Friday, 6 July 2018

हाथी और खरगोश की कहानी। Hathi aur khargosh ki kahani

हाथी और खरगोश की कहानी। Hathi aur khargosh ki kahani

Hathi aur khargosh ki kahani

एक जंगल में हाथियों का एक झुंड रहता था। झुंड का एक सरदार था, जिसे गजराज कहते थे। गजराज विशालकाय था, लंबी सूंड थी और लंबे मोटे दांत थे। खंभे के समान मोटे-मोटे पैर थे। चिंघाड़ता था, तो सारा जंगल गूंज उठता था। 

गजराज अपने झुंड के हाथियों को बड़ा प्यार करता था। स्वयं कष्ट उठा लेता था, पर झुंड के किसी भी हाथी को कष्ट में नहीं पड़ने देता था। झुण्ड के सारे हाथी भी गजराज के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे। एक बार जलवृष्टि ना होने के कारण जंगल में जोरों का अकाल पड़ा। नदियां, सरोवर सूख गए। वृक्ष और लताएँ भी सूख गई। पानी और भोजन के अभाव में पशु-पक्षी जंगल को छोड़कर भाग खड़े हुए। जंगल में चीख-पुकार होने लगी, हाय-हाय होने लगी।

गजराज के झुंड के हाथी भी अकाल के शिकार होने लगे। वे भी भोजन और पानी ना मिलने से तड़प-तड़प कर मरने लगे। झुंड के हाथियों का बुरा हाल देखकर गजराज बड़ा दुखी हुआ। वह सोचने लगा, कौन सा उपाय किया जाए, जिससे हाथियों के प्राण बच जाएं।

एक दिन गजराज ने तमाम हाथियों को बुलाकर उनसे कहा, “इस जंगल में ना तो भोजन है, ना ही पानी है। तुम सब दूसरी-दूसरी दिशा में जाओ, भोजन और पानी की खोज करो।” हाथियों ने गजराज की आज्ञा का पालन किया। हाथी भिन्न-भिन्न दिशाओं में चले गए।

एक हाथी ने लौटकर गजराज को सूचना दी, “यहां से कुछ दूरी पर एक दूसरा जंगल है। वहां पानी की बहुत बड़ी झील है। जंगल के वृक्ष फूलों और फलों से लदे हुए हैं। गजराज बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने हाथियों से कहा, “अब हमें देर ना करके तुरंत उसी जंगल में पहुंच जाना चाहिए, क्योंकि वहां भोजन और पानी दोनों है।

गजराज हाथियों के साथ उस जंगल में चला गया। हाथी वहां भोजन और पानी पाकर बड़े प्रसन्न हुए। उस जंगल में खरगोशों की एक बस्ती में बहुत से खरगोश रहते थे। हाथी खरगोशों की बस्ती से ही होकर झील में पानी पीने जाया करते थे। जब वे खरगोशों की बस्ती से निकलते, तो छोटे-छोटे खरगोश उनके पैरों के नीचे आ जाते थे। कुछ खरगोश तो मर जाते थे और जो बचते थे, वे घायल हो जाते थे।

रोज-रोज खरगोशों को मरते और घायल होते देखकर खरगोशों की बस्ती में खलबली मच गई। खरगोश सोचने लगे, यदि वे हाथियों के पैरों से इसी तरह कुचले जाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब उनका खात्मा हो जाएगा। अपनी रक्षा का उपाय सोचने के लिए खरगोशों ने एक सभा बुलाई। सभा में बहुत से खरगोश इकट्ठे हुए। खरगोशों के सरदार ने हाथियों के अत्याचारों का वर्णन करते हुए कहा, “क्या हम में से कोई ऐसा है, जो अपनी जान पर खेलकर हाथियों का अत्याचार बंद करवा सके?

