शामनाथ का चरित्र चित्रण - Shamnath ka Charitra Chitran

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शामनाथ का चरित्र चित्रण - Shamnath ka Charitra Chitran

शामनाथ का चरित्र चित्रण: भीष्म साहनी की कहानी 'चीफ की दावत' में शामनाथ मुख्य पात्र के रूप में उभरता है। शामनाथ एक ऐसा पात्र है जो सामाजिक तथा आर्थिक विडंबनाओं से जूझ रहा है। वह स्वयं को आर्थिक दृष्टि से सुव्यवस्थित करने के लिए कुछ भी कर सकता है। 'चीफ को दावत' पर बुलाना उसे उत्कृष्ट कोटि का भोजन खिलाकर प्रमोशन के लिए अवसर पाने की इच्छा उसके चरित्र के लालचीपन को दर्शाती है। अपनी इस लौकिक उन्नति की इच्छा की पूर्ति हेतु वह हर बंधन को तोड़ सकता है। घर के 'फालतू' समान सी माँ को कैसे दृष्टि से ओझल किया जाए – इसकी हर संभावना उसके मन में कौंधती है। सहेली के घर भेजा जाय, दरवाजा बंद करके उस पर ताला लगा दिया जाए या फिर कुछ और किया जाए यह प्रश्न उसे तमाम तरह से विचलित करते हैं। अन्ततः वह निर्णय लेता है कि "माँ, हम लोग पहले बैठक में बैठेंगे। उतनी देर तुम यहां बरामदे में बैठना । फिर जब हम यहाँ आ जायें, तो तुम गुसलखाने के रास्ते बैठक में चली जाना।” इस सन्दर्भ से स्पष्ट होता है कि शामनाथ तरक्की हेतु संवेदनहीन होता जाता है और अपनी बूढी माँ को 'फालतू' वस्तु के रूप में आंकता है। 

शामनाथ स्वार्थी व्यक्ति है। स्वार्थ साधने के लिए वह किसी भी प्रकार का घृणित कार्य कर सकता है। जब माँ चीफ के आकर्षण का कारण बनती है, तो वह उसे गाना गाने और फुलकारी बनाकर देने के लिए विवश करता है। शामनाथ के कहे शब्द द्रष्टव्य है- "तुम चली जाओगी, तो फुलकारी कौन बनायेगा, साहब से तुम्हारे सामने ही फुलकारी देने का इकरार किया है ।" शामनाथ अर्थ एवं तरक्की की लोलुपता में इतना संलिप्त हो जाता है कि वह सही और गलत की दिशा भूल जाता है। 

इस कहानी में शामनाथ एक दिखावटी पात्र के रूप में उभरता है । वह बाहरी ताम- जाम में विश्वास रखता है, इसलिए चीफ को दावत पर आमंत्रित करने पर वह उसे अपने बड़े होने का अहसास कराना चाहता है। वह चीफ को दिखाना चाहता है कि वह किसी से भी कमज़ोर नहीं है। वह स्वंय को सभ्य और पूंजीपति दर्शाने हेतु घर का वातावरण बदल देता है – “आखिर पांच बजते-बजते तैयारी मुकम्मल होने लगी । कुर्सियां, मेज, तिपाइयां, नैपकिन, फूल सब बरामदे में पहुंच गये। ड्रिंक का इन्तजाम बैठक में किया गया। अब घर का फालतू सामान आलमारियों के पीछे और पलंगों के नीचे छिपाया जाने लगा। तभी शामनाथ के सामने सहस एक अड़चन खड़ी हो गयी, माँ का क्या होगा ?" शामनाथ का चरित्र ऐसा है कि वह परम्परा के प्रति आदरभाव न रखकर उसके प्रति नकार भाव रखता है। कहने का तात्पर्य यह है कि परम्परा उसके लिए एक फालतू वस्तु की भांति है जिसका समय के उपरान्त उपयोग खत्म हो जाता है। इसलिए वात्सल्य प्रेम से ओत प्रोत माँ उसे फालतू प्रतीत होने लगती है । 

वह मौकापरस्त है। जहाँ भी उसे फायदा मिलता है वह किसी भी तरह का समझौता उस स्थिति से नहीं करता है। इस प्रकृति के कारण वह मूल्यहीन बनता जाता है। आधुनिक समय की दौड़ में वह इतना संलग्न हो जाता है कि वह दायित्वों के प्रति सचेत नहीं रहता है। इसलिए मेहमानों के समक्ष वह अपनी माँ को हास्यस्पद बनाता है। माँ की घुटन को समझने के बजाय वह मौके की फिराक में रहता है कि ऐसी कौन सी स्थिति आए की चीफ उस पर प्रसन्न हो जाए और उसे प्रमोशन मिल जाए । माँ की हास्यस्पद स्थिति का मार्मिक चित्र इस प्रकार है "माँ, हाथ मिलाओ। पर हाथ कैसे मिलाती। दायें हाथ में तो माला थी। घबराहट में मां ने बायां हाथ ही साहब के दाये हाथ में रख दिया। शामनाथ दिल ही दिल में जल उठे। देसी अफसरों की स्त्रियां खिलखिलाकर हंस पड़ी। 

इससे स्पष्ट होता है कि शामनाथ मध्यवर्ग समाज का प्रतिनिधित्व करने वाला पात्र है। वह स्वार्थी, मौकापरस्त एवं दिखावटी है। वह आधुनिकता के परिवेश में अंधा व्यक्ति है इसलिए जीवन मूल्यों के प्रति कोई दायित्व नहीं समझता है।

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