ठुकरा दो या प्यार करो कविता का भावार्थ और उद्देश्य

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ठुकरा दो या प्यार करो कविता का भावार्थ और उद्देश्य

कवि परिचय : हिंदी साहित्य क्षेत्र में सुभद्राकुमारी चौहान का स्थान प्रमुख है। उनकी कविता में राष्ट्रीय भावना दलितं- पीड़ित का उत्थान और राष्ट्रीय कल्याण का स्वर मुखरित हुआ है। आपकी 'मुकुल', 'त्रिधारा', 'बिखरे मोती' उन्मादिनी, 'सभा का चित्र', 'सीधे-सादे चित्र' आदि रचनाएँ महत्वपूर्ण हैं। 'झाँसी की रानी' कविता में आपको अमरत्व प्रदान किया ।

ठुकरा दो या प्यार करो कविता का भावार्थ

भावार्थ : 'ठुकरा दो या प्यार करो' कविता में कवयित्री अभिनव पूजा का आदर्श प्रस्तुत करती है। भगवान की पूजा करने के लिए भक्तगण पूजा से संबंधित अनेक वस्तुओं को लेकर मंदिर जाते हैं। उन्हें भगवान के प्रति समर्पित करते हैं। रत्न, मोती और विविध चढ़ावों को आर्पित करते है । कवयित्री कहती है मैं गरीबिनी हूँ। मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है। फिर भी मैं साहस करके मंदिर में आई हूँ। मेरे पास धूप-दीप नैवेदय नहीं हैं। गले में पहननेवाला फूलों का हार भी नहीं है। यहाँ पर सामाजिक विषमता को प्रस्तुत किया है। समाज में एक वर्ग इतना धनी है कि वह ईश्वर को बहुमूल्य वस्तुएँ चढ़ा सकता है। एक वर्ग के पास फूलों का हार भी नहीं है। कवयित्री भगवान से कहती है मेरे स्वर में माधुर्य नहीं है। मैं तुम्हारी स्तुति कैसे करूँ ? क्योंकि मेरे वाणी में मन का भाव प्रकट करने का चातुर्य नहीं है। मेरे पास दान-दक्षिणा के लिए पैसे नहीं हैं। मैं खाली हाथ चली आई हूँ। भगवान की विधिवत पूजा की जाती है। होम-हवन किया जाता है। इसकी विधि भी कवयित्री नहीं जानती है। भगवान से कवयित्री कहती है मेरे पास तो कोई भी बहुमूल्य वस्तु नहीं है। पूजा की विधि भी नहीं जानती। मैं सिर्फ सच्चे मन से आपकी प्रार्थना करने के लिए आई हूँ। इस भिखारिन की प्रार्थना स्वीकार करो। मेरे हृदय में आपके प्रति प्रेम का भाव है, बाकी कुछ भी मेरे पास नहीं है।

ठुकरा दो या प्यार करो कविता का उद्देश्य

उद्देश्य : सुभद्रकुमारी चौहान भक्ति के बाहयाडंबर का विरोध करती है। भगवान भक्त के महँगे उपहारों पर खुश नहीं होते। वे सच्चा भाव चाहते हैं । कवयित्री स्पष्ट करती है कि वह केवल भक्ति भाव चढ़ाना चाहती है। सच्चे मन से प्रार्थना करना चाहती है।

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