वही की वही बात कहानी का सारांश - Wahi ki Wahi Baat Kahani Ka Saransh

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वही की वही बात कहानी का सारांश

वही की वही बात कहानी का सारांश : वही की वही बात कहानी में मानव जीवन में उत्पन्न व्यवसायिकता तथा स्वार्थ वृत्ति का स्पष्ट एवं रोचक चित्रण किया है। छोटे शहर में मेला लगता है जिसमें आस-पास के गांव के लोग भी शामिल होते हैं। इस मेले को 'जयहिंद मेला' कहा जाता है। इस मेले का प्रमुख आकर्षण थियटेर कंपनियाँ है । इस बार मेले में दो कंपनियाँ आई हैं। जिनमें व्यावसायिक प्रतियोगिता की जंग छिड़ जाती है। एक थिएटर में कालिदास द्वारा लिखित 'शंकुतला' नाटक का मंचन हो रहा है। जिसे देखने के लिए भीड़ जमा है। तो दूसरे थिएटर में नौटंकीनुमा कोई हलका नाटक खेला जा रहा है। शंकुतला नाटक हाऊसफुल चल रहां है। दुष्यंत जोर की आवाज में कहता है- “मैं तिरियाचरित्तर का नाटक रचानेवाले इस शंकुतला को किसी हालत में भी अपने पास नहीं रख सकता।" तभी दर्शक में से नीली बनियान और पट्टे के पाजामेंवाला व्यक्ति खड़ा हो जाता है और कहता है शंकुतला को रखना ही पड़ेगा। राजा दुष्यंत की समझ में नहीं आता क्या हो रहा है ? वह फिर से जोर से बोलता है नहीं रखूगाँ। तभी दर्शकों से वही आवाज आती है रखना ही पड़ेगा नहीं तो हम ठीक कर देगें। पहले शो में इसी व्यक्ति ने हंगामा किया था । लेखक पहले शो की एक-एक घटना याद आ रही है। लेखक कहता है- " मैं पहले शो में उँचे क्लास में था। सो वही से देखा आवाजे लगाने वाला नीली बनियान पहना आदमी है।" उसकी आवाज सुन आस–पास बैठे लोग भी चिल्लाने लगे शंकुतला को रखना पड़ेगा। मैनेजर का भी बस नहीं चला। उसे पर नाटक समाप्त करना पड़ा। दूसरे शो में जब लोग अंदर जा रहे थे तो उन्हें पता चला इस आदमी ने पहले शो में हंगामा किया हैं। तो उसे फिर से शो में लेकर आ जाते हैं। लेखक भी फिरसे टिकट निकालकर उसी व्यक्ति पास बैठा हैं। जैसे बॉक्स ऑफिस हिट संवाद आ जाता है वैसे ही वह खड़ा होकर शंकुतला को रखना ही पड़ेगा। इस बार मैनेजर ने पुलिस बुलाई है। पुलिस अफसर बड़ा तेज है। अगर किसी ने हंगामा खड़ा कर दिया तो वह लाठी चार्ज करनेवाला था। मछवारे को भी पहले शो में काम नहीं मिला था। उन्होंने भी नीली बनियान पहने आदमी को धमकाया है। इसी लिए वह चुप बैठा है अब वह लेखक को माचिस मांगता है। कुर्ते के जेब से माचिस ढूँढ़ते हुए लेखक कहता है- "बीड़ी पिओगे ? नहीं ! बीड़ी नहीं पिऊँगा वह धीमी आवाज उत्तर देता है। लेखक कहता है थिएटर में आग लगना चाहता हूँ। ऐसा नहीं करुगाँ नहीं बाबूजी । तो किसलिए चाहिए माचिस ? नीली बनियान वाले आदमी ने उत्तर नहीं दिया। लेखक ने उसे बाएँ हाथ में रखी पटाखे की लड़ी देख ली। लेखक कहता है तो तुम उधम मचाना चाहते हो। तो उसने उत्तर दिया, पेट का सवाल है बाबूजी। सामने के थिएटरवाला इस शो में हंगामा मचाने के लिए रोज का डेढ़ रूपया देता है। लेखक सोच में डूब गया अगर उसने पटाखा जलाया तो भगदड़ मच जाएगी पुलिस इंस्पेटर बहुत तेज है। वह लाठी चार्ज करेगा। दो एक के तो हाथ पैर टूट जाएँगे। लेखक जेब में से माचिस निकालकर नीली बनियान और पट्टे के पाजामावाले आदमी को दे देता है। क्योंकि उनके भी सामने वही सवाल है जो उसके सामने है। इस छोटे से शहर का लेखक गरीब डॉक्टर है, जिसे भूले भटके ही मरीज मिलते हैं।

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