सरदार की बात सुनकर एक खरगोश बोल उठा, “यदि मुझे खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेजा जाए, तो मैं हाथियों के अत्याचार को बंद करा सकता हूं।” सरदार ने खरगोश की बात मान ली और उसे खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेज दिया।

खरगोश गजराज के पास जा पहुंचा। वह हाथियों के बीच में खड़ा था। खरगोश ने सोचा, वह गजराज के पास पहुंचे तो किस तरह पहुंचे। अगर वह हाथियों के बीच में से घुसता है, तो हो सकता है, हाथी उसे पैरों से कुचल दे। यह सोचकर वह पास ही की एक ऊंची चट्टान पर चढ़ गया। चट्टान पर खड़ा होकर उसने गजराज को पुकारा, “गजराज मैं चंद्रमा का दूत हूं ! चंद्रमा के पास से तुम्हारे लिए एक संदेश लाया हूं।”

चंद्रमा का नाम सुनकर, गजराज खरगोश की ओर आकर्षित हुआ। उसने खरगोश की ओर देखते हुए कहा, “क्या कहा तुमने? तुम चंद्रमा के दूत हो? तुम चंद्रमा के पास से मेरे लिए क्या संदेश लाए हो?”

खरगोश बोला, “हां गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूँ। चंद्रमा ने तुम्हारे लिए संदेश भेजा है। सुनो, तुमने चंद्रमा की झील का पानी गंदा कर दिया है। तुम्हारे झुंड के हाथी खरगोशों को पैरों से कुचल-कुचलकर मार डालते हैं। चंद्रमा खरगोशों को बहुत प्यार करते हैं, उन्हें अपनी गोद में रखते हैं। चंद्रमा तुमसे बहुत नाराज हैं। तुम सावधान हो जाओ। नहीं तो चंद्रमा तुम्हारे सारे साथियों को मार डालेंगे।

खरगोश की बात सुनकर गजराज भयभीत को उठा। उसने खरगोश को सचमुच चंद्रमा का दूत मानकर, उसकी बात को सच समझ लिया। उसने डर कर कहा, “यह तो बड़ा बुरा संदेश है। तुम मुझे फौरन चंद्रमा के पास ले चलो, मैं उनसे अपने अपराधों की क्षमा याचना करूंगा।”

खरगोश गजराज को चंद्रमा के पास ले जाने के लिए तैयार हो गया। उसने कहा, “मैं तुम्हें चंद्रमा के पास ले सकता हूं, पर शर्त यह है कि तुम अकेले ही चलोगे।” गजराज ने खरगोश की बात मान ली। पूर्णिमा की रात थी। आकाश में चंद्रमा हंस रहा था। खरगोश गजराज को लेकर झील के किनारे गया। उसने गजराज से कहा, “मिलो चंद्रमा से।”
खरगोश ने झील के पानी की ओर संकेत किया। पानी में पूर्णिमा के चंद्रमा की परछाई साफ-साफ दिखाई पड़ रही थी। गजराज ने परछाई को ही चंद्रमा मान लिया। गजराज ने चंद्रमा से क्षमा मांगने के लिए अपनी सूंड पानी में डाल दी। पानी में लहरें पैदा होते ही, परछाई अदृश्य हो गई।

गजराज बोल उठा, “दूत, चंद्रमा कहां चले गए?” खरगोश ने उत्तर दिया, “चंद्रमा तुमसे नाराज हैं, तुमने झील के पानी को अपवित्र कर दिया है। तुमने खरगोशों की जान लेकर पाप किया है इसलिए चंद्रमा तुमसे मिलना नहीं चाहते। गजराज ने खरगोश की बात सच मान ली। उसने डर कर कहा, “क्या कोई ऐसा उपाय है, जिससे चंद्रमा मुझसे प्रसन्न हो सकते हैं?”

खरगोश बोला, “हां, है ! तुम्हें प्रायश्चित करना होगा। तुम्हें कल सवेरे ही अपने झुंड के हाथियों को लेकर यहां से दूर चले जाओ। चंद्रमा तुम पर प्रसन्न हो जाएंगे।” गजराज प्रायश्चित करने के लिए तैयार हो गया। वह दूसरे ही दिन हाथियों के झुंड सहित वहां से चला गया। इस तरह खरगोश की बुद्धिमानी ने बलवान गजराज को धोखे में डाल दिया और उसने अपनी बुद्धिमानी के बल से ही खरगोशों को मृत्यु के मुख से जाने से बचा लिया।

कहानी से शिक्षा :
1- बुद्धि के बिना बल व्यर्थ होता है।
2- बलवान शत्रु को बल से नहीं बुद्धि से ही जीतना चाहिए।

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