Sunday, 19 August 2018

बाघ की सवारी हास्य हिंदी कहानी। Funny Story in HIndi

बाघ की सवारी हास्य हिंदी कहानी। Funny Story in Hindi

Funny Story in HIndi
एक दिन किसी जंगल में भारी बरसात हो रही थी। चारों और घनघोर अंधेरा छाया हुआ था। कभी बिजली भी कड़क उठती। तूफान बहुत जोर का था। तूफान से बहुत सारे पेड़ उखड़ गए थे। एक भाग बाघ भयभीत होकर जंगल से भाग निकला। वह पास के एक गांव में जा पहुंचा और एक झोपड़ी की दीवार के सहारे जा खड़ा हुआ। झोपड़ी के अंदर एक औरत बड़बड़ा रही थी, “सिर्फ दो दिनों के लिए आराम मिला। अब ये टपटपी फिर से आ गई।” 

बारिश के कारण उसकी झोपड़ी चू रही थी। उसे मेज, बक्से और बर्तन इधर-उधर खिसकाने पड़ रहे थे। ढूम ढाम... ढूम ढाम... उसके टकराने की आवाज़ आ रही थी, जिससे दीवारें हिल रही थी। बाघ डर गया। टपटपी ! भला यह क्या है ? जब उसकी आवाज ही इतनी डरावनी है, तो वह जरूर बहुत भयानक होगी, “बाघ को कुछ समझ में नहीं आया। 

तभी गांव का भोलेनाथ अपने गधे को ढूंढता हुआ वहां आया। उसने बुढ़िया के घर की दीवार से लगकर खड़े हुए एक जानवर को देखा। घने अंधेरे में उसे लगा कि वह उसका गधा है। वह गुस्से में उसका कान खींचता हुआ चिल्लाया, “क्या तुम्हारा दिमाग खराब है ? इस बारिश में तुम्हें कहां-कहां ढूंढता फिरूं ? चल, अब चुपचाप घर चल।” वह बाघ पर चढ़ बैठा और उसकी सवारी करते हुए चल पड़ा। 

आज तक बाघ के कान किसी ने भी इस तरह नहीं मरोड़े थे। बाघ डर से कांपने लगा। टपटपी के डर से वह कुछ नहीं बोला। चुपचाप चलता रहा। घर पहुंचते ही भोलेनाथ ने उसे घर के सामने रस्सी से बांध दिया और घर के अंदर सोने चला गया। अगले दिन सुबह होते ही भोलेनाथ की पत्नी बाहर आई। घर के सामने बंधे हुए बाघ को देखकर वह जोर से चीख उठी। चीख सुनकर भोलेनाथ दौड़ा आया। बाघ को देखकर वह भी चिल्लाते हुए घर के अंदर घुस गया। दरवाजे को अंदर से बंद कर लिया। 

गांव वाले भोलेनाथ के घर के सामने बंधे बाघ को देखकर चारों तरफ दौड़ने लगे। इस झमेले में भौचक्के बाघ ने रस्सी को काट लिया और बचकर जंगल में भाग गया। “भोलेनाथ ने बाघ की सवारी की” - यह खबर गांव में चारों तरफ फैल गई। सभी उससे मिलने आने लगे। आश्चर्य के साथ उससे पूछने लगे कि सुना है तुमने बाघ की सवारी की ? भोलेनाथ ने बड़े गर्व से कहा, “सिर्फ उसकी सवारी ही नहीं की बल्कि मैंने तो उसके कान भी मरोड़े।” 

यह खबर राजा के कानों तक पहुंची। राजा ने भोलेनाथ को पुरस्कार देकर सम्मानित किया। कुछ महीने बीत गए। दुश्मन देश के सैनिकों ने राज्य पर हमला कर दिया। राजा ने फौरन ही मंत्री को हुक्म दिया, “जिस बहादुर व्यक्ति ने बाघ की सवारी की थी, उसे तुरंत दुश्मनों का मुकाबला करने भेजो। वह शत्रुओं को तहस-नहस कर देगा। जाओ और उसे यह शक्तिशाली घोड़ा भी दे दो।” भोलेनाथ राजा का हुक्म सुनकर परेशान हो गया। उसने सोचा, “अब कोई रास्ता नहीं है। मुझे युद्ध में जाना ही होगा।” 

उसने पहले कभी घोड़े की सवारी नहीं की थी। बड़ी मुश्किल से घोड़े पर बैठते हुए उसने अपनी पत्नी से कहा, “इससे पहले कि मैं गिर जाऊं, मुझे घोड़े पर कसकर बांध दो।” उसकी पत्नी ने उसके हाथ, पाँव और पूरे शरीर को घोड़े से कसकर बांध दिया। घोड़ा तेजी से भागने लगा। खेतों, नदियों को पार करते हुए वह शत्रुओं की सेना की ओर दौड़ा। “हाय रे ! उधर मत जाओ !” भोलेनाथ जोर से चिल्लाया। उसे समझ में नहीं आया कि घोड़े को कैसे रोके ? घबराहट में उसने अपने दोनों हाथ उठाएं और एक पेड़ की शाखा को पकड़ लिया। मगर घोड़ा भागता ही रहा। 

मिट्टी गीली होने के कारण पेड़ उखड़कर भोलेनाथ के हाथों में आ गया। शत्रुओं ने एक वृक्ष को हाथों में घुमाते हुए तेजी से उनकी तरफ आ रहे भोलेनाथ को देखा। उनमें से एक बोला, “अरे उस शक्तिशाली व्यक्ति को देखो। उसने पेड़ को भी भी उखाड़ लिया। हमसे युद्ध करने चला आ रहा है। निश्चय ही वह वही व्यक्ति है जिसने बाघ पर सवारी की थी।” वह सब के सब अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। थोड़ी देर के बाद घोड़ा एक झटका मारकर रुक गया। रस्सी टूट गई और भोलेनाथ गिर पड़ा। सौभाग्यवश तब वहां कोई भी नहीं था। भोलेनाथ बड़बड़ाया, “भगवान का शुक्र है कि मेरी जान बच गई।” 

वह घोड़े को लेकर चलते हुए अपने घर की तरफ बढ़ा। वह भला अब कहां घोड़े की सवारी करता। लोगों ने उसे वापस पैदल आते हुए देखा। आश्चर्य से वह सभी बोले, “देखो उसने अकेले ही सभी शत्रुओं को हरा दिया, इतना बड़ा काम करने के बाद भी वह एक साधारण व्यक्ति की तरह ही चल रहा है।” कितना महान है भोलेनाथ।

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