अब मैं किसके सहारे जी लूंगी ? कौन होगा मेरे बुढ़ापे का सहारा ?” इसके बाद तेनालीराम की पत्नी बोली, “मेरे इन मासूम बच्चों का क्या होगा महाराज ? मैं अबला इन बच्चों और इस बूढ़ी सास का पेट कैसे बनूंगी ?”

महाराज को फौरन अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्हें लगा कि उस छोटी सी भूल के लिए इतनी बड़ी सजा नहीं देनी चाहिए थी। अब वह कर भी क्या सकता था। उन्होंने आज्ञा दी “इन्हें हर माह दस स्वर्ण मुद्राएं राजकोष से दे दी जाएं जिससे यह अपना व बच्चों का भरण-पोषण कर सकें।” दस स्वर्ण मुद्राएं तत्काल लेकर दोनों सास-बहू घर पहुंची और तेनालीराम को पूरी बात बताई। तेनालीराम खूब हंसा “चलो, दस स्वर्ण मुद्राएं अगले माह मिल जाएंगी अब हुआ हिसाब बराबर।” 

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