Sunday, 15 July 2018

गरुड़ध्वज नाटक का सारांश

गरुड़ध्वज नाटक का सारांश

garuda dhwaja natak ka saransh

पंडित लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित नाटक गरुड़ध्वज के प्रथम अंक की कहानी का प्रारंभ विदिशा में कुछ प्रहरियों के वार्तालाप से होता है। पुष्कर नामक सैनिक, सेनापति विक्रम मित्र को महाराज शब्द से संबोधित करता है, तब नागसेन उसकी भूल की ओर संकेत करता है। वस्तुतः विक्रममित्र स्वयं को सेनापति के रूप में ही देखते हैं और शासन का प्रबंध करते हैं। विदिशा शुंगवंशीय विक्रममित्र की राजधानी है, जिसके वह योग्य शासक हैं। उन्होंने अपने साम्राज्य में सर्वत्र सुख-शांति स्थापित की हुई है और बृहद्रथ को मारकर तथा गरुड़ध्वज की शपथ लेकर राज्य का राजकाज संभाला है। काशीराज की पुत्री वासंती मलयराज की पुत्री मलयवती को बताती है कि उसके पिता उसे किसी वृद्ध यवन को सौंपना चाहते हैं, तब सेनापति विक्रममित्र ने ही उसका उद्धार किया था। वासंती एकमोर नामक युवक से प्रेम करती है और वह आत्महत्या करना चाहती है, लेकिन विक्रममित्र की सतर्कता के कारण वह इसमें सफल नहीं हो पाती। 

श्रेष्ठ कवि एवं योद्धा कालिदास विक्रममित्र को आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा के कारण “भीष्म पितामह” कहकर संबोधित करते हैं और इस प्रसंग में एक कथा सुनाते हैं। 87 वर्ष की अवस्था हो जाने के कारण विक्रम मित्र वृद्ध हो गए हैं। वह वासंती और एकमोर को महल भेज देते हैं। मलयवती के कहने पर पुष्कर को इस शर्त पर क्षमादान मिल जाता है कि उसे राज्य की ओर से युद्ध लड़ना होगा। उसी समय साकेत से एक यवन श्रेष्ठि की कन्या कौमुदी का सेनानी देवभूति द्वारा अपहरण किए जाने तथा उसे लेकर काशी चले जाने की सूचना मिलती है। सेनापति विक्रममित्र कालिदास को काशी पर आक्रमण करने के लिए भेजते हैं और यही पर प्रथम अंक समाप्त हो जाता है। 

द्वितीय अंक का सारांश
नाटक का द्वितीय अंक राष्ट्रहित में धर्म स्थापना के संघर्ष का है। इसमें विक्रममित्र की दृढ़ता एवं वीरता का परिचय मिलता है, साथ ही उनके कुशल नीतिज्ञ एवं एक अच्छे मनुष्य होने का भी बोध होता है। इसमें मांधाता सेनापति विक्रममित्र को अन्तिलिक के मंत्री हलोधर के आगमन की सूचना देता है। कुरु प्रदेश के पश्चिम में तक्षशिला राजधानी वाला यवन प्रदेश का शासक शुंगवंश से भयभीत रहता है। उसका मंत्री हलोधर भारतीय संस्कृति में आस्था रखता है। वह राज्य की सीमा को वार्ता द्वारा सुरक्षित करना चाहता है। विक्रममित्र देवभूति को पकड़ने के लिए कालीदास को काफी भेजने के बाद बताते हैं, कि कालिदास का वास्तविक नाम मेघरुद्र था, जो 10 वर्ष की आयु में ही बौद्ध भिक्षु बन गया था। उन्होंने उसे विदिशा के महल में रखा और उसका नया नाम कालिदास रख दिया। 

काशी का घेरा डालकर कालिदास काशीराज के दरबार में बौद्ध आचार्यों को अपनी विद्वता से प्रभावित कर लेते हैं तथा देवभूति एवं काशीराज को बंदी बनाकर विदिशा ले आते हैं। विक्रममित्र एवं हलोधर के बीच संधि वार्ता होती है, जिसमें हलोधर विक्रममित्र की सारी शर्तें स्वीकार कर लेता है तथा अन्तिलिक द्वारा भेजी गई भेंट विक्रममित्र को देता है। भेंट में स्वर्ण निर्मित एवं रत्नजडित गरुड़ध्वज भी है। वह विदिशा में एक शांति स्तंभ का निर्माण करवाता है। इसी समय कालिदास के आगमन पर वासंती उसका स्वागत करती है और वीणा पर पड़ी पुष्पमाला कालिदास के गले में डाल देती है। इसी समय द्वितीय अंक का समापन होता है। 

तृतीय अंक का सारांश
नाटक के तृतीय अंक की कथा अवंति में घटित होती है। गर्दभिल्ल के वंशज महेंद्रादित्य के पुत्र कुमार विषमशील के नेतृत्व में अनेक वीरों ने शकों को हाथों से मालवा को मुक्त कराया। अवंती में महाकाल के मंदिर पर गरुड़ध्वज फहरा रहा है तथा मंदिर का पुजारी वासंती एवं मलयवती को बताता है कि युद्ध की सभी योजनायें इसी मंदिर में बनी हैं। राजमाता से विषमशील के लिए चिंतित ना होने को कहा जाता है, क्योंकि सेना का संचालन स्वयं कालिदास एवं मांधाता कर रहे हैं। 

काशीराज अपनी पुत्री वासंती का विवाह कालिदास से करना चाहते हैं, जिसे विक्रममित्र स्वीकार कर लेते हैं। विषमशील का राज्याभिषेक किया जाता है और कालिदास को मंत्रीपद सौंपा जाता है। राजमाता जैनाचार्यों को क्षमादान देती है और जैनाचार्य अवंति का पुनर्निर्माण करते हैं। 

कालिदास की मंत्रणा से विषमशील का नाम विक्रममित्र के नाम के पूर्व अंश “विक्रम” तथा पिता महेंद्रादित्य के बाद के अंश “आदित्य” को मिलाकर विक्रमादित्य रखा जाता है। विक्रममित्र काशी एवं विदिशा राज्यों का भार भी विक्रमादित्य को सौंपकर स्वयं सन्यासी बन जाते हैं। कालिदास अपने स्वामी “विक्रमादित्य” के नाम पर उसी दिन से “विक्रम संवत” का प्रवर्तन करते हैं। नाटक की कथा यहीं पर समाप्त हो जाती है।


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